रंजन कुमार झा
(1)
व्याधि तुझे तो आना ही था
सँग कुदरत के इन मनुजों ने
जो  निर्मम व्यवहार किया है
भू, जंगल, पर्वत, नदियों पर
जितना  अत्याचार किया है
इस सबसे आहत हो उसको
रौद्र रूप दिखलाना ही था
व्याधि तुझे तो आना ही था
धन वैभव मेरे हों वसुधा
पर मेरा ही राज रहे बस
हर मानव की चाह यही
उसके ही सिर पर ताज रहे बस
क्षत-विक्षत तब कायनात को
एक कहर बरपाना ही था
व्याधि तुझे तो आना ही था
धर्म-ध्वजा पाखंडी के भी
हाथों में जब नाच रही हो
और सियासत फर्क भेद की
बातें केवल बाँच रही हो
तब समता का इक संदेशा
कुदरत को भिजवाना ही था
व्याधि तुझे तो आना ही था
2
गीतों में ही मुमकिन है
कुछ बात तुम्हें कह जाने की
कितने दिन तक और प्रतीक्षा
करूं तुम्हारे आने की
गुजर गए दिन आलिंगन के
बीत गए दिन चुंबन के
वैलेंटाइन में गुलाब के
पुष्प झरे सब उपवन के
मन्नत हर रह गई अधूरी
प्यार तुम्हारा पाने की
तुम आती उससे पहले
कोरोना का आगमन हुआ
पाबंदी की इस जद में अब
मुश्किल अपना मिलन हुआ
तुमको भी शायद तलाश थी
ऐसे किसी बहाने की
युग भर से टक देख रहा मैं
खिड़की छत दरवाजों को
ये भी शायद खोज रहे हैं
पहचानी आवाजों को
दीवारों को आदत सी
हो गई मुझे समझाने की
कुछ उदास कुछ बेकल लेकिन
तुम भी तो रहती होगी
इस बिरहा की टीस  न जाने
किस विधि तुम सहती होगी
कोशिश सब निष्फल हो जाती
होगी मुझे भुलाने की
कितने दिन तक और प्रतीक्षा
करूं तुम्हारे आने की

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परिचय : रंजन कुमार झा साहित्य की विभिन्न विधाओं में निरंतर लिख रहे हैँ.

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