मुसीबत में ईमान की रक्षा करने वाली ग़ज़लें
– जीवन सिंह

जब से दुष्यंत कुमार ने ग़ज़ल को उसकी अपनी पारंपरिक चौहद्दियों से बाहर निकालकर उसे जिन्दगी के बड़े और खुले मैदान में उतारा तब से एक जरूरी बात यह हुई कि उसे लोकप्रियता के साथ व्यापकता, विविधता और विस्तार करने का अवसर भी मिल गया | वह एक तरह की घुटन और अँधेरे से बाहर निकलकर कविता की तरह ज़िंदगी के बाहरी और भीतरी यथार्थ को जिन्दादिली के साथ टोहने वाली विधा बन गयी |उसका कुछ ऐसा रूपांतरण हुआ कि वह दुष्यत कुमार के बाद अदम गौंडवी के हाथों में आकर धूप—तापों के मैदानों पर दूर दूर तक दौड़ लगाने लगी | तबसे ग़ज़ल ने उन मेहनत करने वालों की तरफ भी ध्यान दिया जो इंसानियत के सबसे बड़े पैरोकार होते हैं , इसके बावजूद ज़िंदगी के सबसे निचले पायदान पर ज़िंदा रहने को अभिशप्त होते हैं | जिनके जीवन में कविता का निवास होता हैं |जिनके दुःख—दर्दों और अभावों में शायरी को ढूंढा जा सकता है | जैसे “वो पता ढूंढें हमारा “ शीर्षक ग़ज़ल संग्रह के शायर डी एम मिश्र कहते हैं और मानते भी हैं | यह उनका चौथा ग़ज़ल संग्रह है |इससे पहले ” आईना दर आईना “ नाम से प्रकाशित संग्रह पाठकों के बीच चर्चित रहा है | गज़लकार मिश्र भी दुष्यंत कुमार की तरह यह जानते हैं कि कविता में वास्तव में पीड़ित आदमी की पीर होनी चाहिए उसी से कविता में वज़न और गहराई आती है | शायर मीर तकी मीर ने भी अपने समय में यही कहा था ——

हमको शायर न कहो कि साहिब हमने

दर्दो गम कितने किये जमा तो दीवान किया |

वस्तुतः आज जो भी सुख-चैन का एक अलग-थलग बेपरवाह जीवन जी रहा है वह बहुत छिछले और उथले पानी का नागरिक है , अफ़सोस इस बात का है कि उसे खुद यह पता भी नहीं है |दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल भी अपने समय की लोकतांत्रिक जीवन-प्रणाली में आ रहे संकट से उत्पन्न पीड़ा को व्यक्त करने के लिए ग़ज़ल जैसे लोकप्रिय माध्यम को लेकर आये थे | उनको भी —-हो गयी है पीर पर्वत—सी—- स्वीकार करना पडा था |

डी एम मिश्र की इन ग़ज़लों का एक रचना स्रोत वह गाँव भी है जिससे उन्होंने ,जैसाकि वे स्वयम कहते भी हैं , शहर आकर भी अपना नाता नहीं तोड़ा है |इस वजह से उनका अनुभव – संसार भी मध्यवर्गीय संवेदनाओं तक सीमित होने से कुछ ही सही , बच गया है |उनकी कविता में फैलाव का जो दायरा नज़र आता है उसकी बड़ी वजह उनका शहर में रहने के बावजूद अपने गाँव से भी एक रिश्ता बनाए रखना है | सच तो यह है कि यह रिश्ता जितना मजबूत होगा , उनकी ग़ज़ल की विश्वसनीयता भी उतनी ही बढ़ती जायगी और वे सही अर्थ में अदम के वारिस सिद्ध होंगे |यह उनकी विराट ग्रामीण जीवन से सम्बद्धता ही है कि वे निचले मेहनतकश वर्ग तक के दुःख—दर्दों के प्रति कम से कम सहानुभूति तो रखे हुए हैं जबकि शहरी मध्यवर्ग की ज़िंदगी जीने वाले शायरों में संकुचित होती संवेदना का संकट पैदा हो गया है | यह खुशी की बात है कि वे अदम की ग़ज़ल की धरती की उस ठोस सतह से जुडे रहने का संकल्प लेकर चले हैं जहां सामान्य जन के जीवन की दुखद सचाइयां देखने को मिलती हैं |वे अपने एक शे’र में बड़ी बेबाकी और खुले मन से कहते हैं——

