उर्दू हिंदी अल्फ़ाज़ का हसीन मिलन शब्दों की कीमत

शायरी का लगाव हमेशा दिल से रहा है. मौज़ू और मंज़ूम कलाम को शायरी कहते हैं. दूसरे शब्दों में अपने हुस्न-ए-ख़्याल को अल्फाज़ का हसीन जामा पहनाना ही शायरी है.
शायर वो आइना है जो भूत, वर्तमान, भविष्य कके हालात की तस्वीर ज़माने को दिखाने की सलाहियत रखता है.
बक़ौल अल्लामा जमील मज़हरी –
न सेयाही के हैं दुश्मन न सुफ़ैदी के दोस्त
हम को आइना दिखाना है दिखा देते हैं.
किसी भी तखलीक़ पर अपनी राय देना भी कुछ इसी तरह की है –
शायरी खेल नहीं है जिसे बच्चे खेलें
होश उड़ जाते हैं अश्आर को गढ़ते-गढ़ते
एक शायर या शायरा किन-किन पथरीली राहों से फिक्र का बोझ उठाये गुजरता है, उसकी तकलीफ को सिर्फ और सिर्फ शायर ही महसूस कर सकता है –
राज़ जो सीनए फ़ितरत में नेहां होता है
सबसे पहले दिल-ए-शायर अयां होता है
इस लिहाज से हम देखते हैं कि डॉ भावना ने शब्दों की कीमत ग़ज़ल-संग्रह में अपनी भावनाओं, एहसासात, अफ़कार को बड़ी हुस्न व ख़ूबी के साथ एकत्रित करके पाठकों के सामने पेश करने की हिम्मत की है. इनकी शायरी में अदब बराये अदब एवं अदब बराये ज़िंदगी दोनों की झलक  नज़र आती है –
जिंदगी है शायराना रात दिन
याद करना याद आना रात दिन
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कोख मिलती है अब किराये पर
अब तो सरोगेशी का जमाना है

एहसास की शायरी की बेशक़ीमती अंदाज़ इनकी शायरी में है. मुझे जहां तक याद आता है कि इनकी ग़ज़लों का पहला मजमुआ अक्स कोई तुम सा है. शायरी की डगर पर अक्स कोई तुम-सा से चलते हुए शब्दों की कीमत तक पहुंचने पर डॉ.भावना की फ़िक्री ख़जाना में काफ़ी तरक्की हुई है. बल्कि मैँ तो यह कहूंगा कि उर्दू हिंदी अल्फ़ाज़ के हसीन मिलन की नायाब मंजिल का नाम शब्दों की कीमत है.
शून्य है जज़्बात फिर क्या सोचना
अब तो केवल है निभाना रात दिन
साफ़गोई और बेबाकी केवल शायर का ही हिस्सा है. बेबाकी की ये मिसाल मुलाहज़ा हो –
जो केवल स्वार्थ में लिपटे हुए हैं पांव से सर तक
वही तो देश की धरती पे बन अभिशाप बैठे हैं
ग़ज़ल वो हसीन अल्मारी है, जिसमें कितने ख़ाने हैं. किसी में हुस्न व इश्क की हसीन वादियाहं हैं तो किसी में राजनीतिक, सामाजिक, एक़वसादी, मआशी हालात की सरगोशियां सुनाई देती हैं. डॉ.भावना का ये हसीन शेर तग़ज़्ज़ुल के मेयार को किस क़दर बुलंदी अता कर रहा है –
क्या मिला है उदास करके मुझे
रुह तक बेलिबास करके मुझे
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कौन छू कर चला गया है बदन
वाे वहा थी या उसका साया था
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प्यार की कुछ बूंद पाकर हम हरे से हो गए
मन तो बच्चा ही रहा बस उम्र ढलती रही

डॉ.भावना हालात की बेबसी पर जब क़लम उठाती हैं तो ये हसीन तस्वीर सामने आ जाती है कि,
ज़िदगी की धूप में चलते हुए
धूप को सहने की आदत हो गई
डॉ.भावना की ग़ज़लों का ये संग्रह शब्दों की कीमत में कही-कहीं कुछ खामियां भी झलकती है. ऐसा लगता है जैसे प्रूफ रीडिंग के समय यह नज़र से ओझल हो गई. ये कहने में ऐतराज नहीं कि डॉ.भावना की ग़ज़लों में रंग-ए-तग़ज़्ज़ुल अपनी पूरी आब-व-ताब के साथ ख़ंदाज़न है. मुलाहजा हो –
रात रौशन है भरी पूरी जवानी लेकर
चांद तारों की चमकती सी कहानी लेकर
……………………………………..
फिर से खुद को छिपा लिया उसने
पास उसके नक़ाब है साहब

ग़ज़ल वो सिंफ-ए-शायरी है, जिसके चाहने वाले हर दौर में रहे हैं. आज भी अपने हुस्न की बुनियाद पर इतनी ही चहीती है जितनी मीर व गालिब के वक्त थी, बल्कि मैं तो ये कहूंगा कि ग़ज़ल  मीर व ग़ालिब तक महदूद थी अब डॉ भावना की लेखनी में नज़र आ रही है. डॉ भावना की ओर से मैं ये कहना चाहता हूं –
आसमानों से ये नहीं उतरी
इसी धरती की बे कली है ग़ज़ल
मीर व ग़ालिब के घर में रहती थी
अब मेरे घर में आ गई है ग़ज़ल

आज ग़ज़ल अपनी तमाम तर रानाइयों के साथ बाम-ए-ओरुज पर है.जहा ये मानकी अफ़कार से लबरेज़ है. वहीं हकीकत बयानी की मंज़रकशी का हसीन अक्स देखने में मिलता है. बकौल डॉ.भावना –
कुछ नई खोज करता रहा आदमी
जब परेशानियों से घिरा आदमी

अपनी भावनाओं को ग़ज़ल के हसीन पोशाक में पेशा करके आबरुए ग़ज़ल को चार चांद लगाने में डॉ.भावना की जो कोशिश रही है वो काबिले तारीफ़ है और मैं इसके लिए उन्हें दिल से आभार देता हूं –
यूं कहीं अनकही बात चलती रही
भावनाओं में बहता रहा आदमी

डॉ.भावना काबिल-ए-मुबारक बाद इस लिए भी है कि ये स्वयं विज्ञान के उस सेक्क्शन से ताल्लुक रखती हैं, जहां दिन रात केमिकल बैलेंस, ऑर्गेनिक व इनऑर्गेनिक जैसे मामलात से साबका पड़ता है. इतने गंभीर विषय के बाद भी शायरी के सिंफ-ए-ग़ज़ल में महारत रखती हैं, यह काबिले तारीफ है. ज़िंदगी में केवल वही फनकार हासिल कर सकता है जो अपने फ़न में इंफेरादियत पैदा कर सके. इंफेरादियत से तात्पर्य यह कि इसे जब पढ़ा जाए तो नई हैरत का सामना हो. गालिब का यह शेर मैं ग़ज़लकारा को समर्पित करता हूं –
तुम सलामत रहो हज़ार बरस
हर बरस के हों दिन पचास ह़जार

पुस्तक समीक्षा
ग़ज़ल संग्रह – शब्दों की कीमत
ग़ज़लकारा – डॉ.भावना
प्रकाशक – अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद
मूल्य – 235 रुपये

समीक्षक
– महफूज़ आरिफ़
शायर व समीक्षक

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