जिंदगी की खूबसूरती को अभिव्यक्त करने वाले ग़ज़लकार हस्तीमल हस्ती
– भागीनाथ वाकले
आदरणीय हरेराम समीप जी  द्वारा सद्य संपादित ‘हस्तीमल हस्ती: चुनिंदा अशआर’ समन्वय प्रकाशन गाज़ियाबाद से प्रकाशित यह पुस्तक उस दृष्टि से महत्वपूर्ण पहल कहीं जा सकती हैं;  जिसका पुनीत उद्देश्य  ‘स्वान्त सुखाय’ के साथ ‘सुरसरि सम सबका हित होई’ जैसा निर्मल और प्रांजल है ।इस  महत प्रयोजन को केंद्र में रखकर ग़ज़ल की सारस्वत सेवा से पसायदान करना वास्तविक संपादक का अपार प्रेम व अगाध श्रद्धा को दर्शाता है। हिंदी ग़ज़ल के समर्पित व्यक्तित्व व एक जुनूनी कर्मयोगी की संघर्ष प्रवृत्ति से हिंदी ग़ज़ल संसार भली भाँति परिचित है। हिंदी ग़ज़ल के प्रस्तार विस्तार,आलोचना-विवेचना-मीमांसा के लिए अहर्निश सेवारत समीप जी के अवदान को उनके ‘समकालीन हिंदी ग़ज़लकार एक अध्ययन’ के चार खंडों के प्रकाशन से आँका जा सकता है। जो भगीरथ प्रयत्न उन्होंने  किए हैं  उसके लिए हिंदी गजल और ग़ज़ल शोधार्थी उनके सदैव ऋणी रहेंगे। इस श्रृंखला में उन्होंने लगभग 4 खंड निकाले हैं जिसमें 118 के आसपास गजलकारों को पुनः प्रकाशित कर नूतन तथ्यों तथा कथ्यों को संकलित कर उसकी पुनर्व्याख्या की है। इसलिए समकालीन हिंदी ग़ज़ल उनकी परम उपकारी है।
     इस दिशा में  समकालीन हिंदी ग़ज़ल कारों के महत्वपूर्ण ग़ज़लों और अशआरों को संकलित कर उस पर अपनी महत्वपूर्ण टिप्पणी देकर संपादन की दिशा में पहला कदम हस्तीमल हस्ती जैसे रौशन ग़ज़लकार को रखकर किया है । इस किताब की भूमिका में उन्होंने हस्ती जी को ‘कबीरी परंपरा की ग़ज़लकार’ के रूप में देखा है । वे आगे कहते हैं – हस्ती जी ईमानदार अनुभूतियों के ग़ज़लकार है। सूक्ष्म जीवनबोध के  ग़ज़लकार हैं। प्रेम और संस्कृति के गायक है। भारतीय परंपरा के ध्वजवाहक है ।हिंदी ग़ज़ल को नया चेहरा देने वाले  ग़ज़लकार है । अर्थात उनकी यह आलोचना दृष्टि रचना का अर्थ खोलने में सहयोग तो कर ही रही है साथ ही रचना का वातावरण तैयार करने में भी एक उद्दीपक की भूमिका का निर्वहन कर रही है। इसलिए हस्ती जी के चुनिंदा अशआर पढ़ने की उत्कंठा और अधिक बढ़ जाती है ।
     किंतु हरेराम जी इस संग्रह में केवल चुनिंदा शेरों की जगह चुनिंदा गज़लें देते ;तो भाव के साथ प्रवाह, लय व गति से निर्माण होने वाले सौंदर्य बोध से संग्रह अधिक आकर्षक और प्रवाहमयी लगता और शेर के साथ ग़ज़ल का भी अपना पूर्ण व्यक्तित्व साकार होता! परंतु यह मेरा वैयक्तिक मत है .शेर अपने आप में प्रभावात्मक होता है किन्तु ग़ज़ल की प्रभविष्णुता  अलग असर छोडती है .खैर बात हस्ती जी के शेरों कई करते हैं –
                हैं दिल में जो मुहब्बत की रौशनी नहीं होती