सितारों के नगर में चाहता तो मैं भी बस जाता

पर अपने गाँव से नाता कभी तोड़ा नहीं मैंने |

यही नाता है जो कविता को बचाए रखने की संभावनाएं बनाता है |यहाँ सितारों के नगर की व्यंजना में उनका अंदाजे बयाँ भी आ गया है जहां तृष्णाजन्य आपाधापी और गलाकाट असंतोष की इस महत्त्वाकांक्षा के अन्धकार से घिरी दुनिया में कवि में संतोष का जो उत्फुल्ल भाव दिखाई देता है वह भी निरंतर धन –पिशाच बनती जाती सितारों के नगर वाली इस कुटिल और क्रूर दुनिया में एक जीवन—मूल्य की तरह लगता है | शायर जानता है कि इस समय के संसार के मानवीय रिश्ते व्यक्ति के ज़मीर को साबुत नहीं रहने देते |आज सबसे मुश्किल ही यही है कि व्यक्ति अपनी स्वाधीनता और ज़मीर को बेचकर ही बड़ा दिखने का प्रयत्न करता है | कहना न होगा कि अपने ईमान को बचा पाना इस उत्तरआधुनिक युग में जितना मुश्किल है उतना पहले कभी नहीं था | सच तो यह है कि सुविधाओं और सहूलियतें जिनके पास जितनी हैं उतना ही उनका ईमान और ज़मीर सिकुड़ा हुआ है |अपने कई शे.रों में कवि डी एम मिश्र ने साफगोई से स्वीकार किया है कि मुझे पीछे रहना मंजूर था लेकिन अपने ज़मीर को बेचना नहीं | यही तो है मनुष्यता की ताकत जो उसके भीतर के मनुष्य को बचाती है और यही मनुष्यता है जिसके बिना सच्ची कविता लिख पाना संभव नहीं | अदम गौंडवी ने अपनी एक ग़ज़ल में कहा था कि —–

कोठियों से मुल्क के मैयार को मत आंकिये

अस्ल हिन्दुस्तान तो फुटपाथ पर आबाद है |

इसी असली हिन्दुस्तान के चेहरे को डी एम मिश्र की ग़ज़ल भी अपने सहज अंदाज़ में दिखाने की कोशिश करती है | यद्यपि वह भी मध्यवर्गीय सीमाओं का पूरी तरह से अतिक्रमण नहीं कर पाती | फिर भी उनके यहाँ एक कोशिश नज़र आती है |दरअसल मौजूदा मध्यवर्ग की दिक्कत यह है कि वह जितना सोचकर और पढ़कर लिखता है उतना महसूस करके नहीं लिख पात़ा |महसूस करने के लिए जिस व्यापक और निम्नगामी क्रियाशील जीवन के अनुभव –संसार और जीवन—दृष्टि की जरूरत होती है उससे वह कटता गया है | आज उसका अनुभव—संसार भी मध्यवर्गीय है और जीवन—दृष्टि भी |वह कोशिश भी करता है तो वैसा आत्मसंघर्ष नहीं कर पाता , जैसा हमारे यहाँ बड़े रचनाकारों ने किया है |कबीर , तुलसी , मीरा, , निराला आदि के जीवन की कहानियां तो हम खूब कहते हैं लेकिन उनके रास्ते पर चल पाना आज कितना मुश्किल हो गया है | दिक्कत की बात यह है कि आज का कवि जैसे जैसे शहरी सुविधाओं का अभ्यस्त हो रहा है वैसे वैसे धरती की सतह के अनुभवों से दूर भी हो रहा है |यह अच्छी बात है कि डी एम मिश्र अवध जनपद के सुल्तानपुर जैसे अर्ध—शहरी माहौल में रहकर खुद के शायर को एक सीमा तक बचाए हुए हैं | इसीलिये कविता करना जीवन—साधना करना माना गया है | किसी भी कवि की कविता से यह जाना जा सकता है कि उसने कितनी बड़ी जीवन—साधना की है |इस मामले में जब डी एम मिश्र की ग़ज़ल-रचना को उसके पास जाकर देखते हैं तो दरवाजे पर पहली ग़ज़ल के पहले शे.र से उसकी उठान और उमंग का पता चल जाता है जिसमें वे कहते हैं कि वह कौन था जो अनेक तरह के अवरोध, असुविधाएं और कठिन –मारक परेशानियां होने के बावजूद कभी घबराया नहीं था | देश में आज कौन लोग हैं जो इस स्थिति में हैं —–

