पुस्तक समीक्षा :: ईश्वर का अनुवाद करते हुए

विलक्षण,  बिंब, प्रतीक और भाषा का संगम ‘ईश्वर का अनुवाद करते हुए’
 ‘ईश्वर का अनुवाद करते हुए’ वरिष्ठ कवि डॉक्टर स्वदेश कुमार  भटनागर का सद्य प्रकाशित गद्य कविता- संग्रह है, जो प्रकाश बुक डिपो ,बरेली से छप कर आया है ।संग्रह में कुल 8 सर्ग हैं जिनमें अलग-अलग भाव और पृष्ठभूमि पर कविताएं लिखी गई हैं ।संग्रह के आवरण  पर ही छंद मुक्त कविता की जगह गद्य कविता की स्वीकारोक्ति  कवि की स्पष्टवादिता की निशानी है।
 कविता मनुष्यता की मातृभाषा होती है। कवि कविता को रचते हुए अपने जीवनानुभवों को ही रचता होता है।’ ईश्वर का अनुवाद करते हुए’ कविता संग्रह कई मायने में एक  खास संग्रह  है। आप जब संग्रह को पढ़ेंगे तो कविताओं के बीच  के अद्भुत अंतर्लय  को महसूस करेंगे। यह लयात्मकता  कवि के छंद कविता में  सिद्धहस्त होने का परिणाम है ।कविता हमें हमारे जीवन के अनजान, अनचीन्हे कोनो  तक ले जाती है।यही अनजान व अनचीन्हा कोना कवि की निजता और पाठक का उत्स है। संग्रह की पहली कविता ‘दस्तखत ‘कवि का खुद से खुद का साक्षात्कार है। आजकल जहां लोग एक दूसरे  की टांग खींचने में पीछे नहीं रहते। ऐसे वक्त में, विरले ही होते हैं ,जो खुद का अवलोकन करते हुए, खुद पर हंसते और रोते हैं ।कवि कहता है- जाके सदियों में कहीं होता है /शख्स जो खुद पे हंसता रोता है/ लफ्ज़  झड़ते हैं पंखुरी की तरह /प्रश्न  सब बर्फ से पिघलते हैं /माज़ी छुटता है कैंचुली जैसे/ दस्तखत तब उसके हू -बहू यारो/ बिल्कुल अपने खुदा से मिलते हैं ।”इस संग्रह के  प्रथम सर्ग में एक कविता है ‘अद्वैत ‘ इस कविता को पढ़ते हुए कविता की कलात्मकता और प्रेम के ईश्वरीय रूप को आप सहज ही अनुभव कर सकते हैं। कवि  कहता है- मैंने स्वस्तिक भरे स्पर्श  से/तुम्हारे अस्तित्व को अलंकृत किया /तुम पद्मवर्णा , पारसगुनी हो गई/ तुमने मधुराष्टकम् होठों से/ मुझे गुनगुनाया/ मन मथुरा तन वैरागी हो गया /हम दोनों अद्वैत हो गए/ अद्वैत  का बीज/हर आंसू के खेत में बोना चाहता हूं मैं /जानता हूं छांव में बीज  सफर नहीं करता।” द्वितीय सर्ग में  एक कविता है ‘स्ववचन’ ।कवि कहता है- बहुत बोलता है मेरा अस्तित्व मुझमें/ नि:शब्द की कायनात से भर दीजिए मुझे” ।तो कहीं न कहीं पाठक भी उस वक्त की कल्पना करने लगता है, जब मनुष्य के भीतर कोई आवाज न आए ।यानी वह साधना के उस सबसे अंतिम पड़ाव पर पहुंच जाए ,जहां कोई भी शब्द  सुनाई न पड़े ।  दरअसल इस तरह की कविताएं हमें वहां ले जाती हैं, जहां हम जाना तो चाहते हैं पर, अक्सर अपनी अक्षमता के कारण वहां तक पहुंच नहीं पाते । इसी संग्रह की ‘चेहरों की सुरंगों की सफाई कर दे ‘शीर्षक कविता पढ़ते हुए हम महसूस करते हैं किस तरह  अनछुए बिम्बों  से कविता रची जाती है।  