                 इतनी खूबसूरत ये जिंदगी नहीं होती
जिंदगी की खूबसूरती को खूबसूरत ढंग से अभिव्यक्त करनेवाले ग़जलकार हस्तीमल हस्ती जी जो मुहब्बत की रोशनी अपने दिल में जली है उसको संक्रमित करने के लिए मुहब्बत की मशाल लेकर निकले है । वह मशाल उनकी शायरी है जो निरंतर यह कार्य कर रही है । शायरी के संबंध में इनकी धारणा साधुसम विचारों की परिकल्पना है –
शायरी है सरमाया खुशनसीब लोगों का
बाँस की हर एक टहनी बाँसुरी नहीं होती ।
जैसे कई कालजयी शेरों के मौलिक उद्भावक, हस्तीमल हस्ती के जौहरी आँखों की पारखी ऩजर ही समझ सकती है – ‘बाँस की हर एक टहनी बाँसुरी नहीं होती ।’ बाँसुरी वास्तविक स्वर साधना का प्राकृतिक स्वर यंत्र है : जिसके बनने की प्रक्रिया एक विराट तपो-साधना है । इस समूची प्रक्रिया के उपरांत बाँसुरी स्वर लहरों के आनंद की ऊर्मियो से ़िफजा को आहलादित कर देती है । बाँसुरी निर्माता से बाँसुरी प्राप्तकर्ता तक दोनों ‘खुशनसीब लोगों’ के वर्ग में आते है । जिस बाँस की टहनी ने बाँसुरी का आकार ग्रहण किया है ; उसने अपना जीवन सार्थक बना लिया । लेकिन यह हर टहनी के नसीब में कहा । यह अहोभाग्य का सुख उन्हें कहा ?
शायरी कहे या ़ग़जल एक सूक्ष्म किन्तु कठिन काव्य विधा है ।जिसकी रचना एवं अध्ययन में कड़े अनुशासन की आवश्यकता है । अनुशासन के दौर से गुजरकर ही ़ग़जल के शासन को समझा जा सकता है । प्रतिभा, व्युत्पत्ति एवं अभ्यास की त्रिसूत्री से ़ग़जल के राजमार्ग का स़फर किया जा सकता है । इस त्रिवेणी संगम से ऊपजी ग़जल बाँस की उस टहनी के समान है जिसने बाँसुरी का रूप साकार कर लिया है । एक साधना के बाद मुकम्मल ़ग़जल बन गई है । सैकड़ों अशआरों को माँजकर कुछ ही अशआर चुस्त-दुरूस्त बन जाए, तो उसके पश्चात का आनंद ब्रह्मानंद सहोदर होता है । फिर उस आनंद के सामने दुनिया की सारी धन-संपत्ति फिकी है । ़ग़जलकार स्वयं ‘कंचन वाले’ परिवार का सदस्य होने के बावजूद ‘शायरी को सरमाया’ मानता है और अपने जैसों को खूशनसीब ।
हस्तीमल हस्ती ़ग़जल –संसार की वह हस्ती है। जिनकी ़ग़जल यात्रा एक अनथम, अनथक .यात्री की भाँति करीबन ३०-३५ वर्षों से अविराम ़ग़जल-भारती के चरणों में अश्आर-पुष्पों को अर्पित कर रही है । कविवर हस्तीमल हस्ती समकालीन काव्य-सर्जना के प्रमुख हस्ताक्षर है । एक उच्चकोटि के साहित्यकार, ़ग़जलकार, प्रखर पत्रकार, सिद्धहस्त संपादक पारदर्शी व्यक्ति, सोने-चाँदी के कुशल कारीगर एवं उदार मन के अद्भुत रचनाकार है ।
हस्तीमल हस्ती के व्यक्तित्व के विविध पहलू साहित्याकाश में अपनी आभा प्रभा बिखेर रहे हैं
