विशिष्ट गीतकार :: धीरज श्रीवास्तव

(1)
क्या रक्खा अब यार गाँव में!
नहीं रहा जब प्यार गाँव में!
बड़कन के दरवाजे पर है
खूँटा गड़ा बुझावन का!
 फोड़ दिया सर कल्लू ने कल
 अब्दुल और खिलावन का!
 गली-गली में बैर भाव बस
 मतलब का व्यवहार गाँव में!
 क्या रक्खा अब यार गाँव में!
 नहीं रहा जब प्यार गाँव में!
बेटी की लुट गई आबरू
बूढ़ा श्याम अभी जिन्दा!
 देख बेबसी बेचारे की
 मजा ले रहा गोविन्दा!
 सच का है मुँह धुआँ-धुआँ बस
 झूठों का अधिकार गाँव में!
 क्या रक्खा अब यार गाँव में!
 नहीं रहा जब प्यार गाँव में!
टूट चुकी मर्यादा सारी
बिगड़ों पर प्रतिबन्ध नहीं!
 गौरी भोला चिनगुद में भी
 पहले-सा सम्बन्ध नहीं!
 चोर-उचक्के बने चौधरी
 घूम रहे मक्कार गाँव में!
 क्या रक्खा अब यार गाँव में!
 नहीं रहा जब प्यार गाँव में!
(2)
रामपाल अब नहीं लगाता है कुर्ते में नील!
उसकी खुशियाँ उसके सपने वक्त गया सब लील!
बिन पानी के मछली जैसे
तड़प रहा वह आज!
बिटिया अपनी ब्याहे कैसे
और बचाये लाज!
संघर्षों में सूख चली है आँखों की भी झील।
रामपाल अब नहीं लगाता है कुर्ते में नील!
शहर दिखाये ले जाकर जब
दो हजार हों पास!
संगी साथी कौन दे रहा
नहीं किसी से आस!
ठोक रही बीमारी माँ की छाती में बस कील।
रामपाल अब नहीं लगाता है कुर्ते में नील!
कर्म भाग्य का नहीं संतुलन
बनी गरीबी गाज!
देखे जो लाचारी इसकी
ताक लगाये बाज!
व्यंग्य कसे मुस्काये अक्सर खाँस-खाँस कर चील।
रामपाल अब नहीं लगाता है कुर्ते में नील!
फिर भी हिम्मत क्यों हारे वो
जीना है हर हाल!
पटरी पर ला देगा गाड़ी
आते-आते साल!
रोज-रोज आशाएँ दौड़ें जाने कितने मील।
रामपाल अब नहीं लगाता है कुर्ते में नील!
(3)
आँगन में दीवार पड़ गयी सन्नाटा है द्वारे पर!
फूट-फूटकर अम्मा रोयीं चाचा से बँटवारे पर!
साँझ लगाती मरहम कैसे
भला भूख के कूल्हे पर!
दुख की चढ़ी पतीली हो जब
आशाओं के चूल्हे पर!
हमने ढलते आँसू देखे तुलसी के चैबारे पर!
फूट-फूटकर अम्मा रोयीं चाचा से बँटवारे पर!
तनिक दया भी नहीं दिखायी
सुख जैसे मेहमानों ने!
हृदय दुखाया पल-पल जी भर
चाची के भी तानों ने!
एक-एककर हवन हो गयीं सब खुशियाँ अंगारे पर!
फूट-फूटकर अम्मा रोयीं चाचा से बँटवारे पर!
भाग्य गया वनवास ढूँढ़ने
हँसी उड़ायी लोगों ने!
नाव हमेशा रही भँवर में
फँसा दिया संयोगों ने!
देख-देख बस हँसे जमाना बैठा सिर्फ़ किनारे पर!
फूट-फूटकर अम्मा रोयीं चाचा से बँटवारे पर!
(4)
भाग रही है बचती बचती घिरी हुई है आग ।
देख भयावह स्वप्न रात में अक्सर जाती जाग ।
भाग्य छिपा है अँधियारे में
हुए न पीले हाथ !
काट रही है भरी जवानी
भारी मन के साथ !
उस पर रोज खोदता गंदा घर के पीछे काग ।
देख भयावह स्वप्न रात में अक्सर जाती जाग ।
जब-जब चले मंद पुरवाई
सिसके उसकी प्रीत !
ढूँढ़ निकाला था श्यामू ने
नथुनी में संगीत !
पर सागर में डूब गया है उसका भी अनुराग ।
देख भयावह स्वप्न रात में अक्सर जाती जाग ।
कैसे भला कली मुस्काये
करते भौंरे तंग !
अपना-अपना राग छेड़ते
लगना चाहें अंग !
ताकें झाँकें कीट पतंगे बिन माली का बाग ।
देख भयावह स्वप्न रात में अक्सर जाती जाग ।
अगल-बगल की सखियाँ सारी
खेल रही हैं रंग !
पर जीने की खातिर जुगुरी
सोच रही है ढंग !
बरस रहा अँखियों से सावन कैसे गाये फाग ?
देख भयावह स्वप्न रात में अक्सर जाती जाग ।
(5)
मीठे गीत प्रणय के गाकर
और रात सपनों में आकर
मुझको रोज छला करती है
मेरे गाँव की चिनमुनकी ।
अक्सर कहकर मर जाऊँगी
मुझको बहुत डराती है !
और ठान ले जो जिद अपनी
मुझसे पाँव धराती है !
कभी – कभी रस खूब घोलकर
और कभी वो झूठ बोलकर
अक्सर बहुत कला करती है
मेरे गाँव की चिनमुनकी।
कहीं देख ले साथ गैर के
फिर आफत बन जाती है !
हो करके वह आग बबूला
गुस्से से तन जाती है !
छुप जाती है कभी रूठकर
रोने लगती फूट – फूटकर
शम्मा बन पिघला करती है
मेरे गाँव की चिनमुनकी।
आ पीछे से कभी – कभी वह
आँख बंद कर लेती है !
नह़ी देखता कोई फिर तो
बाँहों में भर लेती है !
सारे नखरे भूल भालकर
मुझ पर यौवन रूप डालकर
सचमुच बहुत भला करती है
मेरे गाँव की चिनमुनकी।
ये दिल है बस सिर्फ उसी का
चंद दिनों की दूरी है !
छोड़ उसे मैं दूर आ गया
उफ ! कितनी मजबूरी है
यादों में पायल छनकाकर
और कभी कंगन खनकाकर
धड़कन संग चला करती है
मेरे गाँव की चिनमुनकी।
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परिचय : धीरज श्रीवास्तव वरीय गीतकार हैं. इनका दो गीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.

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