विशिष्ट गीतकार :: गरिमा सक्सेना

(1)
प्रिये तुम्हारी आँखों ने कल
दिल का हर पन्ना खोला था
दिल से दिल के संदेशे सब
होठों से तुमने लौटाये
प्रेम सिंधु में उठी लहर जो
कब तक रोके से रुक पाये
लेकिन मुझसे छिपा न पाये
रंग प्यार ने जो घोला था
उल्टी पुस्तक के पीछे से
खेली लुका-छिपी आँखों ने
पल में कई उड़ानें भर लीं
चंचल सी मन की पाँखों ने
मैने भी तुमको मन ही मन
अपनी आँखों से तोला था
नज़रों के टकराने भर से
चेहरे का जयपुर बन जाना
बहुत क्यूट था सच कहती हूँ
जानबूझ मुझसे टकराना
कितना कुछ कहना था तुमको
लेकिन बस साॅरी बोला था
(2)
चंदा और सितारे बैठे
आपस में खुसफुस करते हैं
देख-देख कर प्रीत हमारी
लगता है ये भी जलते हैं
आभा जब भी पड़े तुम्हारी
अधरों की कलियाँ खिल जातीं
मन के मानसरोवर में कुछ
हंसनियाँ आकर इठलातीं
क्या भावों को उपमा दूँ  ,
उपमान सभी फीके लगते हैं
सुखद पलों की तितली उड़-उड़
बैठे सुधियों के आँगन में
नये-नये रंगों को लाकर
बिखराती मेरे दामन में
लगें दूधिया सी रातें अौ
सिंदूरी से दिन खिलते हैं
सपनों की मेंहदी, हथेलियाँ
 सुर्ख रचा मंगल गातीं हैं
कोई नाम तुम्हारा ले तो
अँखियाँ  झट से मुड़ जातीं हैं
तोड़ चुके अनुबंध स्वयं से
इक दूजे में हम बसते हैं
(3)
केलेण्डर के त्योहारों से मुझको क्या करना है
एक तुम्हारा आना ही लगती होली-दीवाली
रोज प्रतीक्षा करती आँखें सतिया सी द्वारे पर
मन भी वहीं भावरंगों की रंगोली देता धर
बंदनवार बनाकर बाँधू मुस्कानें अधरों की
लड़ियां जगमग तारों की कुछ नेह गुथे गजरों की
शरद चंद्रमा का अमृत तुम लाते हो जीवन में
भर जाता है रास-रंग से जीवन मेरा खाली
हँसी-ठिठोली, रंग-रँगोली मन से मन की बातें
नोक-झोक की फुलझरियाें से सजी-धजी सौगातें
गुझिया, पुए, पुड़ियाँ, लड्डू रसगुल्ले हर्षाते
मेरे दिल का प्यार चिट्ठियाँ बन तुम तक पहुंचाते
तुम चख लेते हो तो भोजन भी
प्रसाद हो जाता
छप्पन भोगों जैसी खुशियों से सजती है थाली
मन को कोयल भाती, सावन हो जाता है जीवन
सूखे मन बादल बनकर छाते आँखों के घन
गीत मिलन वाले सारे मेरे दिल को तब भाते
जब हम दोनों साथ हाथ में हाथ पकड़ कर गाते
गरम चाय की चुस्की के सँग होती ढेरों बातें
होठों की लाली को पाकर खुश हो जाती प्याली
(4)
चाँद की करते प्रतीक्षा, हैं विकल ये द्वय नयन
माँग में तुम, पायलों में, नथ, महावर, बालियों में
लाल जोड़ा, लाल बिंदी, तुम खनकती चूड़ियों में
प्रीत की मणियों व डोरी से गुंथे गलहार में हो
इन सभी शृंगार के तुम अर्थ में,  आधार में हो
तुम युगों की हो तपस्या प्रिय तुम्हीं वरदान धन
भाग्य को सौभाग्य का पथ, प्रिय तुम्हीं ने है बनाया
इक तुम्हें पाकर हृदय ने, ज्यों सकल संसार पाया
अन्न-जल का त्याग कर प्रिय आज यह उपवास धारा
चाँद से माँगू दुआयें और वारूँ नेह सारा
व्रत अगन में तन तपाकर कर रही मन से हवन
साथ यह अपना अमर हो, नेह जीवन भर रहे प्रिय
आस्था विश्वास की यह गंग जीवन भर बहे प्रिय
चाँद औ तारे बनेंगे साक्षी इस प्यार के प्रिय
गीत होंगे अब हमारे प्यार के, त्योहार के प्रिय
प्रेम के इस पुण्य पथ से जुड़ रहे धरती-गगन
थाल से कुमकुम उठाकर मांग में तुम साज देना
चांद कहकर चांद के सम्मुख मुझे आवाज देना
रस्म करवा की निभाकर जल तुम्हारे हाथ पाऊँ
चाहती हूँ हर जनम में बस तुम्हारा साथ पाऊँ
सात वचनों को निभाने का पुन: लेंगे वचन
(5)
नैना तकते राह नींद की
सपनों में ही तुम मिलते हो
टूटे बिखरे आधे सपने
पूर्ण करूं सपनों में जाकर
कुछ पल को ही सही ये मगर
पाऊँ खुद को तुममें खोकर
करे सुवासित जो अंतरमन
रजनीगंधा-सा खिलते हो
ओस बूँद का जीवन जैसे
धूप नरम रहने तक बाकी
साथ तुम्हारा मेरा वैसे
सिर्फ भरम रहने तक बाकी
भरम टूटने पर भी मन में
‘लेकिन पल-पल तुम पलते हो’
सिरहाने पर तुम सी खुशबू
मिलती है जाने अनजाने
गीला तकिया, भीगी पलकें
चाहें प्यार भरे अफसाने
भावों के उमड़े बादल से
तुम आँसू बनकर झरते हो
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परिचय : गरिमा सक्सेना चर्चित कवयित्री हैं. इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं.
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