विशिष्ट गीतकार :: डॉ संजय पंकज

दो गीत : संदर्भ पर्यावरण

1. कंकरीट के जंगल में

चली उजाले की आँधी
हरियाली को लील गई!

खिड़की से उतरा चंदा
लोहे पर अटक गया है
कंकरीट के जंगल में
सूरज भी भटक गया है

रौशन दानों पर जुगनू
तितली को कील गई!

नीलकंठ – सुग्गा – मैना
गौरैया औ’ ललमुनिया
जहर हवा के हाथों में
सौंप गई अपनी दुनिया

कंधे पर बैठी बुलबुल
लेकर उसको चील गई!

घायल है नील गगन अब
और दिशाएँ पीली हैं
धरती के पोर पोर में
जल की धार नुकीली है

प्राणों के रेशे रेशे
अपनी साँसें छील गई!

जीने के संकट ज्यादा
थोड़ी थोड़ी राहत है
अंतर के अरमानों की
कैसी कैसी चाहत है

भूख जगा सागर आया
प्यास उड़ाकर झील गई!

2. जल जीवन हरियाली

अपना कैसा पागलपन है
पीते खाली प्याली!
तंग धरा पर ढूँढ रहे हैं
जल-जीवन-हरियाली!

बोए हैं जब हमने विष तो
अमरित की आशा क्यों?
भटके हैं रेगिस्तानों में
फिर व्यर्थ पिपासा क्यों?

अंधकार के जंगल में हम
चाह रहे उजियाली!

आँखें ही आँखें हैं फिर भी
हम देख नहीं सकते
दुख की कितनी अकथ कथा है
उल्लेख नहीं सकते

अंगारे बो कर जाने क्यों
मना रहे खुशियाली!

रोज रोज हम करते रहते
मुर्दों का अभिनंदन
बारूद बिछाकर चलते हैं
चिह्नित करने चंदन

जली हवा है जले पखेरू
कहती नभ की लाली!

पहले मन में फूल उगाएँ
फिर बाग लगाते हैं
मन के रावण का वध पहले
फिर आग लगाते हैं

आओ करें आरती पावन
नियति-नटी-मतवाली!
फिर जीभर कर हम ढूँढ़ेंगे
जल-जीवन-हरियाली!

जान सकोगे क्या

विस्तार प्यार का क्या होता
तुम मान सकोगे क्या !
मर मिटने की आकुलता को
तुम जान सकोगे क्या !

जलते ही दीपक के आते
परवानों की क्या भाषा है ?
कफन लपेटे चलने वाले
दीवानों की क्या आशा है ?

चढ़ी नदी में झाग उबलते
तुम छान सकोगे क्या !

कोई है जो जगत नियंत्रित
करता रहता पलपल क्षणक्षण
सब पर उसका गहरा पहरा
धरती अंबर जल थल कणकण

दुनियादारी जीने वाले
तुम ध्यान सकोगे क्या !

शिव-मधुसूदन का प्रेमभाव
नहीं देह में प्रेम बसे हैं
उमा – भवानी राधा – धारा
बूँद बूँद में नेह बसे हैं

मिलकर भी मिलना ना होता
तुम भान सकोगे क्या !

तुम्हारे नाम

हारे हुए समय की जीवित
प्यारी जीत तुम्हारे नाम !
लय के सम्मोहन में ग्रंथित
सारे गीत तुम्हारे नाम !

पोथी पतरा गीत गजल सब
आखर आखर तुमको जाँचें
जंगल नदियाँ सागर पर्वत
पाथर पाथर तुमको बाँचें

कोयल बुलबुल तितली मधुकर
सबकी प्रीत तुम्हारे नाम !

खुशबू तेरी शब्द शब्द में
छंद छंद में रूप तुम्हारा
पन्ने पन्ने बरबस अंकित
मधुु मकरंद अनूप तुम्हारा

स्मृतियों में राग सुसज्जित जो
मनहर रीत तुम्हारे नाम !

सूरज – चंदा आते – जाते
बादल-बादल रंग बिखेरे
फूल फूल के गंध बंध ले
शतदल शतदल तुम्हें उकेरे

घुमड़ रहे हैं संवेदन में
शब्दातीत तुम्हारे नाम !

एक कहानी

सीमा तोड़ नदी उमड़ी है
तटबंधों पर बल्ले -बल्ले!

थोड़ी बरसात हुई जाने
फिर भी भारी अफड़ा तफड़ी
मुखिया जी का कुनबा चौकस
बता रहे सब लफड़ा लफड़ी

शोर मचा है गाँव नगर में
चौकन्ने हैं गली – मोहल्ले!

वायुयान से सुखद नजारे
देखन रजधानी आई है
आएं हैं चमचे बमचे
कहने एक कहानी आई है

भौंचक जनता शोर मचाते
नेता से ज्यादा दुमछल्ले!

थोड़ी राहत शोर अधिक है
अधिक मची है आपा धापी
मुट्ठी भर दाने पर चलती
पुरजोर यहाँ चाँपा चाँपी

कहीं डूबते बाग बगीचे
कहीं फूटते कोमल कल्ले!
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परिचय : लेखक जाने-माने कवि और लेखक हैं. इनकी करीब एक दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं

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