विशिष्ट गीतकार : ज्ञान प्रकाश आकुल

(1)
जितने लोग पढ़ेंगे
पढ़कर,
जितनी बार नयन रोयेंगे
समझो उतनी बार,
गीत को
लिखने वाला रोया होगा।

सदियों की अनुभूत उदासी यूँ ही नहीं कथ्य में आयी
आँसू आँसू हुआ इकट्ठा मन में एक नदी लहरायी
इस नदिया में घुलकर
जितने लोग
प्यास अपनी खोयेंगे,
सब के हिस्से का वह मरुथल
गीतकार ने ढोया होगा।

मंत्रों जैसे गीत मिलेंगे मंत्रमुग्ध से सुनने वाले
सुनकर लोगों ने सहलाए अपने अपने दिल के छाले
जितनी रातें जाग जागकर
लोग नए सपने बोयेंगे,
उतनी रातें गीत अकेला
झूठ मूठ ही सोया होगा।

आँसू से ही बने हुए हम मुस्कानों के कारोबारी
दुनिया को जी भर देखा पर सीख न पाए दुनियादारी
गाछ कि जिसके नीचे
आने वाले बंजारे सोएंगे
समझो किसी गीत ने उसको
अश्रु मिलाकर बोया होगा।

 

(2)
हम फूलों की गंध बेचने के अपराधी हैं
उनका क्या ?
जो टुकड़ा टुकड़ा उपवन बेच रहे।

सब के आगे शीश झुकाना जिस दिन दिया नकार,
उसी दिवस से हम पर उछले प्रश्नों के अम्बार,
हम तुलसीदल चंद बेचने के अपराधी हैं
उनका क्या?
जो टुकड़ा टुकड़ा आँगन बेच रहे।

अँधियारी रातों में रखते हम चन्दा सा रूप
बादल बनते हम जब जब झुलसाने लगती धूप
बारिश का आनंद बेचने के अपराधी हैं
उनका क्या ?
जो टुकड़ा टुकड़ा सावन बेच रहे।

जिनके घर होता आया आँसू का कारोबार
उन्हें बहुत खलता है यह मुस्कानों का व्यापार
हम मीठे संबंध बेचने के अपराधी हैं
उनका क्या ?
जो टुकड़ा टुकड़ा अनबन बेच रहे।

 

(3)
कल कबीर सपने में आया,
आकर बैठ गया सिरहाने I

मुझसे बोला! इन नगरों के
कंगूरों पर भोर भये क्या?
अब भी कुछ पाखी गाते हैं?,
क्या इस बदली सी दुनिया में
राजमहल के रहने वाले
कबिरा की साखी गाते हैं?
क्या कोई अब भी जाता है
गंगा के तट पर सुस्ताने।

मैं बोला तुम क्यों रोते थे?
चुपके चुपके भीतर भीतर
जब सारी धरती सोती थी ?
क्या दुनिया तब भी ऐसी थी
जैसी अब है या कुछ हटकर
क्यों तुमको पीड़ा होती थी ?
इधर चल रही बात हमारी
उधर लगी थी रात सिराने।

तब तक लाउडस्पीकर गूँजे
भजन अजान लगे टकराने
कोलाहल है गंगा तीरे ,
मैंने उसको जाते देखा
अपनी श्वेत चदरिया ओढ़े
चला गया वह धीरे-धीरे ।
मेरे गालों पर फिर लुढ़के
दो आँसू जाने पहचाने।

 

(4)
कल मशीन ने पानी जाँचा,
बस्ती बस्ती ज़हर मिला है अलग अलग।

पानी से बाहर निकला तो
ज़हर चढ़ गया झण्डों तक
गाली चाकू तेग़ तमंचा
गोली लाठी डण्डों तक,

चौराहों पर नंगा नाचा
बस्ती बस्ती असर मिला है अलग अलग I

पानी की अंतिम सीमा है
प्यासों के विश्वासों तक
पानी उछल रहा है लेकिन
पँहुच न पाता प्यासों तक

प्यासों को पड़ रहा तमाचा
बस्ती बस्ती कहर मिला है अलग अलग !

जब से पीने लगे लोग सब
लाल हरा या नीला पानी
तब से बदल गया है मौसम
हुआ बहुत ज़हरीला पानी

सब ने गढ़ा एक सा साँचा
बस्ती बस्ती मगर मिला है अलग अलग !

 

(5)
तेरी मेरी प्रेम कहानी मिलती जुलती है
चल मेरे सँग बैठ कहीं,
कुछ बातें करते हैं!

इन्द्रधनुष के रंग चुराने मैं बादल के पार गया था
तू भी तारों की दुनिया से कुछ दिन पहले वापस आयी
तुझको देखा तो जाने क्यों अपनी अपनी लगी मुझे तू
मैं खाली हाथों लौटा था तू भी रंग नहीं ला पायी

तेरी बातें सुनकर मन की बर्फ पिघलती है
चल मेरे सँग बैठ कहीं,
बरसातें करते हैं!

तूने हर मंदिर की चौखट पर अपना माथा पटका है
मैंने भी कितनी जगहों पर जा जा कर बांधे हैं धागे
तू चाँदी की दीवारों में जाने कब से क़ैद रही है
मेरे सिक्के विखर गये थे सोने के ढेरों के आगे

कसक एक जैसी ही भीतर भीतर छलती है
चल मेरे सँग बैठ
नयी शुरुआतें करते हैं!

दूर कहीं पूरब से आता एक उजाला सा दिखता है
वैसा ही मदहोश उजाला जैसा बरसों पहले देखा
कल मैंने मशहूर ज्योतिषी को जब हाथ दिखाया, बोला
ऐसा क्या है जो कि अचानक मुड़ी हुयी है जीवन रेखा

एक नयी उम्मीद आजकल पल पल पलती है
चल मेरे सँग बैठ
भेंट सौगातें करते हैं।
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परिचय : दस वर्षों से मंचों पर सक्रिय एवं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित
इमेल : gyanji01@gmail.com

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