डॉ. संजय पंकज के तीन गीत

मां तो होती
सबके आगे पीछे रहती
रखती सबको साए में!
मां तो होती धूप चांदनी
कुछ गाए अनगाए में!

संबंधों की पूरी दुनिया
पल में आनी जानी है,
सुंदरता की अनुपम मोहक
मां तो अकथ कहानी है,

अनगिन लिपियों की भाषा मां
अंकित खोए पाए में!

पर्वत सागर जंगल सारे
मां के आगे बौने हैं,
देव पितर सब मंदिर मस्जिद
सब हीऔने पौने हैं,

अनगढ़ को भी रूप सलोना
मां के मधु मनभाए में!

मां की हर बात निराली-
लहराती पैंगे झूलों की,
मां तो बहती गंगा धारा
डाल लचकती फूलों की,

रंग गंध की सुधा मनोहर
उतराती मुरझाए में!

मां तो वह धरती है जिसने
सबको आकाश दिया है,
चाहे जितने धोखे खाती
उसने विश्वास दिया है,

कभी न विचलित होती वह तो
सुख-दुख आए-जाए में!

 

अग्नि कोख में पलती अम्मा

चूल्हा हो या हो घर आँगन
सब में खटती जलती अम्मा !
धूप संग दिन रात उसी के
जिसमें जलती गलती अम्मा !

खुली देहरी हवा बाहरी
जब भी घर के प्रतिकूल गई
असमय देख पसीने माथे
अम्मा अपना दुख भूल गई

बिस्तर से बिस्तर तक पहुँची
तब तक केवल चलती अम्मा !

कभी द्वार से लौट न पाए
कोई भी अपने – बेगाने
घर भर में हिम बोती है जो
उसके हिस्से झिड़की ताने

गोमुख की गंगा होकर भी
अग्नि-कोख में पलती अम्मा !

कैसी भी हो विपदा चाहे
उम्मीद दुआओं की उसको
बिना थके ही बहते रहना
सौगंध हवाओं की उसको

चंदा-सा उगने से पहले
सूरज जैसी ढलती अम्मा !

पीर-पादरी-पंडित-मुल्ला
मंदिर-मस्जिद औ’ गुरुद्वारे
हाथ उठाए आँचल फैला
माँग रही क्या साँझ-सकारे

वृक्ष-नदी-गिरि शीश झुकाती
जितना झुकती फलती अम्मा !

अम्मा मेरी
जल्दी से घर आना कहकर
उमड़े भाव दबाती है!
भोली – भाली अम्मा मेरी
अपने घाव छुपाती है!

चहल पहल में जाने कैसे
हर दिन मैं खो जाता हूं
मां के हंसते दृग में आंसू
अनजाने बो जाता हूं

धीरे से धरकर धीरज वह
रोज मुझे समझाती है!
अच्छी सच्ची अम्मा मेरी
दिल उलझे सुलझाती है!

अंबर की जुल्मी आफत को
उसको सहना पड़ता है
धरती है आधार सभी का
मां को कहना पड़ता है

आने-जाने मिलने-जुलने
वालों को बतलाती है!
सीधी सादी अम्मा मेरी
करुणा राग सुनाती है!

कब सोती कब जगती अम्मा
पता नहीं चल पाता है
उसके हिस्से का सचमुच क्या
जीवन में पल आता है

सोते-जगते किसका-किसका
वह तो ध्यान लगाती है!
भोली भाली अम्मा मेरी
मुझ पर जान लुटाती है!

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *