नज़्म

  • सोनिया अक्स 

अभी जिंदा है मेरी मां ,
अभी मैं रो नहीं सकती
अंधेरे लाख घिर आऐं
तजल्ली खो नही सकती
मेरे अश्कों का हर क़तरा
संभाले अपनी पलकों पर
तब्बसुम अपने होंठों की
सजा दे मेरे अधरों पर

बहारें उसके दम से हैं
सभी रौशन ज़माने में
ये वो नायाब गौहर है
कि जो क़िस्मत से पाया है

ये वो नदिया है जिसमें सागर
आकर खुद मचलते हैं
ये वो ईश्वर हैजिसकी
गोद को अल्लाह तरसते़ हैं

मुझे ग़म हो तो आंचल
मां का मेरी भीग जाता है,
वो आके मेरे अधरों को
खुशी से सींच जाता है

अगर हों छातियां सूखी
लहू अपना निचौडे वो
अगर तिरछी निगाह कर दो
कलाई भी मरोडे वो
मेरी मन्नत का वो धागा
सुनो तावीज़ वो मेरा
सहे जग भर की वो तलख़ी
खुशी की गिन्नियां सारी
तसल्ली मुझ को देती हे
मेरी जेबों को भरती है
बसे हैं दूर जा कर जो
आजहम अपनी माऔं से
सभंल पाते़ हैं मुसकाते़ है
बस उसकी दुआओं से ।

मैं रोटी जब बनाती हूं
तो उसमें झाकंती है मां
कभी जब दाल में मुझसे
नमक कुछ तेज हो जाता
तोआकर कान में धीरे से
मंत्र इक फूंक जाती मां

अभी जब रात होती है
तो मां की याद आती है
तो मीठी सी कोई लोरी
मुझे घर को बुलाती है

कभी इक बार जो मैने
कहा था आसमां छू लूं
छुपा कर अपने आंचल में
वो बोली देख ले सोनम
सकल आकाश से विस्तृत
ये तेरी मां का आंचल है

तेरे जीवन के दुख सुख का
यही बस एक सबंल है
वो बातें याद आती हैं
वो रातें याद आती हैं

भले ही जिस्म दो हैं हम
बधें इक तार से ही हैं
तेरी ही कोख का हिस्सा
तेरे दम से ही रोशन है
बरसता है सदा आकर
जहां ख़ुशियों का सावन है
मेरी मां ऐसा आंगन है
मेरी मां ऐसा आंगन है

 

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