पुस्तक समीक्षा : अरविंद भट्ट

पुस्तक समीक्षा :: वह सांप सीढ़ी नहीं खेलता
कविता लेखन एक साधना है. यह शब्दों का ताना-बाना भर ही नहीं होता. भावनाओं को व्यक्त करने के लिए शब्दों को साधना पड़ता है, परखना पड़ता है और फिर कल्पना की कसौटी पर कसते हुए एकाकार हो जाना होता है. यह सब कार्य एक साधक ही कर सकता है जिसके ह्रदय में भावनाएं शब्दों का स्पंदन कर

ती हों. जब कोई साधक कल्पनाओं के भंवर में से अपने अतीत को निकाल कर वर्तमान में प्रत्यक्ष करता है और जब वह शब्दरूपों को कागज़ के पृष्ठों पर संजोता है तो एक ‘गणेश गनी’ का जन्म होता है. गणेश गनी साधक ही हैं, शब्दों के साधक. वे शब्दों से खेलते नहीं उनको जीते हैं, वो किस्सागो भी हैं. अपने आस-पास की हर वस्तु, हर दृश्य, हर भाव से कुछ न कुछ ग्रहण करते हुए, तारतम्य बैठाते हुए अपने किस्से सुनाते हुए चलते हैं. वो एक मंझे हुए खिलाड़ी हैं जो सिद्धहस्त है रूपकों को गढ़ने में और वह जिस तरह से रूपकों को अपने अंदाज़े-बयां में उपयोग करते हैं वह गणेश गनी जैसे साधकों के बस की ही बात है.

गनी जी से मैं फेसबुक के माध्यम से ही मिला. यदा-कदा मैं इनकी कुछ पंक्तियाँ देख लिया करता था और उन्हीं कुछ पंक्तियों की परिणति रही कि मैं इनके संपर्क में आया और फिर तो इनकी कविताओं के शब्द परत-दर-परत निकल कर स्वयं ही इनका परिचय देने लगे.
गनी जी कुल्लू से हैं, भारत के इतने सुरम्य स्थान का कवि होना इनकी कविताओं में झलकता है. वादियों की ठण्डी हवा, चट्टानों के बीच से निकलता कल-कल जल ,रंग बदलते पहाड़, बादलों की सरगोशियाँ, सूरज की अठखेलियाँ, यह सब इनकी कविताओं में झलकता है. इन्होने जो जिया वह इनमे रच-बस गया, घुल सा गया और अब वह शब्दों के रूप में छलक रहा है, सराबोर कर रहा है. अपने गाँव, अपने पूर्वजों और अपनी मिटटी को जीते हुए गनी जी आज के सन्दर्भ में भी पैनी नज़र रखते हैं और कहीं न कही उनको घूमते-फिराते अपने गाँव-घर की ओर ले जाते हैं. वह एक बहुत ही चिंतनशील व्यक्ति हैं, उनकी चिन्तनशीलता उनके लेखन में परिलक्षित होती है. उन जैसा प्रकृति प्रेमी और सहृदय व्यक्ति जब साधना से ऊपर उठकर कविताओं की ज़मीन तैयार करता है तो वह निःसंदेह अपने शब्दों से एक काल-खण्ड को जीता है.

‘वह सांप सीढ़ी नहीं खेलता’ गनी जी की 59 कविताओं का संकलन है. इनकी कविताओं के विषय ही इनकी विस्तृत सोच को उजागर करते हैं. कविताओं के केंद्र में गाँव, घर, स्वयं का अतीत, बीती रातें, बच्चे, दोस्त और बहुत कुछ है. हर कविता आपको अलग लोक में ले जाती है, भावनाओं के अनछुए हिस्से को जगाती है और वो सब दिखाती है जो अक्सर हम उन सबके सामने रहते हुए भी नहीं देख पाते, नहीं समझ पाते. कोई व्यक्ति भावनाओं की कितनी गहराई में जाकर सोच सकता है और उनसे कैसे तादात्म्य स्थापित कर सकता है यह गनी जी जानते हैं. वह रूपकों के जादूगर हैं, रूपकों को गढ़ना उनकी फ़ितरत है. इनकी कविताओं के कई अंश आपको अचरज में डाल देते हैं, आप सोच ही नहीं पाते की क्या ऐसा भी सोचा जा सकता है? आप अचंम्भित होते है और किन्कर्व्यविमूढ़ भी. कुछ अंश आपको भीतर तक भेद जाते हैं तो कुछ अंश आपको कविता पढ़ना छोड़ शांत बैठने पर विवश कर देते हैं. कुछ बानगियाँ जो गनी जी की सोच की दुर्लभता को प्रमाणित करती हैं और इनके भावनाओं और शब्दों को चरितार्थ भी.
पहली कविता ‘पीछे चलने वाली पगडंडियाँ’ में अंतिम पंक्ति में व्यक्ति के अतीतजीवी होने और वर्तमान में उसकी प्रासंगिकता को बरकरार रखने की कोशिश का सुंदर चित्रण.
“…पर अपनी बन्दूक को अब भी
चमकाते हैं कभी-कभी धूप में
और साधते हैं निशाना शून्य में…”

