प्रतिरोध का संसार बुनती ग़ज़लों का गुलदस्ता है – यह नदी खामोश है
डॉ़ भावना

यह नदी खामोश है सुपरिचित गज़लकार हरे राम समीप का सद्य प्रकाशित ग़ज़ल-संग्रह है,जो बोधि प्रकाशन से छप कर आया है ।संग्रह में अपनी बात कहते हुए समीप जी ने स्वयं स्वीकार किया है कि हिंदी ग़ज़लों ने समय के साथ अपना चेहरा, स्वभाव व सौंदर्यशास्त्र बदला है, जिसकी वज़ह से समकालीन ग़ज़ल परिदृश्य में हिंदी ग़ज़ल ने नया सौन्दर्यशास्त्र रचा है। नए भाव, नए विचारों और नई बिम्बधर्मिता ने हिन्दी ग़ज़ल का चेहरा साफ और आकर्षक बना दिया है। दरअसल ग़ज़ल के सृजन में विवेक के साथ विचारशीलता और प्रतिबद्धता का समावेश होना चाहिए। लेखक चाहे किसी साहित्यिक विधा में लिखता हो ।प्रतिरोध उसका स्वाभाविक गुण है। कहना न होगा कि हरे राम समीप जी की ग़ज़लें प्रतिरोध का संसार बुनते हुए वंचित और उपेक्षित समाज के पक्ष में खड़ी होती है ।
उस आदमी की कल्पना कीजिए ,जिसके लिए आप के मुख से निकला एक सच, उसके तमाम गुनाहों की माफी है ।फिर भी हम मौन रहते हैं! यह मौन बिल्कुल वैसा ही है जैसे कि कौरवों की सभा में द्रोपदी चीखती रही पर किसी के मुख से एक भी शब्द नहीं निकला। सच के समक्ष आदमी का मौन उसे कटघरे में खड़ा कर देता है। कुछ इसी तरह की भाव भूमि पर इनकै शेर देखें-

फैसला सच का टिका है इस गवाही पर तेरी
फिर बता कैसे तेरी जिंदादिली खामोश है

ख़्वाहिशों का कोई अंत नहीं होता ।यह श्मसान में जाकर ही खत्म होती है। सच पूछिए तो ये ख़्वाहिशें ही हर एक समस्याओं की जड़ है ।क्षमता से अधिक पाने की ख़्वाहिश मनुष्य को आत्महत्या तक करवा देती है। ख्वाहिशें होनी चाहिए पर ,उतनी ही जितनी आवश्यकता है।शेर देखें-

ख्वाहिशें, फिर ख्वाहिशें,फिर ख्वाहिशें
आप गिर जाएंगे इतने भार से

जीवन में बाजारवाद इस कदर हावी हो गया है कि उससे निकल पाना मुश्किल है ।टीवी शॉपिंग ,फ्लिपकार्ड, अमेजॉन और ना जाने कई शॉपिंग सेंटर इंटरनेट पर मिल जाने से, घर ही बाजार में तब्दील हो गया है। बाजार का पूरा ताना-बाना इस तरह बुना गया है कि न चाहते हुए भी लोग बाजारवाद के चंगुल में फंसते जा रहे हैं। बाजार अपने हित के लिए सृष्टि का दोहन कर रहा है, इसमें कोई संदेह नहीं।

जाल मकरी बुन रही है यूँ निराले ढंग से
हर कोई फँसता मिला बाजार की मुस्कान में

आज का समय अराजकता की चपेट में है। ऐसे वक्त में, अन्ना हजारे जैसा कोई व्यक्ति सत्य के पक्ष में आंदोलन करता है ,तो आश्चर्यचकित होना स्वाभाविक है ।नैतिक पतन और मूल्यों की गिरावट के दौर में उसूल की बात करना हास्यास्पद प्रतीत होता है।शेर देखें-

अराजक समय में उसूलों की बातें
गज़ब कर रहे हो तुम अन्ना हजारे

विकास के नाम पर पर्यावरण के साथ जो खिलवाड़ हो रहा है,उसका खामियाजा हम सभी ने अभी-अभी भुगता है ।कहना न होगा कि कोरोना वायरस इसी खिलवाड़ का नतीजा है। पर, लोग अब भी समझने को तैयार नहीं हैं ।पेड़ों को काटकर अपार्टमेंट बनाये जा रहे हैं ,कॉलनियाँ बसाई जा रही हैं और परिंदे दर-ब -दर भटकने को मजबूर हैं।क्षणिक लाभ के लिए ये लोग पृथ्वी को कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं, इनको भान तक नहीं है। शेर देखें-

हुई शाम तो याद के पेड़ पर
परिन्दे कई चहचहाने लगे

उपरोक्त शेरों को देखकर यह स्पष्ट है कि समीप जी ने अपनी ग़ज़लों में सम सामयिक विषयों को शिद्दत से उकेरा है। व्यक्तिगत जीवन, रिश्तों, घर और बाजार से लेकर पर्यावरण तक इनकी चिंता में शामिल है ।यही एक सजग गज़लकार की जिम्मेदारी भी है। इसमें दो राय नहीं कि ‘यह नदी खामोश है’ हिंदी गज़ल के पाठकों के लिए एक जरूरी संग्रह सिद्ध होगा।
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पुस्तक – यह नदी खामोश है
ग़ज़लकार-हरेराम समीप
प्रकाशन- बोधि प्रकाशन
मूल्य – 150 रूपये
समीक्षक – डाॅ भावना

 

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