समालोचना के निकष पर ग्यारह ग़ज़लकार: विमर्श के बहाने
के. पी. अनमोल

पिछले अनेक सालों से ज़हीर क़ुरैशी हिन्दी ग़ज़ल के प्रवक्ता ग़ज़लकार रहे हैं, इस बात पर कोई सन्देह नहीं। उन्होंने हिन्दी ग़ज़ल की भाषिक संरचना में बड़ा योगदान दिया है। इधर कुछ समय से उनका गद्य लेखन भी लगातार प्रकाशित हो रहा है। उनका संस्मरण संग्रह ‘कुछ भूला कुछ याद रहा’ वर्ष 2016 में प्रकाशित हुआ है। साथ ही कुछ पत्रिकाओं के लिए लिखे गये उनके लेख, जो हिन्दी-उर्दू के ऐसे शायरों पर केन्द्रित रहे हैं, जिनके लेखन में सामर्थ्य होने के बावजूद उन्हें अधिक पहचान नहीं मिल सकी। इन लेखों का एक संग्रह ‘भूले-बिसरे शायर’ भी प्रकाशित हो चुका है। इनके अलावा ग़ज़ल पर उनके कुछ आलोचनात्मक लेख भी आये हैं, जो बेहद महत्वपूर्ण हैं। सार यह कि ज़हीर क़ुरैशी ग़ज़ल-लेखन के साथ-साथ गद्य एवं आलोचनात्मक लेखन में भी सक्रिय हुए हैं, यह एक सुखद बात है।

इन्हें आलोचनात्मक लेखन की तरफ क्यों आना पड़ा होगा? इस जिज्ञासा का समाधान उनके ही शब्दों में- “समकालीन हिन्दी ग़ज़ल उन्नयन की प्रक्रिया में है। किसी भी विधा के पल्लवन के लिए पाँच दशक का समय कोई बहुत बड़ा कालखण्ड नहीं माना जा सकता। जैसे-जैसे हिन्दी ग़ज़ल हिन्दी साहित्य की मुख्य काव्य-विधा बनने की ओर अग्रसर हो रही है, छन्द मुक्त और मुक्त छन्द कविता के खेमे में उसका विरोध बढ़ता जा रहा है।…..हमारे पास नामवर, विश्वनाथ त्रिपाठी, मैनेजर पाण्डेय जैसे आलोचक तो हैं नहीं। ग़ज़ल के आलोचना-कर्म को संतुलित दृष्टिकोण से हम हिन्दी ग़ज़लकारों को ही संपन्न करना होगा।”
उनके इस महत्वपूर्ण बयान के बाद आलोचनात्मक लेखन में उनके आने की उपयोगिता सिद्ध हो जाती है।

इसी क्रम में कुछ समय पहले इनके आलोचनात्मक लेखों का एक संग्रह ‘विमर्श के बहाने’ विद्या प्रकाशन, कानपुर से प्रकाशित होकर आया है, जिसमें ‘समालोचना के निकष पर ग्यारह ग़ज़लकार’ हैं। इन ग्यारह लेखों में ज़हीर क़ुरैशी अपने आलोचनात्मक लेखन की क्षमता का भरपूर परिचय देते हैं। इनके लेखों की विशेषता यह है कि वे उबाऊ, एकरस और लम्बे नहीं हैं। ज़हीर सर प्रत्येक ग़ज़लकार के लेखन के किसी एक बिन्दु को पकड़कर उस पर ‘टू द पॉइंट’ बार करते हैं और अपने मंतव्य को सुव्यवस्थित तरीक़े से स्पष्ट करते हैं। इनके लेखों की एक और विशेषता ने मुझे प्रभावित किया कि वे ग़ज़लकार के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर बात करते हुए बीच-बीच में संस्मरणात्मक उद्द्वरणों से अपनी बात को रोचक तरीक़े से रखते हैं। इन्हें पढ़ते हुए यह महसूस होता है जैसे वे बातों-बातों में कई महत्वपूर्ण मसलों पर रोशनी डाल रहे हों। जिनका संवाद ज़हीर सर से रूबरू अथवा फोन पर हो चुका है, उन्हें लेख पढ़ते हुए यही आभास होगा कि वे उनसे मुख़ातिब हैं और आपसी चर्चा में वे सम्बंधित विषय पर बात कर रहे हैं। आलोचनात्मक लेखन की यह शैली निश्चित रूप से बहुत रुचिकर है।

