1
मन मरुथल तन हुआ कैक्टस
देख अजब दुनियाँ की रीत
ऐसी भावदशा में कोई कैसे लिखे सुहावन गीत
आफत आयी, उठा बवंडर
भीतर संशय और भरा डर
कजरी, मेघ-मल्हार ,रात भर
थर थर थर कर रहे हहर कर
एकाकीपन,त्रास, घुटन की पीड़ा ही युग का संगीत
पाँव तले धरती कँपती है
बज्रपात नभ से होता है
महलों में पार्टी चलती है
पर कुटियों का दिल रोता है
बगुलों के मुख पर हरियाली हंसों का मुखड़ा है पीत
झींगुर विरह राग गाता है
उधर उदास कदम्ब खड़ा है
नंद अनाथ ,यशोदा व्याकुल
मधुवन सूना,ब्रज उजड़ा है
ग्वाल-बाल विक्षिप्त ढूँढते कहाँ गए ओ मन के मीत
ऐसी भावदशा में कोई कैसे लिखे सुहावन गीत
2
शहंशाह दिल्ली में हवा महल बनवाते
बौना होता लोक, तंत्र की खाट खड़ी है
संविधान को कसकर एक चमाट पड़ी है
गूढ़पुरुष सब धननंदों के घर के नौकर
कुर्सी पर हैं ताशों की गड्डी के जोकर
धर्मराज बैठे शकुनी से दांव लड़ाते
दौड़ लगाते मैराथन की डीजल ईंधन
आगे है पेट्रोल रेल का पीछे इंजन
भाग रहा है दाल मगर इन सबसे आगे
लेकिन सरसों तेल अभी मिल्खा सा लागे
गेहूँ, मक्का,धान खड़े केवल चिल्लाते
मोर,पपीहे,कोयल के संग तान भर रहे
कौए,कुक्कुर उल्लू का गुणगान कर रहे
फिर सियार शेरों के खासमखास हुआ है
मानसरोवर बगुलों का आवास हुआ है
हंस सभी अब माला जपते,ध्यान लगाते
3
कितना कुछ चुपचाप सह रही
वह छोटी सी बच्ची
दिखती है वह
सात साल की भोली सी
पर बातें जैसे
राइफल की गोली सी
बनी गरीबी आग दह रही
वह छोटी सी बच्ची
रोज सवेरे चौका-बरतन
करती है
रोटी-पानी सबकी
चिंता करती है
माँ से सारी बात कह रही
वह छोटी सी बच्ची
पढ़ लिखकर उसको
जग में कुछ करना है
जीते जी विघ्नों से
जी भर लड़ना है
गंगा सी निष्पाप बह रही
वह छोटी सी बच्ची
4
नए युग की यह नयी पदचाप है
नाव कागज की नयी मँझधार में
क्या रखा है काठ की पतवार में
नाव से क्या लोभ आओ उड़ चलें
यह विधाता का नया आलाप है
क्या जरूरत है कलम दावात की
क्या जरूरत दवा,रोटी-भात की
स्वर्ग की चाहत गुलाबों की फसल
व्यर्थ काँटों का तुम्हें सन्ताप है
दिन बड़े अच्छे सुहाने हो गए
बन्द दुख के कारखाने हो गए
नीर गंगा का सुपावन ही रहा
राम ने सबको किया निष्पाप है
5
अच्छे दिन का व्यापक हुआ प्रचार
ठूँठ बनाकर छोड़ गया पतझार
जेठ बरसता झुलस रहा लेकिन सावन
ठिठुर रहा मधुमास बिलखता मनभावन
कौन सुने फागुन की करुण पुकार
ठूँठ बनाकर छोड़ गया पतझार
विषधारी लेटे संदली लगा बिस्तर
बाहर खिलता पंकज पंकिल मन भीतर
असगुन करता फूल रहा कचनार
ठूँठ बनाकर छोड़ गया पतझार
निखर रहा सत्ता का निर्मम रूप मगर
अब सूरज की रोक रही है धूप डगर
मोद मनाती जनता की सरकार
ठूँठ बनाकर छोड़ गया पतझार
6
लिख रहा हूँ आज मैं
नूतन सुहाने गीत फिर से
सामने शतरंज सा जग
आँख में नित धूल झोंके
कुछ अधूरी कामनाएँ
फूल बनकर शूल भोंके
काश!यह दुख बाँटने
आते पुराने मीत फिर से
हैं यहीं प्रतिबोध सुख-दुख के
अनोखे साथ मेरे
यहीं चिंता-क्रोध,छल,विश्वास,
धोखे हाथ मेरे
हार पहनाते वही आए
चुराने जीत फिर से
भोर की पहली किरण सा
चल पड़ा था मैं मगन में
दोपहर के सूर्य सा लेकिन
रहा ढलता गगन में
अब निशा का है निमंत्रण
हिय जुड़ाने प्रीत फिर से
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मंझौल, बेगूसराय

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