हस्ती जी ने व्यापक एवं अनेकायामी जीवन के जिन पहलुओं को जिया, देखा, परखा है तथा भोगा है । उनको अपनी ़ग़जलों का विषय बनाया है । ़ग़जल के इस सारस्वत सेवक ने अपनी भावयित्री प्रतिभा का पूर्ण प्रयोग करते हुए ़ग़जल-विधा के उन्नयन में जो सारस्वत सेवाओं का अवदान दिया है । साहित्य जगत उसे कभी विस्मृत नहीं कर सकेगा ।
हस्ती जी के व्यक्तित्व का एक और पहलू है – उनका प्रेममयी स्वभाव । उनके आत्मीय स्वभाव के कारण उनके मित्रों का परिवार निरंतर बढ़ रहा है । प्रेम के विविध पहलू एवं पक्षों को अहमियत देते हुए कई अश्आरों में उसे महिमामंडित करने से नहीं चूकते । इसी प्रेम संबंधी उनका कभी कबिराना अंदाज तो कभी सू़िफयाना अंदाज कई अशआरों सा़फ झलकता है –
सबसे अच्छी प्यार की बाते
बाकी सब बेकार की बाते
वास्तविक हस्ती जी सहज अभिव्यक्ति के ़ग़जलकार है लेकिन उनकी यह सहजता ़ग़जल के शिल्प में भावों की कलात्मक बुनावट के साथ अभिव्यक्त होती है, तो सहजता में भी गहरा अर्थ दे जाती है । वे कहते हैं कि बतियाने में यदि आत्मीयता एवं प्रेम का भाव नहीं है तो सारा गहन तत्वज्ञान भी बेकार है । प्रेम की भावना सभी प्राणी-मात्र में पायी जाती है । लेकिन मनुष्य मात्र को मिला प्रेम अपनी व्यापकता के कारण दैवीय स्वरूप ग्रहण कर लेता है । प्रणय की दिव्य-अनुभूति से प्रेम-पात्र धन्य हो जाता है । बशर्ते वह दैहिक आसक्ति से ऊपर उठकर आत्मिक अनुभूति का अंग बन, तो वह पूजनीय एवं वंदनीय बन जाता है । अनुराग की इस अनन्यता या अनन्य साधना को शायरी के पैकर में ़ग़जलकार यूँ ढालते –
दूसरा अंदाज कोई हमको भाया ही नहीं
या रही तस्वीर तेरी या रही खाली जगह
अपने प्रेमास्पद के अंदाज –ए-स्मरण का यह नया प्रचलन अनुराग की जमीन पर नई प्रथा का सूत्रपात कहा जा सकता है –
जब भी खरीदी नई कलम
पहले उसका नाम लिखा
यह मंजु घोष वैसे ही है जैसे किसी शुभ कार्य के शुभारंभ में भावक भावपन्न स्थिति में अपने आराध्य को चित्रांकित करता है या शब्दांकित । जब प्रेय का मांगल्य समझकर उसकी इबादत की इबारत करना तथा इश्के मजा़जी से ऊपर उठकर इश्के हकीकी बना देना अपने आप में शेर अलग अहसास कराता है ।ऐसे कई शेर है जिनका उल्लेख किया जा सकता है .अंत में एक शेर –
माँ को देखूँ तो ऐसा लगता है ।
जैसे आयत कोई पढ़ी है अभी ।
        ऐसे कतिपय सरस-सुंदर तथा अर्थपूर्ण शेर लिखने की महारत हस्ती जी को हासिल है । किन्तु उसपर विस्तार से चर्चा कभी और !
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पुस्तक चर्चा
हस्तीमल हस्ती चुनिंदा अशआर
संपादक
हरेराम समीप
समन्वय प्रकाशन ,गाज़ियाबाद
मूल्य -200 मात्र
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समीक्षक : भागीनाथ वाकले

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