विशिष्ट गीतकार : वीरेन्द्र आस्तिक

सर-सर बहा पवन

अकस्मात इस मधुवन में
सर-सर बहा पवन
तभी देखने में आया
इक नटखट मौसम

झूम उठी हर टहनी जैसे
झूम उठें झूमर
कई जंगली चिड़ियां बैठी
झूल रही उन पर

चमक क्षितिज पर बिजुरी भी
मचा गई हड़कम

पेड़ों-पेड़ों उड़-उड़ बैठें
मोर, धनेश पिकी
चंचु दबाए तिनका बैठी
चुप-चुप एक खगी

कर्ण-कुहर में कूज भरी
दृग झूमें शीशम

एक कबूतर के जोड़े में
छिड़ी हुई मनुहार
देख रही हैं हम दोनों की
आँखे मिलकर चार

सटे करों की मुट्ठी में
कसे हुए हैं हम

तभी देखने में आया
इक नटखट मौसम

फिलहाल गाएं

वक्त कितना है जटिल
कैसे बताएं
दिख रहे बदलाव को
फिलहाल गाएं

शब्द को कीचड़ बना
यूँ वाक्युद्धों ने उछाला
खुद हुए बदशक्ल,
लोगों को
भरम से पड़ा पाला

पूर्वजों का आइना
उनको अभी भी
क्या दिखाएँ?

बात सुख की कम करें
दुख की सुने- अपना बना लें
चुन लिया इस भीड़ ने,
जो प्यार
उसको आजमा लें।

जीत की दुल्हन का
घूँघट
जरा आहिस्ता उठाएं

एक छलिया मोहिनी के
भेष में कब तक छलेगा
जीत सच की है बहुत नजदीक
फिर उत्सव मनेगा

गुम हुए इस आदमी को
कुछ हँसाएं,
गुदगुदाएं

आँसू की संस्कृति
भावुक ही
दुखिया-मन जाने
आँसू सत्य जनाए

जब-जब चोट पड़ी हिरदय पर
अंँखियाँ भर-भर आईं
इस जग में रोए रघुपति भी
समझ काम कब आई

संबंधों की मोह-कथा को
रो-रो व्यथित बताए

बाज़ारों में खोजे मन, पर
भावुक व्यक्ति न मिलते,
बुद्धिवाद की इस आँधी में
हृदयवाद कब चलते

कहने भर को नाते-रिश्ते
मतलब आँख मिलाए

नारी-रूप भवानी, यानी
करूणा होए बल है
वसुन्धरा की सारी सुषमा
का कारण तो जल है

अर्थ बताने में आँसू के
संस्कृति निज गुण गाए

नादकंठी

घर कि जैसे
एक सितार है
और वह दिन भर
बजा करता

एक स्वर यदि बेसुरा हो
कान सबके चैंकते हैं
जो सही स्वर है, उसी को
सब पकड़ना चाहते हैं

और वह
कल्पित सुरीला स्वर
तार घर भर के
कसा करता

फूल से मन खूब महकें
भाव अच्छे याद आएं
तार सातों मिल के कोई
एक सुमधुर राग गाएं

घर कभी तो
राग बहार है
सकल दिन
उत्सव मना करता

गीत में, संगीत में जब
शब्द, स्वर इकतान होते
अर्थ की औ’ भाव की लय
के निनादित बोल होते

घर की जैसे
नादकंठी है
जो सभी का
दिल छुआ करता।

काम अपना क्या यहाँ

हो गई बाजार दुनिया
औ’ अकेले हम

हर तरफ देखें
दुकानें ही दुकानें
हर तरफ हर चीज़ के
सुन्दर फसाने

दाम असली
चीज़ नकली
और झेले ंहम

प्यार हो या रोग हो
सब हैं बिकाऊ
डाक्टर, दिलदार
इनके दाँत खाऊ
लोभ की आँखों में
जैसे सोन-केले हम

सब तो सोने लाल हैं
मानव नहीं है
इस नगर में एक भी
पारस नहीं है।

काम अपना क्या यहाँ
माटी के ढे़ले हम।
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परिचय : गीतकार के कई गीत पत्रिकाओं में प्रकाशित
मो0 9415474755

 

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