विशिष्ट गीतकार :: शुभम् श्रीवास्तव ओम्

एक चिड़िया फड़फड़ाती

अब असम्भव हो रहा है
इस व्यथा को शब्द देना
रील में उलझे हुए पर
एक चिड़िया फड़फड़ाती।

उँगलियों के पोर में कुछ
काँच के जैसा करकता
देखती है आँख दिन में
कुछ धुँए जैसा उतरता

सामने हैं पुल धसकते
और ट्रेनें धड़धड़ाती।।

एक ईशारे पर हुए पथराव
घायल छत- मुँडेरे
बढ़ रहीं लपटें सुबह की ओर
यूँ आँखे तरेरे

नींद खुल जाती अचानक
और खिड़की खड़खड़ाती।

जीवन में गीतों का होना

जीवन में गीतों का होना
चाहे मुश्किल हो,
गीतों में जीवन का होना
बहुत जरूरी है।

गीत जिएंगे आग जिएगी
भीतर के सब राग जिएंगे
उत्पीड़ित अनुभव से उपजे
उद्वेलित अनुभाग जिएंगे

सपनों में गीतों का होना
चाहे मुश्किल हो
गीतों में सपनों का होना
बहुत जरूरी है।

नर्म दूब पर दाँत दूधिया
आँगन धूप और किलकारी
बंजारे बरगद का मरना
सूखे आँख-सिसकती क्यारी

मौसम में गीतों का होना
चाहे मुश्किल हो
गीतों में मौसम का होना
बहुत जरूरी है।

हर पथराते क्षण में
थोड़ी नर्माहट कच्चापन होना
कितना मुश्किल है चेहरों की
भाषा में- सच्चापन होना

सच का गीतात्मक हो पाना
चाहे मुश्किल हो
गीतों में सच्चाई होना
बहुत जरूरी है।

मेरी कोशिश

मेरी कोशिश
हर चेहरे को
पहले सा मुस्काता देखूँ।

यह कोई
अध्याय नहीं है
केवल आमुख है
अप्रस्तुत
रह जाने का भी
अपना सुख है

मैं किरणों से
धूप बाँधकर
सूरज नया बनाता देखूँ।

घेरे हुए
खड़े मिथकों का
आक्रामक स्वर है
खुद में
कई कतारें
कितना डाउन सर्वर है

इच्छाओं की
उहापोह है
किसको आता-जाता देखूँ!

कुहरे में
सच की कितनी ही
आत्मकथाएँ हैं
भीतर
भारीपन है
बाहर गर्म हवाएँ हैं

मैं हर मौसम में
चिड़ियों को
आपस में बतियाता देखूँ।

चुभते हैं कोलाज

सर पर बढ़ता बोझ
पैर के नीचे खुदी जमीन,
नये कैलेण्डर की अगवानी
हर चेहरा “आमीन”!

चुभते हैं कोलाज पुराने
सहमी हुई सदी की आँखें
दो-तरफा संवेग पनपता
सारे आशय बगले झाँके

संकेतो ने अर्थ दिये
हालात बड़े संगीन।

मनोभाव कुण्ठित- अभिशापित
उच्छृंखल “हिप-हाॅपी” नर्तन
कण्ठ खो रही है गौरैया
सपनों का नीरव आन्दोलन

आँगन ने दाने छितराये
लौटा नहीं यकीन।

अंतिम कोशिश हाँफ रही है
झोंक व्हिसल में ताकत पूरी
नहीं ताड़ती मगर नजाकत
यह बढ़ती रोबोटी पीढ़ी

चौराहे के चारो सिग्नल
एक साथ हैं ग्रीन।

एक झील की चुप्पी

और गहराई है मीलो-मील की चुप्पी,
क्या मिला है तोड़कर
एक झील की चुप्पी!

कई पन्ने बैंगनी
तल से सटे जो
हैं समय से चोट खायी
आहटें जो

उभर आते हैं सुनहरा रंग पाकर
टूटती आखेटचारी
चील की चुप्पी।

खुरदुरे सपने
अचानक से जगाते
कई साये पंख पाकर
फड़फड़ाते

भीतरी नासूर रह-रह फूट आता
होंठ तक केवल पहुँचती
कील की चुप्पी।

यह मिथक या सत्य
तय करना कठिन है
सीढ़ियाँ चढ़कर फिसलते
रोज दिन हैं

हैंग होकर,रह गया है कैमरा जब
क्या खुलेगी एक उलझी
रील की चुप्पी!

समय, जहरीली हँसी
फिर हँस रहा है
फाँस जैसा कुछ
गले में धँस रहा है

जा चुके सारे नजारे आग बोकर
हाथ आई बस
बुझी कंदील की चुप्पी!

उदास घड़ी

गूँगी-बहरी दीवारों पर
एक उदास घड़ी।

विचारार्थ अब भी रसीद है
“बड़े स्साब” का टेबल खाली
अजगर डस्टबिन की अर्जी
बिल फर्जी है बातें जाली

सरकारी कैलेण्डर का
सहती उपहास घड़ी।

कल-पुर्जों की माँगें फिर भी
हेडफोन-रीमिक्स तराने
गुमसुम चलने लगी आजकल
वही व्यस्तता, वही बहाने

ब्रेड-कर्टसी, ठगी और
करती उपवास घड़ी

कुहरा, सड़कें, रूठा सूरज
पंचिंग-दौड़ और कोलाहल
ठीक समय पर कमरे खुलते
आदिम और मशीनी हलचल

धूप जोहती छत-
दिन ढलने का अहसास घड़ी।
…………………………………..
परिचय : गीतकार के दो गीत-संग्रह प्रकाशित. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन
मीरजापुर (उ०प्र०)- 23100
मोबाइल- 7668788189,
इमेल- shubham.omji@gmail.com<br

 

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