अग्निशेखर की कविताओं में प्रकृति के बिम्ब विस्थापन की भावभूमि पर आकर जो रूप लेते हैं , वह दुःख, भय, त्रासदी और आशा के बीच के अंतर्द्वंद्व को जिस काव्यात्मक सौष्ठव और मेधा के साथ प्रकट करते हैं , वह पाठक के मन में कई भावों-अनुभावों का एक ‘ मिश्रित हिलोर  या कम्पन’ (मिक्स्ड वाइब्रेशन) पैदा करता है –
‘छलनी छलनी मेरे आकाश के उपर से
बह रही है
स्‍मृतियों की नदी

ओ मातृभूमि!
क्‍या इस समय हो रही है
मेरे गांव में वर्षा’ ? /कविता -वर्षा
दूसरी बात, यहाँ आकाश का बिम्ब कवि-पात्र की जमीन से अलगाव की पीड़ा के लिए व्यक्त हुआ है और नदी उसकी स्मृति के लिए. आकाश यानी स्वतंत्रता के छलनी-छलनी होने का दुःख सीधे अपनी जमीन और संस्कृति से छूटने का दुःख है. आप यह भी देखते हैं कि कविता में जमीन से नदी का न बहकर आकाश के ऊपर से बहना जिस प्रकृत्यात्मक विलोम में अर्थ-स्फीतियाँ उत्पन्न करती  है, उसकी व्याप्ति कवि के उस अवचेतन मन अर्थात उसकी स्मृति में है , जिसमें वह अपने छूटे हुए गांव में वर्षा की आशा करता है और इसके मानिंद अपनी मातृभूमि से सवाल भी करता है. इस तरह यहां एक ही बिम्ब से जातीय प्रेम (ethnic attachment) के साथ विस्थापन की पीड़ा को सामने लाने का जो दुहरा काव्य – उपक्रम किया गया है , वह काव्य-बिम्बों के शिल्पगत प्रयोग की उत्कृष्ट बानगी है.

जीवन के रागात्मक द्वंद्वों और दुद्धर्ष संघर्षों को व्यक्त करने वाला कवि कभी ‘प्रकृति का सुकुमार’ कवि नहीं बन सकता. उसके यहाँ प्रकृति उसके जीवन के साथ इस तरह से अंतर्ग्रंथित होती है कि प्रकृति के काव्य-उपकरण कवि-जीवन के अनुभवों से एकाकार हो उठते हैं.
महसूस होता है कि कविता की अंतर्वस्तु तब बाह्यगतता से आत्मगतता की ओर प्रसारित होती है. इसके उलट, जिस कवि का लोकानुभव कमजोर होता है , उसकी अंतर्वस्तु चेतना से निकल कर बाहर की प्रवाहित होती है ,  जिससे इन्द्रिय-चेतस मन बाह्य उपकरणों से तादात्म्य स्थापित नहीं कर पाता. फलतः रचना अपनी स्वाभाविक छटा खोकर आत्मबद्ध हो जाती है. इससे रचना में ऊब और तनाव का सृजन होता है, संघर्ष और श्रम का नहीं. यह बुर्जुआ सोच से रची गई कविताओं में अधिक पाया जाता है.
उक्त परिप्रेक्ष्य में आप पाएंगे कि जिस प्रकार सुधीर सक्सेना की कविताओं  में प्रकृति स्त्री-प्रेम का उपकरण बनकर आती है, जैसे शम्भु बादल की कविताओं में वह प्राकृतिक उपादानों ; पशु-पंछियों से जनविद्रोह के प्रस्फुटीकरण का रूप लेकर आती है, अग्निशेखर भी उसी प्रकार प्रकृतिगत बिम्बों से विस्थापन व आतंक के सौंदर्य ( एस्थेटिक्स ऑफ टेरर ) को कविता में अभिव्यंजित करने का काम लेते हैं –
‘गरजते बादलों
और कौंधती बिजलियों के बीच
स्तब्ध है
मेरी अल्पसंख्यक आत्मा
वहीं कहीं अधजले मकान के मलबे पर
जहाँ इतने निर्वासित बरसों की उगी घास में
छिपाकर रखी जाती हैं
पकिस्तान से आईं बंदूकें