कवि कहता है-‘ चेहरे मछुआरे भी होते हैं/ इन्हें मालूम है/ समाज की नदी की पवित्रता में कहां जाल फेंकना है’। यहाँ संग्रह की एक और महत्वपूर्ण कविता का जिक्र करना चाहूंगी जिसमें कवि कहता है कि ईश्वर में ईश्वर मर गया है। देखें-‘ पृथ्वी के देवता को बुलाओ /ह्रदय के पीपल पर दिमाग ने घोंसला बना लिया है/ चारपाई पर लेटा ईश्वर खांस  रहा है/ बूढ़ा  हो गया होगा/ जिस्म की दरारों को भोर के भजन से भर दो/ ईश्वर में  ईश्वर मर गया है/ आंसुओं में से आग निकाल लो/ दाह -संस्कार के लिए/ अध्यात्म की कस्तूरी कोई है जो हमसे छीन रहा है”। संग्रह का तृतीय  सर्ग  जब शुरू होता है तो सबसे पहले पाब्लो नेरुदा की पंक्ति ‘कविता ऐसे गिरती है /आत्मा पर जैसे घास पर ओस”।  तो आने वाली कविताओं की सहज ,सरल और भावपूर्ण होने की आहट हमें पहले ही मिल जाती है। इस सर्ग की पहली कविता’ जब भी कविता लिखता हूं मैं’ में  कवि कहता है-‘ ख्वाबों से  फूटने लगती हैं किरनें/  ओस फूलों पे मीरा सी हो जाती है/ समंदर बीज होने लगता है जमीं का /कस्तूरीमय  हो जाता है वक्त/ नदी बन जाती है परमहंस/ बुझे चिरागों में पौ  फटने लगती है/फासले भर जाते हैं होठों से /पत्थर गाने लगते हैं गीतगोविंद /अपने आपे से बाहर हो जाता है मौसम /स्वर्ण पाखी हो जाता है मन/ मैं जब भी कविता लिखता हूं”। इसी सर्ग में दूसरी कविता है ‘कविता की सुपारी ले ली है किसी ने ‘तो आज की कविता और उसमें  हो रहे ह्रास   को सहज ही महसूस किया जा सकता है। कवि कहता है-‘ कविता से कोई छीन ले गया है/ उसका गुलाल /उसके हरसिंगार की खुशबू /उसके गुलमोहर की छांव/ कविता से उतार लिया है किसी ने/ उसका दूब जैसा हरापन/ शब्दों से आंख बचाकर/ किसी ने छिड़क दिया है नमक कविता की देह पर/ कविता के चिंतन वृक्ष पर उग आई है  फफूंद /कविता में बसंत है न सावन की पहली बारिश/  मिट्टी की सोंधी गंध भी नहीं है कविता में /आत्मा के जल से सींचे जाने को तरस रही कविता/ जानता हूं  बमुकाबले हिंसा के/ कविता बहुत कम है दुनिया में/ कविता के टिफिन में समंदर है न पहाड़/ देश है न लोग/ लगता है कविता की सुपारी ले ली है किसी ने ‘तो सही में यह एहसास होता है कि आज के समय में कविता कहां खो गई है। संग्रह की एक और महत्वपूर्ण कविता है ‘कविता/चाह’ जो कई पाठ की मांग करती है ।कवि कहता है -‘कविता मनुष्य का गुरुकुल है/ कविता का अपना सूरज, अपनी प्रार्थना होती है/ कविता ही मनुष्य को ईश्वर में  बदलती है/ मैं हमेशा कविता में अथवा कविता के बाहर/ कविता बनकर रहना चाहता हूं’ तो मन में कहीं एक खूबसूरत- सा एहसास उभरता है। भटनागर जी जैसे कवि जो कविता को जीते हैं, उनसे हिन्दी कविता को बहुत उम्मीदें हैं । ऐसे ही प्रतिबद्ध  कवि कविता को बचाकर रखने में समर्थ होते हैं ।
 कवि डॉक्टर स्वदेश कुमार भटनागर का गद्य- संग्रह’ ईश्वर का अनुवाद करते हुए’ पढ़ते हुए  आप बार-बार  सोचने पर विवश होंगे ।कविता आपको मथेगी, ठिठकायेगी और कविता की वास्तविक  दुनिया में ले जायेगी।मुझे पूरा यकीन है कि गहरे प्रेम की गहरी कविता वाला यह संग्रह अपने बेहतरीन कहन, अनूठे बिम्बों और  प्रतीकों  की वज़ह से पाठकों के बीच महत्वपूर्ण  स्थान बनाने में कामयाब होगा ।
डाॅ भावना
पुस्तक-ईश्वर का अनुवाद करते हुए
कवि- डाॅ स्वदेश कुमार भटनागर
समीक्षक-डाॅ भावना
प्रकाशन-प्रकाश बुक डिपो,बरेली
मूल्य-551

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