पुस्तक समीक्षा :: नीरज नीर

अगस्त्य के महानायक श्रीराम : एक मनुष्य के रूप में राम के अंतर्द्वंद्वों की पड़ताल
– नीरज नीर

राम कथा का कथानक ऐसा है कि इसे जितनी बार लिखा जाये, हर बार कुछ नए रंग, कुछ नए शेड उभर कर सामने आते हैं, जो पहले देखे, गुने, समझे गए कथ्यों से भिन्न होते हैं।
हजारों वर्षों से राम और उनकी कथा भारतीय जनमानस का कंठहार बनी हुई है। हम राम को जिस रूप में देखते और पढ़ते आए हैं, वह राम का एक पूजनीय रूप है, जिसमे वे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं , अवतारी हैं। लेकिन एक मर्यादा पुरुषोत्तम के पीछे , एक अवतारी के पीछे कहीं न कहीं एक सामान्य मनुष्य छुपा होता है, जो जीवन के विभिन्न घटनाक्रमों से उपजे भावनाओं के प्रवाह से आलोड़ित होता है। अपने महामानवीय गुणों के कारण वह इन भावनाओं पर शीघ काबू पा लेता है। अपनी स्थितप्रज्ञता के कारण उसे ये भावनाओं विह्वल एवं विचलित नहीं करती है। लेकिन वह भावना शून्य नहीं होता है। भावनाओं की लहरें उस महामानव के जीवन सागर के तट पर टकराती अवश्य हैं।

कवि राजेश्वर वशिष्ठ के द्वारा गद्यकाव्य शैली में लिखित “अगस्त्य के महानायक श्रीराम”, जिसे कवि ने एक चरित्र काव्य भी कहा है, राम के व्यक्तित्व का एक सर्वथा अस्पृष्ट एवं अनूठा परिप्रेक्ष्य हमारे सामने प्रस्तुत करता है।

राम न केवल भारतीय बल्कि अखिल वैश्विक जन मानस हेतु एक पौराणिक चरित्र भर नहीं बल्कि आस्था के परम श्रद्धेय अवतारी शिखर पुरुष हैं। इस तथ्य के प्रति दृढ़ निष्ठा एवं विश्वास के साथ कवि राम के व्यक्तित्व को देखने –समझने की एक नवीन दृष्टि जो स्थापित मान्यताओं से भिन्न है, पाठकों को प्रदान करते हैं।

कवि ने राम के व्यक्तित्व को एक सामान्य मानवीय दृष्टि से देखने एवं उसे रेखांकित करने का जोखिम उठाया है। वे एक सामान्य मानव जीवन के विभिन्न परिस्थितियों में उत्पन्न भावों के उद्दात आवेगों के प्रति क्रिया एवं व्यवहार को राम के संदर्भ में देखने की कोशिश करते हैं। इस गद्यकाव्य को रचना कवि के लिए कहीं से भी आसान नहीं रहा होगा। राम जैसे महान व्यक्तित्व की मनोवृतियों को उनके जीवन में घटित विभिन्न घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में उकेरना ऐसा ही है, जैसे लिखने वाला लिखते हुये राम के जीवन को जी रहा हो। उनकी गहन पीड़ा एवं संवेदनाओं के उतार-चढ़ाव से गुजर रहा हो। कवि राम के जीवन काल में उपस्थित तमाम उतार चढ़ावों के दौरान उनके मानसिक द्वन्द्वों की सघन पड़ताल करते हैं एवं अपनी काव्यदृष्टि से उसका संधान करते हुये उसे अपने काव्य की विषय वस्तु बनाते हैं। इस पुस्तक के माध्यम से कवि भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता के आदर्श पुरुष श्री राम को थोड़ा और करीब से हमे जानने समझने का अवसर प्रदान करते हैं।

यद्यपि कि कवि स्वयं लिखते हैं कि वे महज एक सूत्रधार की भूमिका में हैं एवं वे स्वयं श्री राम को अवसर देते हैं कि वह अपने अंतर के द्वंद्व को प्रस्तुत करें लेकिन जैसा स्पष्ट है कि यह अंतर्द्वंद्व जब कवि के मार्फत प्रस्तुत होता है तो कवि को इसकी प्रसव पीड़ा से अवश्य ही गुजरना पड़ा होगा।

इस गद्य काव्य की शुरुआत के लिए नैमिषारण्य के उपत्यका को चुना गया है, जहां श्री राम अश्वमेघ यज्ञ कर रहे हैं। वहीं महर्षि बाल्मीकि का अपने दो शिष्यों लव और कुश के साथ पदार्पण होता है। बाल्मीकि राम से कहते हैं कि सीता पवित्र है, उसमें कोई दोष नहीं है। आप यज्ञ के पश्चात इन्हें सहर्ष अयोध्या ले जा सकते हैं। लेकिन राम ऐसा कर पाने में अपनी असमर्थता जताते हुये कहते हैं:

“महर्षि क्षमा करना ,
यह आपका अपमान नहीं
कौशल नरेश का दायित्व वहन करते हुये
लोकभवना के समक्ष मेरा समर्पण है
मेरी दृष्टि में सर्वोच्च राजा नहीं प्रजा है।“