‘विमर्श के बहाने’ हिन्दी के 6 एवं उर्दू के 5 ग़ज़लकारों के लेखन पर विस्तार से बात करते हुए 11 लेखों का संग्रह है, जिसमें प्रो. नन्दलाल पाठक, विनोद तिवारी, सूर्यभानु गुप्त, गुलाब खण्डेलवाल, डॉ. हनुमन्त नायडू, शिव ओम अम्बर, डॉ. अख्तर नज़मी, इन्द्र मोहन मेहता ‘कैफ़’, मेयार सनेही, डॉ. दरवेश भारती एवं जगदीश चन्द्र पण्ड्या ‘अक्स’ से सम्बंधित महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर ज़हीर क़ुरैशी का विश्लेषण है। ये लेख पढ़ते हुए पाठक कई नई जानकारियों से समृद्ध होता है। ज़हीर सर का यह विश्लेषण हिन्दी ग़ज़ल के लिए ख़ास महत्व रखता है। यह संग्रह हिन्दी की नई पीढ़ी के ग़ज़लकारों के लिए भी बहुत उपयोगी है, जो अभी हिन्दी ग़ज़ल की संरचना को समझने के लिए प्रयासरत हैं।

संग्रह का पहला ही लेख, जो ‘प्रो. नन्दलाल पाठक की हिन्दी ग़ज़ल की अवधारणा’ पर केन्द्रित है, यह लेख हिन्दी ग़ज़ल से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातों को हमारे सामने रखता है। हिन्दी ग़ज़ल की भाषा, उसका कथ्य, प्रतीक, बिम्ब आदि पर सार्थक विमर्श करते इस एक लेख को पढ़कर हिन्दी भाषी ग़ज़लकार बहुत समृद्ध हो सकते हैं, यह मेरा विश्वास है। हैरत की बात यह भी है कि इस लेख में आयी 3-4 घटनाओं को ज़हीर सर ने संस्मरणात्मक शैली में हुबहू लिखा है। इनकी स्मृति कमाल की है!

दूसरा लेख व्यवस्था विरोध के प्रवक्ता ग़ज़लकार विनोद तिवारी के ग़ज़ल लेखन पर विश्लेषण करता उनका सारगर्भित लेख है। जो विनोद तिवारी जी के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालकर उनके लेखन की विशेषताओं की पड़ताल बहुत ख़ूबसूरती से करता है। आकार में इस संक्षिप्त लेख से विनोद तिवारी के लेखन की जो झलक मिलती है, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि उनके ग़ज़ल लेखन पर ख़ूब सार्थक लिखा जा सकता है।

तीसरे लेख में अछूते बिम्बों, रूपकों, दृश्यात्मकता से सजी जीवन के ताप से संपृक्त ग़ज़लें कहने वाले दुष्यन्त कुमार के समकालीन शायर सूर्यभानु गुप्त के लेखन की विशेषताओं की बहुत बारीकी से पड़ताल की गयी है। उनके 22 ग़ज़लों के एकमात्र संग्रह के बावजूद ज़हीर सर ने उस समय की विविध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित गुप्त जी की ग़ज़लों को खोजकर इस महत्वपूर्ण काम को अंजाम दिया है।

