नवगीत

अम्मा

  • महेश कटारे सुगम

घर में नहीं अकेली अम्मा
तुलसी का घरुवा
गुटका रामायण का
भगवानों से सजा हुआ इक सिंहासन
एक दुधारू गैया
चितकबरी बिल्ली
कच्चा सोंधा लिपा पुता घर का आंगन
रुद्राक्ष की माला
चंदन का टीका
प्रेमभाव के रंग बसाये सांसो में
सूर्यदेव को अर्घ्य
शाम संजा बाती
तिथियों के उपवास बसे विश्वासों में
हिलमिल रहते साथ चैन से
सब की बनी सहेली अम्मा
घर में नहीं अकेली अम्मा

बेटों को वरदान
बहू को आशीषें
दुआ मांगती रहती है भगवानों से
छोड़ अकेला गए
नहीं कुछ इसका गम
प्यारे हैं फिर भी वह ज्यादा प्राणों से
कितना कुछ खोया
कितना कुछ पाया है
साफ-साफ सब कुछ लिक्खा है यादों में
उस घर से अब तो
उनकी अर्थी निकले
ऐसी है एक साध अधूरी साधों में
आई थी जिस घर में बनकर
दुल्हन नई नवेली अम्मा
घर में नहीं अकेली अम्मा

खुशियों के पैबंद
मुसीबत की कीलें
भाव रहित चेहरे को नहीं बदल पाते
दर्दों के एहसास
अभावों के तूफां
भावों के आंगन में नहीं टहल पाते
अनुभव की चादर
मन की हरियाली से
खुश रहने की भाषा उनको भाती है
रिश्तों वाली पौध
प्रेम के पानी से
सिंचित कैसे करें नीति येआती है
झुकी कमर ले तनी खड़ी है
इक अनबूझ पहेली अम्मा
घर में नहीं अकेली अम्मा

 

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