अर्थ उलट जाते हैं
कुछ बातें
सीधी होती हैं
लेकिन अर्थ उलट जाते हैं
काने को काना
कह देना
आग लगा देता है
अक्सर
गहन अमाँ से भी
हो जाती है
पूरनमासी की टक्कर
एक व्यंजना में ही
दुनिया भर के
अर्थ सिमट जाते हैं
तहखानों से
शब्द निकल
धर लेते हैं मुद्रा सवाल की
लिख देती
लेखनी यहाँ पर
सौर ऊर्जा से
उबाल की
काम नहीं
आती है भाषा
व्यंग्य समर्थ
लिपट जाते हैं
महँगा पड़ जाता
दो पल में
सूरज को दीपक दिखलाना
हम तो
वहीं खड़े हैं
सदियों आगे
ओझल हुआ ज़माना
लोकतंत्र के
महायज्ञ में लोक
हव्य में बँट जाते हैं
संतापों की व्यथा
सर्वोदयी दिवस हैं अपने
जनवादी रातें
राजनीति को भाती
पर पूँजीवादी बातें
जेठ ज़िन्दगी हुई
किन्तु मन तो
आषाढ़ रहा
जलते रेगिस्तानों को
हमने
ताउम्र सहा
आँख मिचौली
रहीं खेलती
घातें-प्रतिघातें
परम्पराओं की दुनिया
हत्या प्रतिरोधों की
भरी वर्जनाओं से
हैं राहें
प्रतिरोधों की
घाव शब्द के
नोच गये हैं
फिर रिश्ते-नाते
चिथड़ा खुशियों से
सुधियों की
लाज छिपाते हैं
संतापों की व्यथा
नयन
चुपचाप सुनाते हैं
ब्रह्मकमल सपनों के
हिमखण्डों में
जलजाते
बेचारी नदी
जी रही है
नगर का अभिशाप
बेचारी नदी
भोगती
थोपा हुआ संताप
बेचारी नदी
जब चली थी
मायके से
सुरभि का वातास लेकर
खिल खिलाती
धार में नव उर्मियों का
हास लेकर
किये सपनों से
मधुर संलाप
बेचारी नदी
संक्रमण से दूर
सूखे हलक की
किस्मत जगाती
संस्कृति की
लहर से थी
सृजन का सरगम सुनाती
सभ्यता ने
था भरा आलाप
बेचारी नदी
भर रही ख़ुद ही
तृषा से
ज़िन्दगी के राग रूठे
कई टुकड़ों में
विभाजित
हो गये विश्वास झूठे
दूर तक
दिखती नहीं
पदचाप बेचारी नदी
बादल घना है
सुबह से ही
उमस है
बादल घना है
आज फिर
बरसात की सम्भावना है
छेड़ती हैं राह में
चंचल हवायें
डरी-सहमी
लग रहीं सारी दिशायें
और उस पर
शिक़ायत करना
मना है
क्रोध में
बिजली अचानक
कड़कड़ाती
आग के कोड़े
धरा को है
डराती
झेलता संत्रास
मौसम
अनमना है
छिप गया है
सूर्य
पर्वत-कंदरा में
बज रहे हैं
मेघ के
विजयी दमामे
रंगधनु का
ताज
माथे पर तना है
शब्दों की व्यर्थता
कुछ कहते हैं
किन्तु बहुत कुछ
रह जाता अनकहा
कि हमने
जितना दर्द सहा
साल रही है
शब्दों की व्यर्थता
अधूरापन
इनके जैसा ही
लगता है
यह पूरा जीवन
जाने किस-किस
अगनी में मन का
हर कोना दहा
वापस हुई सुनामी
छोड़ गई
पोखर-झीलें
साथ ले गयी
सरसीरुह पर
बची रहीं कीलें
लिखा लहू का
धरा जतन से
प्रेम-पत्र वह बहा
पुरखों की
मरजाद गई
थी सदियों की थाती
रहे न साथ-
निभानेवाले
बचपन के साथी
माँ की गयी
पिटारी जिसमें
जाने क्या-क्या रहा
परिचय : मधुकर अष्ठाना के करीब एक दर्जन गीत और ग़ज़ल-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. करीब 26 काव्य-संकलनों का संपादन किया है. देश के कई संस्थाओं से सम्मानित हो चुके हैं. प्रकाशित कृतियों पर 4 लघुशोध-प्रबंध एवं चार विश्वविद्यालयों में पूर्णशोध कार्य चल रहा है.
सम्प्रति: अगस्त, 1998 में राजकीय सेवा (परिवार कल्याण विभाग) से सेवानिवृत्त।
सम्पर्क: ‘विद्यायन’ एस. एस. 108-109, सेक्टर-ई, एल.डी.ए. कॉलोनी, कानपुर रोड, लखनऊ-226012
मोबाइल: 9450447579, 9935582745, 7355594937

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *