1
आओ हे! नव वर्ष,
स्वागत !तेरा नव वर्ष, हर्ष-आनन्द चंद कम ले आना
आओ प्रिय,लेकिन अधरों पर प्रतिबंध नहीं लेकर आना!
मुस्काती प्रति प्रत्यूष घड़ी सुस्मित साँझें सतरंग लिएं
चंदा वरती हो विभावरी झिलमिल तारों की जंज लिएं
नित्य निशीथ निमित स्वप्निल आँखें परिकल्पित छवि  साजन की
मधुमय स्वर्णिम भिनसार पुनः दिनकर तुरंग गति मंद लिएं।
दिन बिन बदली-निशि अमा बिना अक्सर अभिलाष नहीं ऐसा –
पर,  भोर भैरवी- साँझ  यमन  स्वरभंग नहीं लेकर आना ।
आओ ! प्रिय,लेकिन अधरों पर प्रतिबंध नहीं लेकर आना!
हो हरित अरण्य सघन सुमनित शाखाएं गाती शज़र- शज़र
मधुकर  मधुपर्णी  मधुरकंठ  गुंजित अनुरागें  प्रहर-प्रहर
शतदल-शतदल कीलाल ललित लतिका-तरुवर का परिरंभण
पाबंद पवन यौवन पा कर पल-पल पुलकित हो ठहर- ठहर
मधुमास,सरस सावन- भादो बस नखत पुष्य ये उचित नहीं !
पाखी  की पाँखों  में  लेकिन  अनुलंब नहीं लेकर आना।
आओ ! प्रिय,लेकिनअधरों पर प्रतिबंध नहीं लेकर आना ।
हो बंद अधर तो शासन तक फटकार नहीं जाती, प्यारे,
हो बंद अधर तो  देवों घर  चीत्कार  नहीं जाते , प्यारे !
आकार न गहते  शब्द मधुर गुपचुप रह जाती मनुहारें-
प्रियतम के खत प्रियवर के दर गुमसुम ले आते हरकारे।
उद्गार शमित संदेशें भ्रमित यदि साँसों पर प्रतिबंध प्रिय!
अकुलित अधरों पर अधिरोपित सौगंध नहीं लेकर आना,
आओ ! प्रिय, लेकिन अधरो पर प्रतिबंध नहीं लेकर आना आना।
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2
कैसे आऐ ऋतुराज ?
धुंध मूँद नित्य नभ की आँखें ,  उपहास करती है ,
शीत भीत निरुद्ध रवि किरणें क्षुधा-प्यास सहती है ।
विहग डाल से विलग  ,पात पर बरफ़ीले आघातें
दुबकी कलियाँ द्रुम-ग्रीवा में सहे पौष सी रातें ।
ओस ,जोश भरने के बदले हरे होश ,घासों के  ,
माघ -निशि में उमड़ा सर्द नद फेंक रहा ज्यों फाँसें !
  प्राकृतिक अनुराग घेरे में,निमिष-निमिष फ़ासिल है ,
  कैसे आये ऋतुराज  ? जहां कदम-कदम  बंदिश है!
कलरव नत कोलाहल चंचल  दबे पीयूषी -अक्षर
हैं अनंग अवरुद्ध, ताल सुर रूद्ध अष्ठ-यामी स्वर ।
तार-सप्तकों पर बजती हैं पश्चिम-राग की धुनें ,
प्रियतम भूली कहीं कोकिला ,पिया पपीहा भूले ।
गमलों में पौधे तन-बौने, रुक्ष हृदय- मन-यौवन,
मरुवन छज्जे पर साजन घर बोल रहें है-मधुवन !
  सरस प्रीत रस, विकल विहग सुर, दोऊँ पर अंकुश है
  कैसे आये  ऋतुराज?  जहां कदम- कदम बंदिश है ।
शठी स्वार्थ में उलझा है नर,स्वप्न, जीत जगत का ,
नयन मस्त औ’ उदर तृप्ति की चाहत में मद रत सा।
स्वर्ण मुकुट नभ- महल हवेली,टकसालों से खुशियाँ
क्रय हो जाती क्षण मात्र में सृजित स्वार्थ की दुनिया !
छींट अतर झट महक गुलाबी यूँ पा जाते प्यासे,
“मदनोत्सव” न्योता नभ को अब जाये क्यों  वसुधा से !
