पुस्तक समीक्षा :: ‘देखा है उन्हें’ की

समय की नब्ज़ को टटोलती कविताओं का नायाब गुलदस्ता ‘देखा है उन्हें’ 

  • डॉ भावना

‘देखा है उन्हें’ रविंद्र उपाध्याय जी का सद्य  प्रकाशित कविता- संग्रह है,जो अभिधा  प्रकाशन,  मुजफ्फरपुर से छप कर आया है। इस संग्रह में कुल 38 कविताएं हैं जो विभिन्न पृष्ठभूमि पर लिखी गई हैं ।रविंद्र उपाध्याय जी को साहित्य जगत छंद की वज़ह से जानता है ।उनकी छवि एक लोकप्रिय गीतकार की रही है। निराला कहते थे कि मुक्त छंद लिखने से पहले छंद का ज्ञान होना आवश्यक है। शब्दों की मितव्ययिता  की ताकत आपको संग्रह से गुजरते हुए हर पल  महसूस होगी जो कवि की छंद की ताकत ही कही जायेगी। संयमित और संतुलित   शब्द विधान से लैस ये कविताएं आज के जन- जीवन की तमाम विसंगतियों और विद्रूपताओं को न केवल जुबान  देती हैं बल्कि उससे निजात पाने का रास्ता भी दिखाती हैं ।

संग्रह की कविता ‘नए सपने’ में कवि कहते हैं “प्रतीति है/ घायल, झुलसे सपनों का/ मातम करने की बजाय/ मेरी आंखें /नए सतेज सपने उगायेंगी/ स्वप्न द्रोहियों  के कलेजे में/ तीर -सी चुभती रहेंगी/ यह स्वप्निल आंखें/ ये आंखें नींद में भी/ जागती रहती हैं “पृष्ठ 11  तो वैश्वीकरण के चलते  सपनों के चुरा लेने की रणनीति का खुलासा  हो जाता है।कवि की बारीक निगाह से मजदूर और किसान भी ओझल नहीं हैं ।कवि कहते हैं कि जो प्रकृति प्रदत्त है  उसका उपयोग हम बखूबी करते हैं फिर भी वह कम नहीं पड़ता। पर, जिन्हें  हम उपजाने में समर्थ हैं फिर भी क्यों  दाने-दाने को मोहताज हो जाते हैं ?जो मजदूर  एक से बढ़कर एक आलीशान मकान बनाता है वही जर्जर मचान पर जीवन यापन करने को विवश क्यों होता है?ऐसे सवाल किसी भी संवेदनशील कवि को परेशान किये बिना नही रहते ।  अतः कवि उस हाशिए की आवाज़ बन कहते हैं कि-” बहुत उगाए अनाज/ अब उगायेंगे प्रश्न/ बहुत बुने वस्त्र /अब बुनेंगे प्रश्न /बहुत उठाए मकान/ अब उठाएंगे प्रश्न /सिर्फ प्रश्न प्रश्न प्रश्न -पृष्ठ  19 ।

संग्रह की एक  महत्वपूर्ण  कविता ‘डालियां बाँझ नहीं होती ‘सकारात्मक सोच की एक अनूठी कविता है, जिसमें  कवि कहते हैं कि डालियां बदरंग हो सकती हैं /बाँझ नहीं/ फूलेंगी  फलेंगी डालियां / लताएं फैलेंगी / गायब हो जाएगा /पेड़ों  का गंजापन/ पल्लवों के परदे से/ कूकेगी कोयल /पता नहीं पतझड़  को/वह छीट रहा होता है /सन्नाटा बाहर जब/ बो रहा होता है/ पत्तियों में पीलिया/ जड़े  जी-जान से/ बन रही होती हैं- वसंत  पृष्ठ 23 ।कवि की नजर केवल मानव जीवन की विसंगतियों पर ही नहीं है बल्कि पेड़, पौधे, चिड़िया इत्यादि पर भी है। ‘चिड़िया’ कविता में कवि कहते हैं कि “नहीं होती चिड़िया/ क्षीण पड़ जाता/ धरती का संगीत/ पेड़  हो जाते बेजुबान/सूरज उदास हो जाता /अधिक खाली पड़ जाता आसमान/ मीठे फल वाले वृक्षों में /फलने का कम हो जाता उत्साह  “पृष्ठ 25। इसी संग्रह में एक कविता है ‘मछली -पोखर ‘इसमें कवि ऐसे लोगों पर अपनी कलम चलाते हैं जो मछली बेच कर धन उगाही करता है और  यह भूल जाता है कि मछलियों में भी जीव का वास होता है ।भारतीय संस्कृति  जीव हत्या को पाप समझा जाता है फिर भी लोग लालच के वशीभूत होकर यह अपराध करने से भी नहीं हिचकते ।संग्रह की  एक और कविता है ‘भूख’ जो अपने कहन में कई  पाठ की मांग करती है और  जिसे पढ़ते हुए आपको सहज ही धूमिल की कविता’ रोटी और संसद’ याद हो आएगी ।कवि जब कहते हैं कि “भूख झेलना/ भूख पर भाषण बेलना/ दो विपरीत बातें हैं बरखुरदार!चाहे जितनी बार आग कहिए/ जीभ को आँच तक नहीं आती है/ पर छूते ही आग जलाती है! पृष्ठ 56 ।