धूप थी , लंबा सफ़र था , दूर तक साया न था

सामने चट्टान थी फिर भी वो घबराया न था |

क्या यह सच नहीं है कि आज हर ईमानदार आदमी के लिए ज़िंदगी ऐसी ही अवरोधों से भरी है |यहाँ इस शे.र में एक वातावरण है जो प्रकृति का ही नहीं, प्रतीक रूप में कहा जाय तो सामाजिक वातावरण का सबूत भी है |आज एक ईमानदार आदमी के लिए ऐसा ही है जिसमें जीवन—यात्रा आसान नहीं रही |यही परीक्षा की घड़ी है लेकिन ऐसी घड़ी में भी एक वर्ग है जो खडा रहता है |कोई दशरथ मांझी है जो पहाड़ को काटकर रास्ता बना लेता है | इतिहास में कोई भगत सिंह है | कोई चंद्रशेखर—अश्फाकुल्लाखा है | इस तरह के शे.रों की खासियत यही है कि ये अपने अर्थ में काल को लांघ जाते हैं |इसी में से एक दूसरा शे.र निकलता है कि वह वर्ग कौनसा है और वह कहाँ है ? किसकी तरफ कवि का इशारा है तो पता चलता है कि वह झौंपडियों में रहने वाला है जिसके पक्ष में कवि ने अपनी शायरी को खडा किया है | यही है शायर का अपने गाँव से नाता | वह लिखता है ——

झौंपडी गिरती थी उसकी फिर उठा लेता था वह

कौन—सा तूफ़ान था जो उससे टकराया न था |

यहाँ हमें प्रेमचंद के रंगभूमि उपन्यास का सूरदास याद आने लगता है |एक सजग—संवेदनशील नागरिक अपने वर्तमान के प्रति सक्रिय सजगता रखता है | यह सजगता और संवेदनशीलता डी एम मिश्र के इस “वो पता ढूंढें हमारा “ नामक ग़ज़ल संग्रह में सामान्यतया हर ग़ज़ल में नज़र आती है जहां वे वर्तमान की जन—विरोधी राजनीति से बाखबर रहते हैं |उत्तर आधुनिक विचारक मिशेल फूको ने ताकत की अवधारणा और व्यवहार के बारे में जिस रहस्य का उद्घाटन किया है उसे जागरूक पाठक जानते हैं |यह सच है कि आज भी यह संसार मानवीय न्याय की अपेक्षा “ताकत के न्याय “ से ही ज्यादा चल रहा है |इसी “न्याय” की तरफ मिश्र जी का एक शे’र जिस व्यंजना में इशारा करता है “ वह विचारणीय है——–