इसी तरह कविता ‘जब वह चुप रहता है’ में मानवीय भाव भंगिमाओं का जो चित्र खींचा है वह अद्भुत है. ये दिखाता है की गनी जी सोच से भी परे चले जाते हैं, कल्पनाओं को लांघते हुए नई परिभाषाएं गढ़ते हैं.
“…जब लगता है कि
वह कुछ नहीं कर रहा
दरअसल तब वो इन्द्रधनुष पर
प्रत्यंचा चढ़ाने के बारे में सोच रहा होता है…”

एक अन्य कविता ‘हवा से बातें’ में जब वह कहते हैं
“… जब लगता है कि
हवा नहीं’ चल रही
दरअसल उस वक्त
हवा उसकी बातें सुन रही होती है
वह किस्सागो है
हवा से बातें करना भी
उसकी आदतों में शुमार रहता है…”

प्रकृति और अपने आस-पास के परिवेश को वह बहुत सूक्ष्मता से देखते हैं और अनुभव भी करते हैं. कविता ‘पार की धूप’ इसका सशक्त उदाहरण है. समझना मुश्किल है कि वह अपने परिवेश को जीते हैं या उनका परिवेश उनमें जीता है और यही प्रगाढ़ सम्बन्ध उनसे कविता-कहानियां गढ़वाता चलता है.
“…जब पुल बनेगा
उस पार ठहरा वक्त आएगा इस पार
तो वह वक्त होगा
खेतों के सुनहरी होने तकभुने भुट्टे और उबले कद्दू खाने का
कहीं बीत न जाए मौसम बेशकीमती
दादी को यह चिंता खाए जा रही है…”

अपने परिवेश के साथ वह वर्तमान को भी अपनी दृष्टि में रखते हैं. “उसकी वीरगाथा” कविता में वह आम आदमी की दशा पर कटाक्ष करते हुए कितने प्रभावी ढंग से अपनी बात को कहते हैं.
“…जब उसकी जिजीविषा ही मर गई
तब जाकर उसने
आत्मा को ही मार डालने का फैसला किया
सभी हैरान थे
जो कहते थे आत्मा मरती नहीं…”

ऐसे ही टी वी पर दिखाए जाने वाले भ्रामक विज्ञापनों और अनर्गल प्रलापों पर पर वह तंज कसते हैं. “एक आदमी जश्न मन रहा है” कविता से
“… टी वी पर एक आदमी
कई किस्म के ताबीज़ बेच रहा है
जिनके साथ अन्धविश्वास मुफ्त है
एक आदमी
अलग-अलग रंगों का पानी बेच रहा है
जिनके साथ नशे एकदम मुफ्त हैं…”

“जब कांधे पर हवा बैठकर कहे” कविता से
“…यह सच नहीं है
कि अब सच्ची बातें कहने वाले नहीं मिलते
पर यह भी तो सच है
कि अब सच्ची बातें सहने वाले नहीं मिलते
इसी कहने और सहने के बीच
घुटा रहता है कुछ अनकहा सा…”

समाज में व्याप्त गुटबाजी और इसके तहत समाज के सत्य को हाशिये पर धकेलने की कोशिश को बताते हुए कहते हैं

“…न तो वो प्रेम से डरते हैं
और न ही कवि से
वो तो डरते हैं बस
केवल प्रेम करने वालों से
और कविता से
इसलिए
वो मारना चाहते हैं
प्रेम करने वालों को भीड़ के बल पर
खरीदना चाहते हैं कविता
पुरस्कार के बल पर…”

समाज में लोगों की यथा स्थिति को बताती निम्न पंक्तियों में बहुत कुछ अंदाजा स्वतः लगाया जा सकता है
“…ऐ डरे हुए लोगों
तुम्हारा यह दावा खोखला है
की तुम जिंदा हो
मैं हैरान हूँ
तुम्हारे ठीक उपर आसमान में
जबकि मंडरा रहे हैं गिद्ध…”

