विशिष्ट गीतकार :: शैलेंद्र शर्मा

सावन के झूले

यादों में शेष रहे
सावन के झूले

गाँव-गाँव
फैल गई
शहरों की धूल
छुईमुई
पुरवा पर
हँसते बबूल

रह-रहके
सूरज
तरेरता है आँखें
बाहों में
भरने को
दौड़ते बगूले

मक्का के
खेत पर
सूने मचान
उच्छ्वासें
लेते हैं
पियराये धान

सूनी पगडण्डी
सूने हैं बाग
कोयल -पपीहे के
कण्ठ
गीत भूले

मुखिया का बेटा
लिए
चार शोहदे
क्या पता
कब-कहाँ
फसाद
कोई बो दे

डरती
आशंका से
झूले की पेंग
कहो भला
कब-कैसे
अम्बर को छू ले .

कर्जों की बैसाखी पर

कर्जों की बैसाखी पर है
दौड़ रही रौनक

‘ओवन’, ‘ए.सी.’, ‘वाशिंग मशीन’
और ‘वैकुअम क्लीनर’
सोफों-पर्दों-कालीनों से
दमके सारा घर

जेबें नहीं टटोलीं अपनी
ऐसी चढ़ी सनक

दो पहिये को धक्का देकर
घुसे चार पहिये
महँगा मोबाइल ‘पाकेट’ में
‘लाकेट’ क्या कहिये

किश्तों में जा रहीं पगारें
ऊपर तड़क-भड़क

दूध-दवाई-फल-सब्जी पर
कतर-ब्यौंत चलती
माँ की चश्मे की हसरत भी
रहे हाथ मलती

बात-बात पर घरवाली भी
देती उन्हें झिड़क

‘नून-तेल-लकड़ी’ का चक्कर
रह-रह सिर पकड़े
फिर भी चौबिस घंटे रहते
वे अकड़े-अकड़े

दूर-दूर तक मुस्कानों की
दिखती नही झलक

नई सदी ने

नई सदी ने
गली-गली में
ऐसा किया विकास
झेल रही है
बूढ़ी पीढ़ी
रोज नये संत्रास

उजले-उजले
सपने बोये
पनपे, स्याह हुए
औलादें
हो गईं पराई
जबसे ब्याह हुए

उनके हिस्से
पड़ी दुछत्ती
बाजू में संडास

कहाँ दवाई
खाना भी कब
मिलता टाइम से
चिपके रहते हैं
खटिया पर
थूके ‘च्युंगम’ से

पेपर को
पढ़ने की खातिर
‘मैग्नीफाइंग-ग्लास’

पिंजर पर
लटका करती है
वर्षों से उतरन
तन से ज्यादा
झेल रहा मन
पोर-पोर टूटन

नई सदी ने
रच डाला है
एक नया इतिहास

रो रही बरखा दिवानी

रात के पहले प्रहर से
रो रही बरखा दिवानी
हो गई है भोर लेकिन
आँख का थमता न पानी

आ गई फिर याद निष्ठुर
चुभ गये पिन ढ़ेर सारे
है किसे फुर्सत कि बैठे
घाव सहलाये-संवारे

मन सुनाता स्वत: मन को
आपबीती मुँहजबानी

नियति की सौगात थी
कुछ दिन रहे मेंहदी-महावर
किन्तु झोंका एक आया
और सपने हुए बेघर

डाल से बिछुड़ी अभागिन
हुई गुमसुम रातरानी

कौंधती हैं बिजलियाँ फिर
और बढ़ जाता अँधेरा
उठ रहा है शोर फिर से
बाढ़ ने है गाँव घेरा

लग रहा फिर पंचनामा
गढ़ेगा कोई कहानी.

नई सदी के नये गीत हैं

नई सदी के
नये गीत हैं
कहीं ताप हैं , कहीं शीत हैं

कुहरीले हैं कहीं
कहीं पर
मधुऋतु जैसे धूप-धुले हैं
रोशनदानों
और खिड़कियों
दरवाजों से खुले-खुले हैं

ऊँची-नीची
पगडण्डी पर
कहीं हार हैं , कहीं जीत हैं

देशकाल में
विचरण करते
संवेदन में ये प्रवीण हैं
ये किंकर हैं
ये ही शंकर
नित्य सनातन, चिर नवीन हैं

इनकी आन-बान
अपनी है
यें पंकिल हैं, पर पुनीत हैं

चट्टानों को
पिघलायेंगे
दलदल का पानी सोखेंगे
परती-ऊसर में
ये उगकर
धरती का श्रंगार करेंगे

ये कबीर हैं
ये कलाम हैं
अधुनातन हैं, शुभ अतीत हैं
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परिचय : लेखक के कई संग्रह प्रकाशित
पता : 238/12 शास्त्री नगर, कानपुर-208005
मो : 9336818330, 6387022049

 

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