संग्रह की एक और महत्वपूर्ण कविता का  जिक्र करना चाहूंगी जिसका शीर्षक है ‘कोहरा’ जिसमें कवि घने कोहरे में मेहनतकश और सुविधाभोगी की तुलना करते हुए कहते हैं कि जो मेहनत- कश होता है उसके लिए मौसम की प्रतिकूलता मायने नहीं रखती। वे किसी भी विपरीत परिस्थितियों में अपना रास्ता बनाना  बखूबी जानते हैं।प्रतिकूल परिस्थिति को अनुकूल बनाने के लिए  बस एक जज्बा भर होने की जरूरत है। चूंकि  कवि बिहार से हैं अतः ठंड के दिनों में होने वाले घने कोहरे का उन्हें एहसास है  और उन्होंने बहुत नजदीक से  इसकी पीड़ा को महसूस भी किया है ।उन्हें पता है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयां हों, घने कोहरे हों ,पर मेहनत से छँट ही जाते हैं ।वे कहते हैं “लड़ रहे हैं वे/ बहुरूपिये अंधेरे से/ निकल पड़े हैं रास्तों पर/ फावड़ा, कुदाल लिए/ होठों में सुलगती बीड़ी  दबाये/ किनाराकशी को विवश कोहरा/ छा जाता है दाएं- बाएं!! पृष्ठ 59।

संग्रह “देखा है मैंने” में कवि ने न केवल सामाजिक विसंगतियों को अपना शब्द दिया है बल्कि राजनीतिक चेहरों को भी बेनकाब करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। ‘आएंगे फिर ‘कविता में इसकी बानगी देखी जा सकती है- आएंगे वे फिर/  घाटियों में घूमेंगे /पगडंडी चूमेंगे/ बची- खुची हरियाली/ संग लिए जाएंगे/ घाटियां पुकारेंगी /दर्द में गुहारेंगी/ शिखरों पर बैठे वे/  ठहाके लगाएंगे” पृष्ट 72।

इस संग्रह से गुजरते हुए बार-बार आपको  यह एहसास होगा है कि कैसे कवि ने अपने लंबे  काव्यानुभव की बदौलत कविताओं में बड़ी कुशलता से समकालीन सवालों और चुनौतियों से टकराने की महारत हासिल की है।   संग्रह की यह भी एक बड़ी विशेषता कही जायेगी कि समकालीन मुद्दों पर बात करते हुए भी कहीं  उग्र नहीं हुई है और हाशिए के साथ खड़े होने के साथ-साथ निरंतर उसके पक्ष में  खड़े रहने के लिए प्रतिबद्ध भी दिखाई देती है ।आजकल जबकि पाठक कविता के अत्यधिक  गद्यात्मक होने की वजह से  कविता से दूर हो रहे हैं ,ऐसे वक्त में “देखा है उन्हें’ कविता संग्रह उन्हें पुनः  जोड़ने का काम जरूर करेगी।

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काव्य-संग्रह – देखा है उन्हें

कवि – डॉ रवीन्द्र उपाध्याय

प्रकाशन – अभिधा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर

मूल्य-160

 

समीक्षक – डॉ भावना

संपादक – आंच हिंदी वेब साहित्यिक पत्रिका

 

 

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