निर्भया को याद करते हुए                                 

उजाले समय में

तमस डाला डेरे

राह में चतुर्दीक

कंटकों के घेरे

छला है उसे सबने

रौंदा मन के सपने

बचकर कहाँ  जायें

हर जगह लुटेरें

ढ़ाना है रोज कहर

कैसी ये तेज लहर

आफत की  मछलियाँ

घात में मछेरे

 

पहरे में सभ्य शिखर

जीना  हरदम डरकर

सोचते धरा पर

मुरझाएँ चेहरें        ।

समय सत्य

बदला मौसम

सहज नहीं है

तप रही हवाएँ

आँच लगाएँ

धूप दहकती

सहते नहीं पाँव

मतवाला सूरज हठधर्मी

धाह देती छाँव

रंग बदलती बदलियों की

सही नहीं  दिशाएं

दरक गयें

रिश्तों के पुल हैं

खोद रहें नहरें

दम तोड़ती

रेत में नदियाँ

चाहत की लहरें

दूर कहीं जो

समय – सत्य से

लिख रहें कथाएँ

लहकी फसलें

उम्मीदों की

उबला हुआ शहर

मौन खड़ा है

बूढ़ा बरगद

पीता हुआ जहर

उतरा पानी

आँखों में

तैर रहीं विपदाएँ ।

 

मनमानी

दूर गगन में खोया बादल

गया अतल में पानी

धाराओं की महानदी में

बहता जल का सोता

पहचानों के ताल – तलैया

संज्ञाओं पर रोता

मौसम का तुनका मिजाज है

रुठी बरसा रानी

जमा किनारें थकी मछलियाँ

भटके वनचर प्यासे

जगह नहीं जो जान बचाएँ

उखड़ी रहती साँसे

संकल्पों के महामंत्र में

पेड़ों की कुरबानी

मन की चाहत चाँद – सितारे

कहाँ – कहाँ धरती है

घर की नदियाँ गंगा – यमुना

दूर तलक परती है

उथल – पुथल में सात समुंदर

लहरों की मनमानी ।

 

 

ता – ता थैया

हल्के हुए

जाल शब्दों के

कीमत बढ़ती जाये

साथ लिए अखबारी कतरन

सुविधा के मतवाले

झाग उगलते ताज पहनकर

पागुर करने वाले

शब्द मरोड़े ता – ता थैया

जमा भीड़ ठिठियाएँ

शीश नवाएँ सिद्व पीठ में

दर्शन के सुख माँगे

दूर कहीं से सौदेबाजी

निकला सबसे आगे

जयकारा में साथ जमुरा

मर्यादित कहलाएँ

आकुल मन की कसमस पीड़ा

डटा रहे महारथी

समय की रंगत कलम बोलती

सम्मुख अटल सारथी

स्थिर रहता मील का पत्थर

नचती रोज हवाएं

 

By admin

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