विशिष्ट गीतकार : डॉ बुद्धिनाथ मिश्र

(छोटे बच्चे अक्सर दीवारों पर आड़ी-तिरछी रेखाएँ बनाकर अपनी अद्भुत कलाकारी का इजहार करते हैं. उनके कमासुत माँ -बाप उसे ‘दीवार ख़राब’ करना मानते हैं और बच्चे को डांट -फटकार कर उस पर रंग-रोगन कर मिटा देते हैं. ऐसा प्रायः हर घर में होता है, जहां बचपन जिन्दा है और संवेदना मर गयी है)

यह दीवारों का जेवर है

आड़ी- तिरछी रेखाओं का
अपना मतलब, अपना स्वर है
पाटी पर भारी दीवारें कहतीं –
यह बच्चों का घर हैै।

ये पुरखों की आदिम लिपियाँ
इनका अर्थ गुनो
ये भविष्य की आवाजें हैैं
कानोकान सुनो

पहली कड़ी सृजन की ये हैं
इन्हें मिटाना सख्त मना है
तारे पेड़ नदी जंगल चिड़िया
गुड़िया इनके अन्दर हैं।

बच्चों की अनगढ़ी अजन्ता
जिस घर में उतरे
उस अकूत वैभव पर
सौ- सौ यक्ष कुबेर मरे

खुले खजाने हैं बचपन के
लड़ी बुजुर्गों के जातक की
नयी उमर की छोटी- सी
जागीर देख कुढ़ता गब्बर है।

बीज- रूप ये नये कल्प की
नयी ऋचाओं के
भीमबैैठका में पनपी
हेमन्त लताओं के

यह किलकारी भित्तिचित्र की
फूलों की घाटी, देहरी पर
पाणिनि या हुसैन से पूछो
यह दीवारों का जेवर है।

चाँद: दो प्रेमगीत

एक
चाँद उगे चले आना
पिया,कोई जाने ना
दूँगी तुझे नजराना
पिया, कोई जाने ना
जाग रही चौखट की साँकल
जाग रही पनघट पर छागल
सो जाएँ जब घाट नदी के
तुम चुपके से आना
पिया,कोई जाने ना
सोना देंगे, चाँदी देंगे
पल भर में सदियाँ जी लेंगे
छूटेगा कजरा, टूटेगा गजरा
पूछेगा सारा जमाना
पिया,कोई जाने ना
पँखुरी-पँखुरी ओस नहाए
पोर-पोर बंसी लहराए
तू गोकुल है मेरे मन का
मैं तेरी बरसाना
पिया,कोई जाने ना

दो
चाँद, जरा धीरे उगना
गोरा-गोरा रूप मेरा
झलके न चाँदनी में
चाँद,जरा धीरे उगना
भूल आयी हँसिया मैं
गाँव के सिवाने
चोरी-चोरी आयी यहाँ
उसी के बहाने
पिंजरे में डरा-डरा
प्रान का है सुगना
चाँद,जरा धीरे उगना
कभी है असाढ़ और
कभी अगहन-सा
मेरा चितचोर है
उसाँस की छुवन-सा
गहुवन जैसे यह
साँझ का सरकना
चाँद,जरा धीरे उगना
जानी-सुनी आहट
उठी है मेरे मन में
चुपके-से आया है
जरूर कोई वन में
मुझको सिखा दे जरा
सारी रात जगना
चाँद,जरा धीरे उगना

 

गुहावासी

बाहर की धूप कहीं
अंदर घुस जाए ना
कर न दे अँधेरे को तहस-नहस
चिंतित हैं जीव सब गुहावासी

बरसों से पली-बढ़ी
तम की ये संतानें
अचरज में हैं –
कैसे,क्या हुआ ?
क्यों होती रोशनी निगोड़ी
जलसा-घर में
क्यों जलता खामखा दिया ?

हम आदिम राग यहाँ
आदिम अनुराग यहाँ
गठरी अज्ञान की हमारे वश
गर्वित हैं जीव सब गुहावासी ।

तमसा के तट पर हम
काट रहे धूप-वृक्ष
गाते हैं गीत हम उजाड़ के
दिखते हैं जहाँ कहीं
बीजों में अंकुर
हम रख देते हैं उखाड़ के

डरते हैं परिसर के
साँप और बिच्छू भी
बाहरी बृहस्पति भी
गिर जाते खाकर गश
हर्षित हैं जीव सब गुहावासी

दूर रहें मनु से ,मनुपुत्रों से
दूर रहें वेद से पुराणों से
पंख काट देते हम
नभचारी गरुड़ों को
शहद सने हुए शब्दबाणों से

हमसे है कौन बड़ा
ज्ञानी संसार में
काट रहे चाँदी और
लूट रहे हैं सुयश ।
अर्चित हैं जीव सब गुहावासी

मन तो मन है

तुमने कहा -मुझे मत छूना
मान लिया मैं
सोच रहा हूँ –
मेरी जगह अगर तुम होती !

