विशिष्ट गीतकार : अवनीश त्रिपाठी

【एक】
अँजुरी भर अँगड़ाई

सिरज रहा है धूप सलोनी
सिरहाने पर सूरज
भोर झरोखे पर ले आई
अँजुरी भर अँगड़ाई।

दूर क्षितिज पर टहल रहे हैं
बादल के मृगछौने
श्याम-सलोने पर्वत जैसे
कुछ हैं बौने-बौने

मौसम के हरकारे बनकर
आये वंशी-मादल
धुनें,राग,लय,ताल समेटे
मदमाती पुरवाई।

झाँक रहीं किरणें कनखी से
इच्छाएँ मधुवन की
काजल ओढ़े नयन पढ़ रहे
परिभाषाएं मन की

नई गुदगुदी उठकर कब से
पोर-पोर तक पहुँची
खिली मञ्जरी फुनगी चहकी
कली-कली इँगुराई।।

नेहनदी ने गीत सुनाये
कल-कल सम्बन्धों के
पृष्ठ खुले पुलिनों पर आकर
हस्तलिखित ग्रन्थों के

सतहों पर मौसम की बेटी
करती है अठखेली
झुके पेड़ सब नाप रहे हैं
पानी की गहराई।

      【दो】
महमहाई रात भर

नेह की
पगडंडियों पर
फागुनी पदचाप सुनकर,
झूमती
डाली लता की
महमहाई रात भर ।

शाम ढलते
ही मदिर सी
गन्ध कोई छू गई,
नेह में
डूबी हुई सिहरन
जगी फिर से नई,

प्यास
अधरों पर हमारे
छलछलाई रात भर ।

गुदगुदाकर
मञ्जरी को
खुशबुई लम्हे खिले
पँखुरी के
पास आई
गंध ले शिकवे-गिले

नेह में
गुलदाऊदी
रह-रह नहाई रातभर ।

फागुनी
अठखेलियों में
कब महावर चू गया
बांसुरी के
अधर चुपके
राग कोई छू गया

प्रीति
अवगुण्ठन उठाकर
खिलखिलाई रातभर ।

【तीन】
शब्द पानी हो गए

तुम सलीके से
उतर कर याद में
छंद नयनों से नया लिखने लगी,
मैं अभी तक
अर्थ भी समझा नहीं
और वंचक शब्द पानी हो गए।।

गुलमुहर सी
देह का सौभाग्य पा
मन पलाशी झूमता ही रह गया,
स्वप्न में बाँधा
उसे भुजपाश में
चूमता बस चूमता ही रह गया।

रातरानी
चाँदनी तारे सभी
आकलन विश्वास का करने लगे,
नींद को छेड़ा
किसी ने भी नहीं
स्वप्न के अहसास धानी हो गए।।

हाथ पकड़े आ गए
हम भी पुलिन पर
फिर नदी का भाव भी पढ़ने लगे,
घाट झुरमुट
और पगडण्डी सभी
नेह का पर्याय ज्यों गढ़ने लगे।

मन हुआ आषाढ़,
सावन तन हुआ
गुदगुदी पुरवाइयाँ करने लगीं,
रातभर हमने
कथानक जो बुने
भोर तक पूरी कहानी हो गए।।

【चार】
बौराने के ढेर बहाने

धूप लगाकर नेह-महावर
उतर गई सागर के जल में,
फगुनाई फिर याद तुम्हारी
आकर बैठ गई सिरहाने।

फागुन-रंग,बसन्त-गुलाबी
पनघट,नदी,चाँदनी रातें,
भीग रहा मेरा मन हर पल
चाह रहा करना कुछ बातें।

पोर-पोर मथने को आतुर
हरसिंगार की खुशबू वाली
हौले से आकर पुरवाई
फिर से लगी मुझे बहकाने।

उठी गुदगुदी मन में तन में
मोरपंखिया नई छुवन से,
परकोटे की आड़ लिए जो
नेह-देह की गझिन तपन से,

सूरज की अनब्याही बेटी
आभा के झूले पर चढ़कर
कुमकुम रोली को मुट्ठी में
आकर फिर से लगी उठाने।

अधरों पर पलाश की रंगत
पिए वारुणी दशों दिशाएँ,
आगन्तुक वासन्ती ऋतु का
आओ अवगुण्ठन सरकाएँ।

किसिम-किसिम की मंजरियों पर
कनखी-कनखी दिन बीते हैं,
साँसें फिर से खोज रही हैं
बौराने के ढेर बहाने।

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