  हृदगत चाहत आहत ! आतिथ्य पर अतथ्य दबिश है
  कैसे  आये  ऋतुराज ? जहां  कदम- कदम बंदिश है !
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3
तिरछी पड़ती धूप तो कुलबुल करने लगता धरती का मन
जानें कौन संदेशा लेकर फिर से सूरज आया होगा !
आसमान की बातों में प्रति-उत्तर उत्तर का नहीं होता
भेज भेज थकी अपना उत्तर धरती प्रश्न समेट रही है
जब भी बहती रूखीं हवाएं फिर प्रश्नों की झड़ी लगी पर
मौन खड़ी तकती सुनती रहती तरुवर की शीर्ष शिराएं
अंबर के इस ढिठाई  पर अब कुछ तो प्रश्न करे वह सूरज
सुन सुन नित्य निश्छल मन दिनकर प्रश्न प्रश्न  उकताया होगा ।
आरी तिरछी घनी रेखाएं खींच रहा है कोई बच्चा
क्या उसमें ऊर्ध्व त्रिभूज भूज ज्यामितीय आकार नहीं है?
सरल सधी पड़ी -सी रेखाएं पढ़ लेती है नभ की आँखें ,
सृजन से शीर्ष-बिंदु जाती वक्र रेखा उद्गार नहीं है ?
नचती धरती  विपथ ना होती मौसम का जैसा हो नर्तन
 बने भले सवाली अंबर पर, इन्द्रधनुष समझाया होगा!
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4
गैर मुनासिब प्रश्न कि पूछो-
                  मुझसे खुशबू गयी कहाँ?
 किस पर मढूँ आरोप ?
              उन्होंने उपवन लूट लिया !
जान रहा हूँ जान रहे हो तुम भी यह
कोई तितली भूखी जिया नहीं करती
लेकिन वे अतिरिक्त जानते हैं शायद
भींगी डाली तितली मिला नहीं करती
सावन आते ही जिनने भर लिये घड़े
क्यों कहूँ ? उन्हीं का दोष-
            उन्होंने गुंजन लूट लिया !
छुप जाएं क्या खुल जाएं है जग जाहिर
जीवित साधक पूजा से वंचित होते
उन थालों में अक्षत चंदन घी बाती
सुप्त हृदय में प्रीत गीत जो संजोते
अभिनंदन प्रियतम का या परमेश्वर का ,
क्यों कहूँ ?उन्हीं का दोष –
               उन्होंने पूजन लूट लिया !
जिन कंठों को मिला नहीं है स्वर अब तक
है उन पर आरोप न गायें मल्हारें
सरी शफरी धुन गुनने में नकामी का
दोष भोगते खड़े किनारे मछुआरे
बहते नद की चंचलता न पची जिन्हें
क्यों कहूँ ?उन्हीं का दोष –
              उन्होंने उछलन लूट लिया !
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5
   पूस के गाँव में माघ का आगमन,
    कोश के फिर बदलते गऐ व्याकरण ।
                मंत्र गाती हवाऐं सुसुम हो गई ,
               ओसकण-ओसकण हो गऐ आचमन ।
तिरछी-तिरछी पड़ी मुस्काती किरण
अर्थवत् , स्नेह जड़ते गये पात पर
सर्द के दर्द पर हर्ष के क़ाफ़िले
नृत्यरत झूम झरते रहे गात पर
शूल भूली कली गंध गुंफित हुई
छंद बुनने लगी फिर नयन दर नयन
         पूस के गाँव में माघ का आगमन
         कोश के फिर बदलते गऐ व्याकरण ।
                 मंत्र गाती हवाएं सुसुम हो गई ,
                 ओसकण-ओसकण हो गये आचमन।
प्रीत के छंद में गंध मिलती गई
गंध के छंद संबंध गढ़ते गये
खो दिये अक्षरों ने भी अरिंद मन
शब्द में राग स्वच्छंद भरते गये
रास में रम गई फिर सभी संधियां
गीत गाने लगे छोड़ अर्चन चमन ।
         पूस के गाँव में माघ का आगमन
         कोश के फिर बदलते गऐ व्याकरण।
                 मंत्र गाती हवाएं सुसुम हो गई
                 ओसकण-ओसकण हो गये आचमन।
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परिचय  : पंकज कु.वसंत , सरैया, बेलसंड, सीतमढ़ी वर्तमान – “शांति-इजोर ” सादपुरा, अघोरिया बाजार ,नीम चौक, मुजफ्फरपुर

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