उसकी ताकत के आगे मेरी क्या बिसात

एक ज़ालिम को सरकार कहना पडा |

इस शे’र की खासियत इस बात में है कि यह जितना पोलोटिकल है उतना ही सामाजिक भी और उतना ही पितृसत्तात्मकत़ा पर व्यंग्य कसने वाला भी | कहना न होगा कि जहां भी दुनिया में जालिमों की अन्यायपूर्ण सत्ता है वहाँ इस शे’र की अर्थवत्ता है | यह एक साधारण नागरिक की विवशता भी है कि उसके सामने कोई चारा नहीं |किसी शे’र की खासियत इस बात में होती है कि वह कितनी दूरी तक अपनी सार्थकता व्यक्त कर पात़ा है | यह डी एम मिश्र के यहाँ है यह बात निस्संकोच कही जा सकती है |इस तरह के अशआरों से उनके नज़रिए का पता भी चलता है और उनकी पक्षधरता का भी |डीएम मिश्र की इन ग़ज़लों में आज की जन—विरोधी राजनीतिक व्यवहार पर भी कई शे’र हैं |यह हिंदी ग़ज़ल का स्वभाव ही माना जायगा कि वह ग़ज़ल की विषयगत विविधता को स्वीकार करते हुए भी एक विषय—केन्द्रित होकर भी चलती है | वह एक ही प्रकृति के अशआरों में वस्तु के विभिन्न आयामों को घनीभूत रूप में व्यक्त करती है |आज की दुनिया के रिश्तों में जिस तरह के अलगाव की भयावह स्थितियां पैदा हो गयी हैं उनकी व्यंजना भी इस संग्रह की ग़ज़लों में हुई है |आज के व्यक्ति का चरित्र भी इन ग़ज़लों से पहचाना जा सकता है |आज जिस तरह के बाद;आव आये हैं और लोगों के रिश्तों में ठंडापन आया है , शायर कहता है कि उनसे शहर रहने लायक नहीं रह गए हैं | शहर धन—वैभव से जरूर समृद्ध हुए हैं लेकिन समरसता और सम्बन्धों के स्तर पर सुकूनदेह नहीं रह गए हैं —

न खुशबू गुलों में न रंगे—हिना वो

कोई गुलिश्तां में जहर बो गया है |

सवाल यह है कि यहाँ शहर का शत्रु वो कोई कौन है जो गुलिश्तां में जहर बोने का काम करता है उसके चेहरे की शिनाख्त करना भी जरूरी है तभी कविता की एक मुक्कमल तस्वीर बनती है | फिर शहर में ऐसे अल्पमत लोग भी तो हैं जो उसमें अमृत लाने के लिए जद्दोजहद और इस व्यवस्था को बदलने के लिए सोचते—विचारते तथा संघर्ष भी करते हैं लेकिन सत्ताधारी शक्तियों के सामने वे दिखाई नहीं देते | यहाँ शहर को उसकी द्वंद्वात्मकता में समझने की जरूरत है क्योंकि शहर एक ही तरह का नहीं है |इसी तरह से इन ग़ज़लों में यथार्थ की अभिव्यक्ति के साथ –साथ नियतिवाद के आग्रह भी मौजूद हैं जो यथार्थ की व्यंजनाओं में बाधक बनकर आते हैं |इस तरह की सीमाओं के बावजूद इन गजलों के रचनाकार डी एम मिश्र अपने अंदाजे बयाँ के साथ अपनी सतत उपस्थिति दर्ज कराते हैं |उनके यहाँ भाषा की सरलता और तरलता दोनों होने के कारण भाषा में कहीं गत्यवरोध व अस्पष्टता नहीं है |जिस तरह के मतले में वे रदीफ़ व काफिये बांधते हैं उनका नवीन ख्यालों के साथ मजमून की बारीकियों तक जाने की कुशलता भी दिखलाते हैं |अंत में उन्ही के शब्दों में उनकी एक छोटी बहर की ग़ज़ल की इस हिदायत को ध्यान में रखना जरूरी है—–

दूसरों में तलाशता फिरता

आदमी खुद की भी कमी जाने

समीक्षित कृति

वो पता ढूंढें हमारा (ग़ज़ल संग्रह)

ग़ज़लकार : डी.एम.मिश्र

प्रकाशक : शिल्पायन, दिल्ली

मूल्य : 275 रुपए

प्रकाशन वर्ष : 2019

समीक्षक

जीवन सिंह

1/ 14 अरावली विहार

अलवर 30 1 00 2

राजस्थान

 

 

By admin

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