कलप-कलप कर कहती
अपनी करुण-कथाएँ
दुखती हुई रगों की
नीली पड़ी व्यथाएँ
मेरी निष्ठुरता को
कोस रहा होता जग
गढ़ दी जाती मुझपर
सामन्ती गाथाएँ

मैं अपनी खोली में गुपचुप
उकड़ूँ बैठा
देख रहा होता सूखी
सीपी में मोती

प्रश्न किया था मैंने -‘क्यों ‘
उत्तर -‘मेरा मन’
कह न सका मैं तुमसे
‘मेरा भी तो है मन ‘
पहल तुम्ही ने की थी
बड़ी -बड़ी आँखों से
मैं राही था, रुक-सा गया
देख घर-आँगन

कितना दिया उड़ेल प्यार
तुमने निर्झर -सा
लोकलाज तज खुद को
मुझमें रही पिरोती

मानूँ कैसे इज्जत
सिर्फ एक की गुरुतर
धागा वही – भले हो धोती
या हो आँचर
फिर क्यों शीशे-सा नसीब
मैंने ही पाया
जो चाहे तोड़े पल में
कर से उछालकर

देह तुम्हारी जितनी पावन
उतनी मेरी
मन तो मन है, तन से
लेता नहीं फिरौती ।

तीन गीत

अमलतासी पहर
रात के पिछले पहर
जो छू गए वे हाथ
चुनते फूल हरसिंगार के |
गुनगुनाते रहे टेसू -गीत
दिन भर हम शरद में भी
महकते प्यार के

टहनियों में छंद जैसे बँधे
कलमी आम थोड़े अधपके -से
छाँह में सुस्ता रहे हैं
अश्वमेधी यज्ञ के घोड़े थके-से

गंधमादन गिरि -शिखर से घाटियों तक
गूंजते ज्यों हव्यवाहन शब्द मंत्रोच्चार के

चाँदनी के गात पर है लेप जैसे
मलय चन्दन का मनोरम सुरभि-शीतल
एक ही संदूक में है बंद सारी
राशियाँ ,ऋतुएँ ,दिवस,पल

सिंधु-तट की सुर्ख गीली रेत पर हैं
नहीं पड़ते पाँव सोच-विचार के

नील की टिकिया घुले जैसे
अपरिचित नीर में होकर विलम्बित
एक क्षण का शंख -सीपी मिलन भी
घुलता रहा मन में गिलौरी पान-सा नित
ओढ़ लम्बी अंतरा सोया शरद का चाँद
दूर खिलते हैं अमलतासी पहर अभिसार के

जनगण के आसमान में

मैंने अपनी वाम तर्जनी से
इक नन्हा कमल खिलाया
और करोड़ो सूरज उग आये
जनगण के आसमान में |

अब जाकर मैं समझा कैसे
बूँद-बूँद से सागर बनता
कैसे मिलकर लिख देती है
भाग्य देश का, बेकल जनता
कैसे आता लोकतंत्र है
पगडंडी पर पैदल चलकर
कैसे काँटों की झुरमुट में
पाटल का है उत्सव मनता

एक कमल का खिलना
मानो मंदिर का कपाट खुल जाना
और शंख की गूँज फैल जाना
जनगण के आसमान में.

माना मैने, जैसे सोचो
नहीं निकलता वैसा बंदा
बिकता है सब्जीमंडी में
केसर की कीमत पर कंदा
यह भी मान लिया अब मैने
मँहगा बड़ा मतों का चक्कर
खेत-डीह सब बिक जाता है
ऐसा नया जुआ है गंदा

मैने फिर भी सोचा यों है
मैं बदलूँ तो युग बदलेगा
कटी पतंगों जैसे उड़ना क्या
जनगण के आसमान में

वक्त मिले तो…

वक्त मिले तो खूब लगाना
सुरमा आँखों में
पहले नाड़ा ठीक करो
खुलते पाजामे का।

कितना था उत्साह
कि तुम जब रथ पर आओगे
सूरज जैसे अग-जग को
रोशन कर जाओगे।
जैसे-जैसे कलई खुलती
जाती है फन की
घटता जाता है लोगों में
शौक डरामे का

उन सबने तो मिलकर बस
जागीरें ही बांटीं
तुमने पढ़कर मन्त्र
जेब से गर्दन तक काटी
वादा था, काला धन
जन के नाम जमा होगा
खोल दिया घर-घर में
तुमने खाता नामे का

सुबह-सुबह ही पाँव
लगे उठने बहके-बहके
राजधर्म के घर में
वेश्या राजनीति चहके
सोचा तुमने, क्या होंगे
वे सांचे सपनीले
लोकतंत्र खुद शक्ल ले रहा
जब हंगामे का
……………………………………….
परिचय : डॉ बुद्धिनाथ मिश्र
गीत, निबंध, कहानी, पटकथा सहित विविध लेखन, कई पुस्तकें प्रकाशित, राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय सम्मान
संपर्क – देवधा हाउस, 5ध्2 वसंत विहार एन्कलेव, देहरादून उत्तराखंड
मो. 0941299244

 

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