चौथे लेख में ज़हीर सर ‘भाषिक दृष्टि से हिन्दी के पहले ग़ज़लकार: गुलाब खण्डेलवाल’ के समग्र ग़ज़ल लेखन की विवेचना करते हैं। गुलाब जी वह ग़ज़लकार हैं, जिन्हें पढ़कर हिन्दी ग़ज़ल के गोमुख दुष्यन्त कुमार के ग़ज़ल लेखन को प्रेरणा मिली।

पाँचवा लेख हिन्दी के महत्वपूर्ण आरम्भिक ग़ज़लकार डॉ. हनुमन्त नायडू के व्यक्तित्व और कृतित्व पर बात करता है। लेख से हमें उनके ग़ज़ल लेखन के स्वभाव की जानकारी के साथ यह भी पता चलता है कि हिन्दी-उर्दू ग़ज़ल को अलगाते डॉ. नायडू के विचार हमारे लिए अब भी महत्वपूर्ण हैं।

छठे लेख में ज़हीर सर द्वारा ‘ग़ज़लकार शिव ओम अम्बर की ग़ज़लों की प्रकृति’ पर विस्तार से बात की गयी है। यहाँ ज़हीर सर ने शिम ओम अम्बर जी के ग़ज़ल के स्वभाव को स्पष्ट करने के लिए वर्तमान में प्रचलित ग़ज़ल के तीन स्वरूपों पर प्रकाश डाला है, जो बहुत उपयोगी है।

सातवें लेख में उर्दू ग़ज़ल के जदीद लहजे के शायर डॉ. अख्तर नज़मी की लेखन-यात्रा पर विस्तृत विवेचन करते हुए ज़हीर क़ुरैशी कहते हैं कि आधुनिक उर्दू शायरी में उन्हें वह स्थान नहीं मिला, जिनके वे हक़दार हैं। इस बात की तस्दीक लेख में उद्धृत नज़मी साहब के शेर करते दिखते हैं।

आठवें लेख में ज़हीर सर इन्द्र मोहन मेहता ‘कैफ़’ के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर बात करते हुए उनकी  शायरी के कई पहलुओं को आलोकित करते हैं।
किताब का नौवां लेख परम्परा और प्रगतिशीलता के बीच के ग़ज़लकार मेयार सनेही’ के लेखन पर विस्तृत बात करता है और यह बताता है कि वे वर्तमान में हमारी जीवित धरोहर हैं।

अगला और ‘डॉ. दरवेश भारती द्वारा भाषा के साथ अपने शेरी मुहावरे को बदलने की हिम्मत’ शीर्षक लेख उस्ताद ग़ज़लकार दरवेश भारती से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर साहस के साथ प्रकाश डालता है। कुल साढ़े छह पृष्ठों का यह लेख दरवेश भारती जी के अब तक के साहित्यिक जीवन पर इतनी सार्थकता से बात करता है कि पढ़कर यह महसूस होता है कि उन पर इससे अच्छा लेख शायद ही लिखा गया हो। मुझे स्वयं दरवेश भारती जी से निकटता से जुड़े होने के बावजूद कई ख़ास बातें इस लेख के माध्यम से पता चलीं।

संग्रह के अंतिम लेख में ज़हीर सर जगदीश चन्द्र पण्ड्या ‘अक्स’ के ग़ज़ल-लेखन की काव्य-प्रवृतियों पर चर्चा करते हैं। यहाँ वे पण्ड्या जी के रचनाकर्म की ख़ूबियाँ नपे-तुले अन्दाज़ में हमारे सामने रखते हैं।

इन ग्यारह उपयोगी लेखों के साथ डॉ. मधु खराटे द्वारा लिखी संग्रह की भूमिका भी पठनीय है, जो ज़हीर क़ुरैशी के गद्य लेखन और पुस्तक के लेखों पर विस्तार से बात करती है। ज़हीर क़ुरैशी जी का समालोचना का यह प्रयास हिन्दी ग़ज़ल के रचनाकारों और पाठकों के लिए बहुत उपयोगी बन पड़ा है।

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