पुस्तक समीक्षा : मुकेश दुबे

रूमानी कलेवर में गंभीर चिंतन सहेजती कहानियाँ

डार्क चॉकलेटी आवरण पर रखा कप, कप से उठती भाप में नज़र आते दो दिल और सुर्ख गुलाब ! काफ़ी हैं महसूस कराने के लिए कि संग्रह कच्ची उम्र के जज्बातों की पनाहगार किसी कॉफ़ी हाउस में पनपती प्रेमकथाओं का लेखाजोखा है।
जैसे-जैसे पृष्ठ पलटते जाते हैं, मन की भ्रांति उसी तरह दूर होती है जिस तरह ‘साकेत’ में लिखा है राष्ट्रकवि गुप्त जी ने-
नाक का मोती अधर की कांति से
बीज दाड़िम का समझकर भ्रांति से
देखकर सहसा हुआ शुक मौन है
सोचता है अन्य शुक यह कौन है?
उर्मिला की नथ से तोता भ्रमित हो गया था। यहाँ भी यही स्थिति है।

रश्मि तारिका जी ने शीर्षक व आवरण को झुठलाते हुए बहुत परिपक्व रचनाकार का परिचय देते हुए पहला कहानी संग्रह प्रकाशित किया है।
प्रथम संग्रह सदैव आत्मविश्वास तथा संभावनाओं से भरा होता है। रश्मि ने इस बात को अक्षरशः सत्य साबित किया है। कुल 16 कहानियाँ हैं कॉफ़ी कैफ़े में। हर कहानी जीवन के दूसरे या तीसरे पड़ाव के इर्दगिर्द बुनी गई है। अकेलेपन का दंश या उपेक्षा का हलाहल झेलते चार से पांच दशक जी चुके उन लोगों की व्यथा-कथा जिसे साझा करने के लिए अमूमन कोई साथी नहीं मिलता, रश्मि ने बखूबी उकेरा है उस दर्द को।
पहली कहानी ‘वो निशा ही थी’ दांपत्य जीवन की त्रासदी की कथा है। स्त्री व पुरुष दो किनारे हैं जो स्नेह सरिता के दो सिरे हैं। प्रेम प्रवाहित रहे तो जुड़े रहते हैं दोनों दूर रहकर भी किन्तु सूख जाये यदि धारा तब कंटीली झाड़ियां और बदसूरत चट्टानें नज़र आती हैं।
ऐसे में संतान बन सकती है सेतु। गंभीर कथ्य का सुन्दरतम निर्वहन किया गया है।
“एक मुहब्बत ऐसी भी “अकेलेपन का दंश झेल रहे दम्पत्ति की कहानी है। पीजी बनकर आई युवतियों से सैशल मीडिया की दुनिया में पहुँची एक प्रौढ़ा के बदलाव को आत्मसात नही कर सका पति परन्तु अंढवत भला तो सब भला की तर्ज पर सुखांत खुशी दे जाता है।
“गुमनाम पत्र ” आज की पढ़ी लिखी व प्रगतिशील महिलाओं के अंतस की पीड़ा को सिर्फ़ उजागर नहीं करती अपितु उसे समझकर सुलझाने की राह सुझाती है।
‘मुक्ति’ तथाकथित प्रगतिशील पती की मानसिकता का कच्चा चिट्ठा है। शारीरिक बीमारी को झेलती स्त्री के मानसिक द्वंद से मुक्त होने की अनूठी मिसाल है।
“मर्जी का सुख” कहानी स्त्री विमर्श के सबसे ऊपरी खाने में रखी जाने वाली अप्रतिम कहानी है जिसमें एक स्त्री की सहन शक्ति तथा विद्रोह की पराकाष्ठा को लिखा है रश्मि ने।
“कच्ची धूप “में युवा पीढ़ी के भटकाव के साथ माँ के सहयोग व प्रेरणा की बानगी है। अंत में पिता का पुत्र के लिए स्नेह आँखें भिगा जाता है।
“गार्लिक स्टिक्स” में वैवाहिक जीवन में आये ठहराव को बेटी के प्रयासों ने झिंझोड़ कर पुन: प्रवाहित किया है। पिज्जा के चीज़ की एलास्टिक व लहसुन के फ्लेवर ने अंत को हृदयस्पर्शी बना दिया है।
“प्रस्ताव” एकाकी जीवन से आजिज आये तथा परिस्थितियों से जूझते दो अधेड़ की कहानी है जिसमें हारती-टूटती माँ का सहारा बनता है एक विधुर।
“वैल विशर” आज के समय की ऊहापोह भरी ज़िन्दगी में सुकून तलाशती स्त्री की कहानी है जो संशय के झूले में झूलती रहती है परन्तु अंत में वास्तविकता का भान हो जाता है।
“एक नई सुबह “वास्तव में उजाले के साथ सूरज भी ले आई…. परिवार के लिए जीवन होम करने वाली युवती को वैलेंटाइन डे का अनमोल तोहफा मिल गया।
“बस अब और नहीं” भी विशुद्ध स्त्री विमर्श है। सोशल मीडिया तथा काम वाली बाई को बिंब बनाकर बहुत गहरी बात की है रश्मि ने।
“वाह वोमेनिया” आज के समय में स्थापित महिलाओं के अंतस का द्वंद है। कभी मनोवैज्ञानिक कभी समीक्षात्मक शैली में लिखी गई यह कहानी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है।
“आखिर कब तक?” में बेटी व बेटे के फर्क को प्रभावी तरीके से चित्रित किया है। एक माँ के अहसास और जन्म देकर त्यागी बिटिया के सलामत होने के बाद पिता के मनोभावों में बदलाव का सुन्दर प्रस्तुतिकरण है इस कथा में।
“जमा-पूँजी “बेटी के विवाह के समय माता-पिता की दूरदर्शिता की नजीर है।
“इमोशंस इन एंड आउट” लिवइन रिलेशंस को बुनियाद देती अच्छी कथा बन पड़ी है।
शीर्षक कथा “काफ़ी_कैफ़े” बहुत अलग मिजाज की कहानी है।
आरम्भ किसी और रूप में होता है परन्तु अंत बिल्कुल अलग किया है रश्मि ने।विवाहेत्तर सम्बंध का अहसास कराती कहानी का अंत चौंका जाता है। यही इस कहानी की विशेषता है।
रश्मि की कहानियों में प्रेम का वह स्वरूप दिखता है जिसमें देह गौड़ हो गयी होती है परन्तु भावनाएँ उफान पर होती हैं। पर्याप्त स्पेस देती हैं रश्मि और कथ्य के अनुरूप उतार चढ़ाव विशेषता है आपके लेखन की। कथा तत्वों के साथ पूरा इंसाफ़ किया है रश्मि ने पहले ही प्रयास में जो यकीनन जोरदार दस्तक है भविष्य की सफल लेखिका की।
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पुस्तक : कॉफी कैफे, लेखिका – रश्मि तरीका
समीक्षक : मुकेश दुबे, भोपाल

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