यहाँ किसे बख़्शा गया मेरे देश में
निर्दोष होने के जुर्म में
तैरती हैं आज भी हवा में
दहाड़े मारती स्त्रियों की बददुआएँ ‘
…………………………….
आज के दिन कोई आए मेरे पास
ले जाए मुझे
किसी पहाड़ी यात्रा पर
मै छूना चाहता हूँ
एक नया और ताज़ा आकाश/ कविता काला दिवस /
यहाँ ‘निर्वासित बरसों की उगी घास में’ बंदूकों का छिपा रहना उसी बाह्यगत अनुभव का हिस्सा है. कह सकते हैं कि शेखर जी अपनी कविता में मंगलेश डबराल जी की तरह कोई ‘पोएटिक एक्रोबैटिक्स’ पैदा नहीं करते , बल्कि यह उनके कवि के उसी ‘पोएटिक स्किल’ से ही वह गुण प्रकट हो पाता है जिसकी ऊपर चर्चा की गई है. पर यह सब कवियों के वश की बात नहीं. गोया कि, आजकल अनुभवहीन आत्मबद्ध कविताएँ थोक में लिखी जा रही.
यही नहीं, अग्निशेखर की कविताओं की अंतर्वस्तु वस्तुतः उनके उस स्वभुक्त यथार्थ का हिस्सा है जिसमें जलावतनी / पलायन की मार्मिक अभिव्यक्ति कश्मीर के परिवेश के सामाजिक तल के उस कोण से परिलक्षित हुई है जहां आलोचकों ने अब तक एक रूटीन तौर पर ही ध्यान दिया है. उनमें ध्वनित लोकबिम्बों और विरल ख्यालातों पर लोगों की नज़र कम ही गई है.  खासियत यह है कि सघन जीवनानुभव इन्द्रिय-बोध से निःसृत इन कविताओं में विस्थापन के दुःख की जो रागात्मकताएं हैं, वे रूप और कथ्य दोनों स्तरों पर हमें आलोड़ती हैं. इसमें  केवल वर्तमान के क्षण का ही स्पंदन नहीं महसूस होता,  हुतात्माओं की स्मृतियाँ और शहीदों का अनुभव भी दृष्टिगत होता  है जो अग्निशेखर के कवि को इस अर्थ में महत्वपूर्ण बनाता है कि वह लोक-विस्थापन के सबसे अलहदा और विशिष्ट कोटि का सौंदर्य रचते हैं. यह उनके समकालीनों में कहीं मिलता भी है तो इतनी काव्यात्मक गतिकी के साथ नहीं, आप स्वयं ‘कवि का जीवन’ – इनकी एक कविता देखिए –
‘ कविता लिखना
तपे हुए लोहे के घोड़े पर चढ़ना है
या उबलते हुए दरिया में
छलाँग मार कर मिल आना
उन बेचैन हुतात्माओं से
जो करते हैं

हमारी स्मृति में वास
पूछना उनसे शहीद होने के अनुभव
और करना महसूस अनपे रक्त में
उनके नीले होठों पर दम तोड़ चुके
शब्दों को

यह कविता मेरे समय में
किस काग़ज़ पर उतारी जा सकती है
अपने खुलते हुए लहू से
सिवाय बलिवेदी के

ऐसे कवि का जीवन
आकाँक्षा मेरी’ / कविता : कवि का जीवन.
– शहीदों के नीले होठों पर दम तोड़ चुके शब्दों को कागज पर उतारना इस कविता में एक नवीन लोक — सौंदर्य का उन्मेष है जिसमें भय और वीभत्सता का अनुभवसिक्त नीला रंग भी मिला हुआ है.
इसका मतलब यह भी नही कि अग्निशेखर के कवि का बिम्ब हमेशा चेतन-मन से ही नहीं उपजता है, वरन बीच-बीच में उसमें स्मृति और अवचेतनता भी उतनी ही दिखती है, जिसे फैंटेसी या स्वप्न के माध्यम से भी कवि चित्रित करने में सफल हुआ है –
मेरे दोस्त ने सपने में सुने मुझे कविता –
‘मास्को में हिमपात’
…………………..
इतने में चली आई माँ भी कहीं से मेरे पास
मेरे चेहरे पर गिरने लगे
मास्को की बर्फ़ के आवारा फाहे
कुछ अदृश्य छींटे
छुआ मेरी माँ ने आश्चर्य से
मेरे विस्मय को
दंग था वहीँ खड़ा
मेरे कवि दोस्त भी
गिर रही थी जैसे सदियों बाद बर्फ़
जैसे पहली बार भीग रहा था मैं
किसी के प्रेम में

मै आँख मूँद कर निकल पड़ा उस क्षण
बचपन की गलियों
खेत खलिहानों में निर्वासन के पार
बरस दर बरस
…………..
और बर्फ़ गिर रही थी झूम झूमकर
हमारे हाल पर
समय के कमाल पर’
यह फैंटेसी उदय प्रकाश की फैंटेसी – कविता ‘रात में हारमोनियम’ की तरह हमें चौकाती नहीं, न कोई अनर्गल प्रलाप ही करती है, बल्कि कविता की अंतर्वस्तु को मुक्तिबोध की ‘अंधरे में ‘ कई तरह समकालीन सच की परतों को उघाड़ती है.
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2 thoughts on “अग्निशेखर की कविताएं – सुशील कुमार”
  1. मेरी कविताओं की महत्वपूर्ण समीक्षा के लिए सुशील कुमार और आँच सम्पादक डाॅ भावना दोनों का हार्दिक आभार ।
    अग्निशेखर

  2. मेरी कविताओं की महत्वपूर्ण समीक्षा के लिए सुशील कुमार जी का और उसे ‘आँच’ पत्रिका संपादक डाॅ भावना का आभार
    -अग्निशेखर

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