विशिष्ट गीतकार : डॉ रवींद्र उपाध्याय

विशिष्ट गीतकार : डॉ रवींद्र उपाध्याय

धूप लिखेंगे, छाह लिखेंगे

धूप लिखेंगे, छाह लिखेंगे
मंजिल वाली राह लिखेंगे
खुशियों के कोलाहल में जो
दबी-दबी है आह, लिखेंगे

बादल काले – उजला पानी
निशा-गर्भ में उषा सुहानी
रंग-गंध की कथा चल रही
श्राेता विवश शूल अभिमानी

सतत सत्य संधानी हैं हम
कैसे हम अफवाह लिखेंगे

जलता एक दीप काफी है
चाहे जितना तम हो गहरा
कब रुकते हैं अभियानी पग
विघ्न भले हो दुहरा-तिहरा

होंगे और लहर गिनते जो
हम दरिया की थाह लिखेंगे

बे-मकसद जीना क्या जीना
बिना पाल जिस तरह सकीना
हर हताश को हास बांटना
पड़े न क्यों खुद आंसू पीना

मायूसी के मस्तक पर भी
पल-पल का उत्साह लिखेंगे

हमें न कोठी, कार चाहिए
श्रम का पर सत्कार चाहिए
फूलों की दो-चार क्यारियां
पूरी नहीं बहार चाहिए

हम विरुद्ध हर दमन-दंभ के
होकर बे-परवाह लिखेंगे

सपने दिन के
बाजारी आंधी में
जीवन-मूल्य हुए तिनके !

बाहर-बाहर चमक-दमक
भीतर गहराता तम
दीमकजदा चौखटों पर
लटके परदे चमचम

संवेदन-स्वर मंद-मदत्तर
खनक रहे सिक्के !

कपट-कुशल कुछ लोग
रजत-कंचन से खेल रहे
मिहनतकश बहुजन
अभाव अनुदिन हैं झेल रहे

लाभ-लोभ की चकाचौंध में
रिश्ते सब फीके !

बंदर नाच नचाता है
लालच घाघ मदारी
चापलूस की चांदी है
गर्दिश में खुद्दारी

घर घर पत्थर फेंक रहे हैं
शीशमहल जिनके !

लोगों का भूगोल रच रहे
नव कुबेर मिलकर
बोल रहा जादू विज्ञापन का
अब सिर चढ़कर

भीड़ लगी है वहां, जहां
बिकते सपने दिन के !

चांदनी के लिए
तीरगी-तीरगी बढ़ रहे ये कदम
चार पल की मधुर चांदनी के लिए

दरमियां दो दिलों के बहुत फासला
छू रही है शिखर छल-कपट की कला
स्वार्थ में आदमी हो रहा बावला
जुस्तजू में चला जा रहा हूं अथक
जी सकूंगा जहां, उस जमीं के लिए

मुस्कुराने की चाहत में राेया बहुत
प्राप्ति छलती रही और खोया बहुत
जिंदगी की उदासी को होगा बहुत

तार टूटे हुए जोड़ता चल रहा
सांच दे मन मंदिर रागिनी के लिए

फैलता ही गया सिर्फ बाजार है
आदमी रह गया बस खरीदार है
भागते सब खतरनाक रफ्तार है

है फिजाओं में डर, शक भरी हर नजर
मैं विकल हूं अमन औ यकीें के लिए

विघ्न बेशक बहुत, कम नहीं हौसले
राह में शूल हैं ता सुमन भी खिले
संग ही आंसुओं के सपन भी पले

कारवां साथ होगा नहीं आज, कल
सब बढ़ेंगे नई रोशनी के लिए

बादलों की महफिल
सांझ के अरुणिम क्षितिज पर
बादलों की जमी महफिल
वहीं आकर बैठ जाऊं
मचलता है बहुत ही दिल

घोंसलों की ओर लौटी
आ रही है विहग-टोली
नीड् में होती निनादित
शावकों की मधुर बोली
थका-मांदा-सा पवन भी
हो चला है अलम, तन्द्रित

एक मिट्टी-गीत में भी
आज महफिल को सुनाऊं
बे-वफा उन बादलों की
फसल की पीड़ा बताऊं
मीड़ ऐसी लूं कि उनका
हूदय भी हो पीर-आविल

बैठकी का नहीं, यह
रिमझिम बरसने का समय है
मौज करता मुक्त नभ में
दीन कृषकों पर अनय है
स्वर्ग-स्वामी बदलते अब
क्यों नहीं ये दू काहिल

मजा कुछ और है
फूंक कर चलने में
खतरे का नहीं है डर, मगर
तेज चलने का मजा कुछ और है

जीवन एक प्रतियोगिता है
साहसी ही जीतता है
पवन-गति से बढ़ चला जो
पुलतियों में लक्ष्य ले
उसको ही होना यहां सिरमौर है

हरी लकड़ी-सा धुंआना
जल न सकना-बुझ न पाना
कहीं बेहतर चार पल ही
धधक कर जो जल गया
पा गया इतिहास में वह ठौर है

खुश्बुओं में फूल बिम्बित
बारिशों में मेघ संचित
शेष कुछ रहता नहीं
धन-धाम, यौवन, कनक-तन
सिर्फ सुधियों का महकता बौर है

विश्वास का संबल
शब्द को जब आचरण का बल मिलेगा
अर्थ को विश्वास का संबल मिलेगा

तपिश हो अनुभूतियों में आपकी
जब आग बोलें
रंग में डूबे हुए अहसास हों
तब फाग बोलें
दर्द बोलेंगे अगर-दिल भी छिलेगा

बैठकर तट तरंगों पर तराने
गढ़न सु-कर है
पार जाना धार का प्रतिकार कर
बिल्कुल इतर है
सामना सच का करेंगे-मुंह सिलेगा

घट रही है साख शब्दों की
समय रहते संभलिए
सजग होकर लेखनी में
डालते ईमान चलिए
हृदय से हुंकारिए पर्वत हिलेगा

घाम पर जो लिख रहा
चांदनी पर लिखो-चर्चा में रहोगे
घाम पर जो लिख रहा-गुमनाम है

है यहां पतझर, मगर मधुमास लिखना
सिसकियां हर ओर, फिर भी हास लिखना
कहकशां पर लिखो-छपना आवरण पर
रेत पर जो लिख रहा-हतकाम है

चतुर्दिक है चीख, लेकिन अमन लिखना
स्वप्न में भी दमन को मत दमन लिखना
मैकदे पर लिखो-मुद्रा-मान पाओ
लिख रहे हो भूख पर-विधि वाम है

झुलसती धरती, मगर जलधार लिखना
राजपथ के ठूंठ को छतनार लिखना
लाभकर है-कुर्सियों के कसीदे लिख
विरोधी स्वर का बुरा अंजाम है

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परिचय : कविता, गीत व गजल संग्रह प्रकाशित. सरयू सिंह सुंदर, महाकवि राकेश गंध ज्वार, मां सविता स्मृति व नरेंद्र मोहन जैसे कई सम्मानों से सम्मानित
संप्रत्ति : प्राध्यापक, स्नातकोत्तर हिंदी विभाग, बाबा साहेब भीमराव अंबेदकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर

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