एक ऐसा मनुष्य
जिसे वहन करना होगा श्रेष्ठता का बोझ
आदर्श की स्थापना के लिए।

राम कथा में वर्णित सैकड़ो ऐसे ही दृष्टांतों को ध्यातव्य करते हुये राम, जीवन के रागों एवं विरागों से एक सामान्य मनुष्य की भांति कैसे प्रभावित होते हैं, विभिन्न प्रकार की भावना जनित संवेदना की लहरें कब और कैसे श्री राम को किसी विजन टापू पर ला पटकती है, जहां वे मर्यादा पुरुषोत्तम की गरिमा का बोझ उठाए नितांत अकेले होते हैं। इन सबका सूक्ष्मातिसूक्ष्म वर्णन इस काव्य के माध्यम से कवि ने करने का प्रयास किया है।

एक महमानव या अवतारी पुरुष एवं मानवीय रागों से पीड़ित एक सामान्य व्यक्ति के बीच के संबंध सूत्र को कवि बहुत ही सफाई एवं आत्मीयता से अपने लेखन में स्थापित करते प्रतीत होते हैं …

आज जब रामकथा के बरक्स स्त्रीवादी या दलितवादी विमर्श के नाम पर राम के द्वारा लिए गए निर्णयों पर कई प्रश्न उठाए जाते हैं, वैसे में राजेश्वर वशिष्ठ जी की यह पुस्तक इन प्रश्नों के उत्तर प्रस्तुत करती है। इस दृष्टि से राम चिंतन का अध्ययन करने वाले अध्यताओं के लिए भी यह एक जरूरी किताब के रूप में हमारे सामने आती है।

प्रस्तुत पुस्तक 81 अध्यायों में विभाजित है। श्री राम के माध्यम से मानवीय चित वृत्तियों का वर्णन करने के क्रम में प्रत्येक अध्याय के प्रारम्भ में मानव व्यवहार को इंगित करते हुये कई विचारोत्तेजक कवितायें बन पड़ी है, जो अगर स्वतंत्र रूप से भी पढ़ी जाये तो अपने गहनतम भाव बोध के कारण पाठक के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं। ऐसा कवि ने जानबूझ कर किया है या ऐसा हो गया, यह तो पता नहीं , लेकिन पाठकों के लिए यह एक बोनस की तरह है। इस क्रम में कुछ अत्यंत ही प्रभावी एवं सुंदर कवितायें पढ़ने को मिलते है; कुछ उदाहरण देखें:

पुरुषों के लिए शिकार के मृग की तरह
रहा है स्त्री का चरित्र
जिसे उसने सदा भटकाया है
संदेह के तिमिर में
चाहे वह दासी हो या पटरानी।
वह सदैव सशंकित रहा है
अपने पुरुषत्व के प्रति
और पुरुषों के इस द्वेष में
हर बार प्रताड़ित हुई है स्त्री
पुरुष नियंत्रित समाज में।

अधर्म के मूल में
आत्मा बनकर
सदा ही छिपा रहता है छल !
धर्म और अधर्म के युद्ध में
अंततोगत्वा जीत तो जाता है धर्म
पर तब तक वह थक हार कर
हो चुका होता है लहूलुहान

 

युद्ध के मैदान में
पैशाचिक नृत्य करती है घृणा
मनुष्य अपनी वृति को भूल
अट्ठहास करता है
प्रत्येक असामयिक मृत्यु पर
भले ही कालांतर में इस हिंसा को
मान लिया जाए
धर्म और न्याय का प्रतिष्ठापन
और विजय द्वार तक पहुँचने का मार्ग।

मानव व्यवहार के निर्धारण में
पुरुषों ने ही तय किए होंगे
पौरुष के मानक
श्रेष्ठता की लालसा में
भुला दिया होगा यह तथ्य
कि अंततः सीमाएं होती हैं
मनुष्य की संवेदना की भी ,
पुरुषों में भी होता है

चेतना का कोमल तत्व
जिसे स्त्री कहकर नकार दिया होगा
समाज शास्त्री मनोवैज्ञानिकों नें ।

कवि राजेश्वर वशिष्ठ पौराणिक विषयों एवं उससे जुड़े अध्यात्म के गहरे अध्येता हैं। इसी विषय पर इनकी एक और पुस्तक “सुनो बाल्मीकि” भी आ चुकी है। रामकथा पर ऐसे तो सैकड़ों किताबें विभिन्न भाषाओं में विश्व भर में लिखी गयी हैं पर यह पुस्तक राम के मानसिक अंतर्द्वंद्वों को प्रकट करने की अपनी अनोखी कोशिश एवं रामकथा को आधुनिक दृष्टि से देखने के कारण अपने लिए बिलकुल अलग ही स्थान सृजित करती है।
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पुस्तक का नाम : “अगस्त्य के महानायक श्रीराम”
रचनाकार : राजेश्वर वशिष्ठ
प्रकाशक : ज्ञान गीता प्रकाशन, एफ़ -7 , गली न 1, पंचशील गार्डेन, एक्स नवीन शाहदरा, दिल्ली – 110032

समीक्षक : नीरज नीर
“आशीर्वाद’
बुद्ध विहार, शुभगौरी इंकलेव के पीछे
रांची (झारखंड) – 834 002
Mob 8789263238

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