विशिष्ट गीतकार : संध्या सिंह

चौमासा 
थोड़ी धूप छुपा कर रखना
सीलन का मौसम आना है

सागर से विकराल भयानक
काले काले दैत्य उठेंगे
जहाँ प्रेम की लिखी इबारत
ठीक वहीं जा कर बरसेंगे

जम जायेगी काई मन पर
अपने पाँव जमा कर रखना
फिसलन का मौसम आना है

सन्नाटे में साँय साँय कर
हवा डराने को निकलेगी
तेरा कुछ अनकहा चुरा कर
पत्ते पत्ते पर लिख देगी

शायद तुझ पर गिरे बिजलियाँ
थोड़ा धीर बचा कर रखना
विचलन का मौसम आना है

मन बांचे तरुणाई  
मंजिल खेले  आँख मिचौली
छूटे फिसल फिसल कर
हमने पैरों को बहलाया
रस्ते  बदल-बदल कर

जहां मिली उपजाऊ मिट्टी
जल का स्रोत वहीं था
धूप हवा भी वहीं मिले पर
भीतर बीज नहीं था

पर जिद्दी मन वहीं ढूंढता
छाया टहल- टहल कर

मन पर जमी बर्फ की परतें
बरसों धुंध मिली थी
नज़र पडी सूरज की जब से
थोड़ी धूप खिली थी

आँखों में हिम खंड दर्द के
रिसते पिघल पिघल कर

अंतर्द्वंद्व समूचा जीवन
खुद से एक लड़ाई
तन पढता है कथा उम्र की
मन बांचे तरुणाई

चले सब्र की रस्सी पर ये
सपने संभल-संभल कर

साफ़ बयानी     
ऊबे दिन बासी रातों से
कैसे नयी कहानी लिख दें
पाँव तले पिघला लावा है
कैसे बहता पानी लिख दें

एक झरोखे दिन उगता है
दूजे में ढल जाता है
वही धूप का टुकड़ा दिन भर
रेंग रेंग कर बहलाता है

गड़े हुए खूंटे से बंध कर
कैसे भला रवानी लिख दें

काले प्रेत सरीखा अम्बर
तारा तारा अंगारा सा
दिन के सारे ज़ख्म टीसते
दर्द फूटता जल धारा सा

टिक टिक करके रात कटी है
कैसे भोर सुहानी लिख दें

उधर झोल है सम्बन्धों में
इधर अहम् के तार कसे हैं
यहाँ सिर्फ उपदेश नसीहत
सपने तो उस पार बसे हैं

शब्द शब्द पर कड़ी चौकसी
कैसे साफ़ बयानी लिख दें

मंजिल की जिद पत्थर जैसी 
कस कर नाव
बंधी खूंटे से
इच्छा मगर समंदर जैसी
उम्र भले
जल की धारा हो
मंजिल की जिद पत्थर जैसी

जीवन की
पुस्तक के भीतर
गम के हैं अध्याय अधिकतर
घाव जलन
दुःख दर्द यातना
चलते रहे राह में सट कर

भीतर मुंह में
घूँट कसैले
पर मुस्कानें शक्कर जैसी

सागर में
भावों की लहरें
मगर शब्द सब तट पर ठहरे
उड़ा दूर तक
मन पाखी सा
धरे रहे तन के सब पहरे

देह भले हो पातालों में
सपनों की हद अम्बर जैसी

दूंढ लेंगे खुद किनारे
तुम भले
पतवार तोड़ो
नाव को मँझधार मोड़ो
हम भंवर
से पार हो कर
ढूंढ लेंगे खुद किनारे

त्याग देगें
गिडगिडा कर
आँख से आंसू बहाना
छोड़ देंगे
वो लताओं
सा लचीलापन पुराना

रीढ़ पर
अपनी उठेंगे
अब उगेंगे बिन सहारे

हो भले ही
स्वर्ण पिंजरा
मगर इसमे कौन ज़िंदा
मत डरो
यदि पर खुले तो
छोड़ देगा घर परिंदा

पाँव धरती पर
टिका कर
ही छुएंगे हम सितारे

ढूंढें नदी हिरन
खंडहर जैसे बूढ़े तन में
जगमग छुपा भवन
रेंग रेंग चलने वालों के
मन में एक गगन

गहन दुखों की मावस में भी
भीतर जुगनू चमके
भले चांदनी ढक लें मेघा
बिजली रह रह दमके

अंधियारे का चीर समंदर
तैरे एक किरन

रिश्तों में पतझड़ का मौसम
खुशबू तिल तिल मरती
हरी पत्तियाँ सौगंधों की
रोज़ टूट कर झरतीं

पर जब ढोया एकाकीपन
खुद से हुआ मिलन

दुनियादारी के जंगल में
सहमी अभिलाषाएं
कर्तव्यों के मेघ गरजते
चिड़िया सी इच्छाएं

भरी दुपहरी ठूंठ वनों में
ढूंढें नदी हिरन
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परिचय : दो साझा संकलन  – कविता समवेत परिदृश्य  एवं अनुभूतियों के इंद्रधनुष काव्य संग्रह का सह संपादन,
तीन काव्य संग्रह प्रकाशित – आखरों के शगुन पंछी,  मौन की झनकार  एवं उनींदे द्वार पर दस्तक
संपर्क सूत्र  – संध्या सिंह , डी. 12205 , इंदिरा नगर , लखनऊ 226016

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