विशिष्ट गीतकार : राजेन्द्र वर्मा

1

 पीठ पर माँ

बेटा माँ को लाद पीठ पर

चला गाँव को ।

देश बंद है, ख़त्म हुआ

सब दाना पानी,

दो रोटी देने में भी

काँखे रजधानी,

 

रेल-बसें सब

हक्का-बक्का खड़ी हुई हैं,

अब तो चलते ही रहना,

रुकना न पाँव को ।

 

सत्ता दुबकी-दुबकी बैठी

चिन्तन करती,

चोर-शाह का खेल खेलती,

झोली भरती,

 

कोरोना सबकी छाती पर

मूँग दल रहा,

मात दे रहे मास्क-मुखौटे

काँव-काँव को ।

 

कैसे भी, अब तो

काले कोसों चलना है,

रस्ते में ही सूरज को

उगना-ढलना है,

 

थके-थके पाँवों में

छाले उभर रहे हैं,

देखो, कब तक चले ज़िंदगी

बिना छाँव के ॥

2

तुम कुछ भी कर लो

अब ये अर्दब में न रहेंगे,

तुम कुछ भी कर लो ।

 

मोहभंग हो गया सभी का,

घूम गया है सर,

अब ये जाकर ही मानेंगे

अपने-अपने घर,

 

धारा के सँग नहीं बहेंगे,

तुम कुछ भी कर लो ।

 

शहरी मॉडल फ़ेल हुआ,

यह सबने जान लिया,

कंधों पर अब जुआ नहीं,

यह सबने ठान लिया,

 

माची में भी नहीं नहेंगे,

तुम कुछ भी कर लो ।

 

 

हाथों की टूटी लकीर ले

जन्मे थे लेकिन,

तुमने भी तो बड़े जतन से

टाँक दिये दुर्दिन,

 

क़िस्मत की अब ये न सहेंगे,

तुम कुछ भी कर लो ।।

3

कुछ भला भी है

यों, तबाही है बहुत,

पर, कुछ

भला भी है ।

 

आदमी बंदी बना

घर में रहे ऐसे,

पंख बिंध जाएँ अगर,

पंछी उड़े कैसे,

 

मन विकल है,

पर, सहज पथ पर

चला भी है ।

 

स्वच्छ गगनाँचल टँके

झिलमिल करें तारे,

स्वच्छ निर्मल नीर

सरिताएँ हृदय धारे,

 

पवन साक्षी,

धूम्र का परबत

गला भी है ।

 

आपदा बाना नया

धरकर सदा आती,

किस तरह जीवन जियें,

यह सीख दे जाती,

 

दुःख से ऊबा समय

सुख में

ढला भी है ॥

…………………………………….

परिचय :  साहित्य की विभिन्न विधाओं में दो दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित

संपर्क : 3/29 विकास नगर, लखनऊ 226 022  (मो. 80096 60096)

ई-मेल : rajendrapverma@gmail.com

 

 

 

 

 

 

 

  

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