पुस्तक समीक्षा : डॉ.भावना

संवेदना को झकझोरती ग़ज़लें – शिखरों के सोपान
                                                                                    – डॉ.भावना
 ग़ज़ल की बात आती है तो बरबस ही प्रेम याद आता है, प्रेम में बीता पल याद आता है और याद आती है विरह- मिलन की बेला।  ग़ज़ल प्रेमी- प्रेमिका के बीच से कब आम जनता के दुख- दर्द तथा हास- परिहास के साथ- साथ  सामाजिक-आर्थिक  एवं राजनैतिक विसंगतियों का आईना बन हमारे सामने आ गई, पता ही नहीं चला। कुछ ग़ज़लकार दुष्यंत को इसका श्रेय देते हैं, तो कुछ का कहना है कि इसकी शुरुआत दुष्यंत के पूर्व के ग़ज़लकारों ने ही कर दी थी। यह अलग बात है कि ग़ज़ल की सामाजिक- राजनैतिक विसंगतियों को व्यक्त  करते हुए दुष्यंत सर्वाधिक लोकप्रिय हुए। इसी सामाजिक- राजनैतिक चेतना  से संपन्न कमलेश भट्ट “कमल” का संग्रह “शिखरों के सोपान” विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी से इसी वर्ष छप कर  आया है।
कमलेश भट्ट “कमल” की ग़ज़लें आम जनता के  बेहद करीब हैं ।संग्रह से गुजरते हुए आपको यह महसूस होगा कि किस तरह एक समर्थ ग़ज़लकार हमारी संवेदना को झकझोरते हुए शब्दों की कूंची से मस्तिष्क में  चित्र उकेरता चलता है। वह चित्र कभी बहुत स्पष्ट होता है,  कभी  धुंधला और कभी सोचने पर विवश करता हुआ । इनके अधिकांश शेर प्रवाह,शिल्प और तग़ज्जुल  के अद्भुत मिश्रण के साथ हमसे संवाद  करने में सफल हैं ।तग़ज्जुल ग़ज़ल  का सबसे ताकतवर पक्ष माना जाता है।इसी की  वज़ह से ग़ज़ल का हर एक शेर एक कविता  है ।आज का समय  बड़ा विचित्र है।  आज के इस दौर में पिता अपनी संपत्ति को बेच बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाता एवं विदेश भेजता है ।बच्चा वहां की सुख- सुविधाओं, रहन-सहन एवं संस्कृति में इतना घुल- मिल जाता है कि अपने छूटे हुए घर -परिवार, खेत- खलिहान,माता- पिता सब बेगाने लगने लगते हैं। बीमार पिता पुत्र  को देखने की ललक लिए दिन काटता है। जिस पुत्र के लिए पिता ने अपनी जवानी खो दी, वही पुत्र उसे बीमारी की अवस्था में भी ढाढस तक  नहीं दे पाता । क्या यही विडंबना  हमारी संस्कृति  का हिस्सा रही है? श्रवण कुमार की यह  धरती अपने हालात पर रोये या हंसे  समझ में नहीं आता ।शेर देखें –
सिर्फ ढाढस  देके रह जाता है अमरीका से बेटा
फूट कर रोता है तन्हाई में बूढ़ा काँपता है
 आज का समय मनुष्य को मशीन में बदल जाने का समय है। भावुकता और संवेदना से क्षीण यह समय हमें कितना भी सफल क्यों न बना दे, हमसे हमारा चैन और सुकून छीन लेता है। आदमी दिन -रात पागलपन की हद तक दौड़ता- भागता अपने बेशकीमती सुख को खो बैठा है। हर वक्त तनाव में जीता इंसान दूसरों के सामने भले ही अपनी सफलता की डींगे हांके पर भीतर से वह बेहद तन्हा  होता है।
 तुम्हारे पास दो पल भी नहीं है चैन के अपने