गनी जी मर्मस्पर्शी हैं. वो जानते हैं कि हर मर्म की चुभन और छुवन व्यक्ति को कैसे उद्धेलित करती है. बच्चे भी उनकी दृष्टि से अछूते नहीं रहे हैं. उनकी बाल सुलभ क्रियाओं में भी गनी जी कविता को साध लेते हैं. ‘बच्चे जानते हैं’ कविता से
“…बच्चे भीगना चाहते हैं
ठीक वैसे ही जैसे
बड़े बचना चाहते हैं बारिश से…“

गनी जी का अंतर्मन अपने गाँव में बसा है. वह उसको हर पल जीते हैं, अनुभव करते हैं. गावों के बदलते हालात और आज के परिवेश का बिम्ब दिखाती “घुरेई कहाँ नाचेगी” कविता से ली गई पंक्तियाँ
“…इन दिनों बची हुई चंद मिटटी वाली छतें
हैरान हैं और उदास भी
बस खालीपन है
न फसलें हैं न बच्चे
किसान मजदूरी पर गया है
और बच्चे शहर…”

इसी कविता से गाँव से पलायन के मर्म को इंगित करता यह भावुक कटाक्ष
“…दंतकथाएं धीरे-धीरे
कर रही हैं पलायन
छतों पर उगी घास कह रही है
इस बार खेल उसने जीता है
और बच्चे हार गए हैं…”

इसी श्रृंखला में “मैं याद करना चाहता हूँ” कविता में वह गावों में बीते अपने अतीत को जीते हैं. गावों से पलायन, शहर में बसने की इच्छा, मजबूरी और होड़ के चलते गाँव-घर की स्थिति को बताती कविता ‘यह किसका घर है’ बहुत ही भावपूर्ण बन पड़ी है. उन सब को याद करते हुए गनी जी कहते हैं…
“…समय की रेत जीवन मुट्ठी से
धीरे-धीरे फिसल रही है
अब चाहता हूँ
गमलों में जंगल बसाना
और एक्वेरियम में सागर सजाना…”

 

 

गनी जी की सूक्ष्म दृष्टि को ‘आग’ शीर्षक से निम्न पंक्तियों को महसूस किया जा सकता है
“… इसीलिए वो आदिवासी महिला
दबाती है अंगारे राख में
और चूल्हा करता है रखवाली
चारों पहर सुलगते अंगारों की…”

गनी जी की कविताओं को आप पढ़ते चले जाते हैं और मनोभावों के आरोह-अवरोह में गोते लगाते जाते हैं पर कहीं-कहीं यह क्रम टूटता सा लगता है. कई जगह कविताओं को पढ़ते हुए विषयांतर होने से भटकाव का एहसास होता है. कई स्थानों पर रूपकों का अनावश्यक उपयोग कविता के मर्म को स्पष्ट समझने में बाधा उत्पन्न करता है. कुछ कविताओं को कई बार पढने के बाद ही कवि के मंतव्य का पता चलता है. इससे पाठक की एकाग्रता भंग होती है, उसके भाव प्रवाह में व्यवधान उत्पन्न होता है. पाठक पढना चाहता है, उसकी धारा में बहना चाहता है, फिर कुछ देर बैठकर सोचना चाहता है और निःसंदेह रूपकों का अतिसह और अनावश्यक प्रयोग पाठक की गतिशीलता को कम करता है. हर पंक्तियों में प्रतीकों का उपयोग कविता को जन्म नहीं दे सकता और न ही हर भावना या विचार स्वतः कविता की निष्पत्ति करते हैं. हो सकता है कि इस तरह की कुछ विशेष श्रेणी की कविताएँ एक वर्ग विशेष के पाठक ही आत्मसात कर सकते हों पर मेरी व्यक्तिगत दृष्टि में जनमानस की कविताओं को सामान्य जनमानस की कसौटी पर भी खरा उतरना चाहिए. पर इन सब के साथ-साथ गनी जी की कविताओं को पढ़ना स्वयं से, स्वयं के परिवेश से बातें करना है, उनको पढ़ना आपमें सुकून भरता है तो कही भावनात्मक रूप से हलचल भी पैदा करता है. गनी जी लिखते रहें, अपनी किस्सागोई से कविताओं के मानदण्ड गढ़ते रहें और आपके लेखन से पाठकों का भावनात्मक पोषण होता रहे. इन्हीं शुभकामनाओं के साथ.
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पुस्तक विमर्श
वह सांप सीढ़ी नहीं खेलता – गणेश गनी
लोकोदय प्रकाशन, लखनऊ
पेपर बैक , मूल्य Rs. 150/

समीक्षक
अरविन्द भट्ट
arvindkrbhatt@gmail.com
9811523657अरविन्द भट्ट

 

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