 बताते हो तुम अपने आपको यूं तो सफल कितना
छोटी बहर हो या बड़ी बहर  अपने अलग अंदाज और शब्दों के बेहतरीन  चयन से  वे पाठकों को हमेशा  चकित करते हैं।शेर देखें-
 इंसानों में  विष ज्यादा है
 जाकर देखा  विषधर-विषधर
एक सिद्धहस्त  सफल ग़ज़लकार का काम सिर्फ वस्तु स्थिति  सामने रखना नहीं होता बल्कि समस्या का समाधान भी सुझाना  होता है। 2 मिनट में मैगी खाकर जीवन जीने वाली यह पीढ़ी सबकुछ  झटपट चाहती है ।पर, सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता । उसके लिए पसीना बहाना पड़ता है, नींद खोनी पड़ती है और अपनी इच्छा शक्ति को दृढ़ करना होता है।
 पौध लगाई मन से, फिर बरसों तक सींचा है
तब जाकर कुछ चिड़ियों का यह कलरव हासिल है
उत्तर आधुनिकता का यह समय नैतिक मूल्यों के स्खलन का समय है।जहाँ  लोग रिश्ते नाते की मर्यादा को भुला वहशी हो  गये हैं । यह हवस  पैसों से लेकर शरीर  तक की है ।नवजात से लेकर वृद्धा तक को अपना शिकार बनाता यह   वहशी   आदिमानव से भी बहुत नीचे चला गया है। एक सजग रचनाकार अपने समय के सबसे शर्मनाक विषय से कैसे तटस्थ रह सकता है। शेर देखें-
 हर किसी में हवस बस हवस ही हवस
 मुल्क वालों  तुम्हें ऐसा हो क्या गया!
 कहते हैं कि जब हम एक उंगली दूसरे की तरफ उठाते हैं तो बाकी की चार ऊंगलियां हमें अपनी तरफ इशारा करती हैं ।पर, हम बेखबर हो सिर्फ दूसरों की गलतियां गिनाने में ही समय बर्बाद करना अपनी शान समझते हैं। हमें अपनी भूमिकाओं के बारे में गौर करने की जरूरत ही महसूस नहीं होती।
 यह बेहद  जरूरी है कि हम दूसरे पर उंगली उठाने से पहले खुद की भूमिका पर नजर डालें ,तो  ही बेहतर होगा।
 दूसरों की भूमिकाओं पर सभी उंगली उठाएं
 लोग हैं निश्चिन्त खुद की भूमिकाओं की तरफ से
मनुष्य होना यानी कि क्षमा, दया, तप  और त्याग को धारण करने वाला इंसान होना है । बाजारवाद ने हमें आर्थिक रूप से समृद्ध तो  किया है पर,हमसे हमारी मनुष्यता छीन ली है और बदले में बहुत कुछ  दे दिया है। हमें अकेले में बैठ कर आत्मचिंतन करना चाहिए कि मुट्ठी भर दौलत की भूख ने हमसे क्या-क्या छीन लिया है।
जलन,विद्वेष,लालच,ईर्ष्या,कुण्ठा,घुटन,नफरत
 समझता ही नहीं कोई इन्हें बीमारियां अपनी
 कहना  न होगा कि कमलेश भट्ट “कमल” सामाजिक कुरीतियों  ,खोखले आदर्शों  एवं राजनैतिक चालाकियों पर जम कर प्रहार  करते हैं ।यूँ तो दुनिया में संपूर्ण कुछ नहीं होता ।हमेशा कुछ और बेहतर की गुंजाइश बनी रहती है। इसमें कोई संदेह नहीं  कि  “शिखरों के सोपान”   कहन के अलग अंदाज़ की वज़ह से पाठकों को बार-बार पढ़ने पर विवश करेगा।
समीक्षक
– भावना,
आद्या हाॅस्पिटल, जीरोमाइल, मुजफ्फरपुर,बिहार – 842004
पुस्तक
शिखरों के सोपान
प्रकाशन-विश्वविद्यालय प्रकाशन ,वाराणसी
मूल्य –250

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