मुखर संवादों की खुली किताब
                                              – अनिरुद्ध सिन्हा
बी.आर.विप्लवी हमारे समय के महत्वपूर्ण ग़ज़लकार हैं। विप्लवी साहब काफी समय से ग़ज़ल लिखते रहे हैं। हिन्दी ग़ज़ल के मुखर और बेबाक ग़ज़लकारों में इनका नाम आता है। अपने सामाजिक मूल्यों,जीवन-व्यवहारों में हो रही अव्यवस्थाओं,विसंगतियों को इन्होंने जब भी देखा और महसूस किया है,उनके विरुद्ध ग़ज़लों के माध्यम से आवाज़ उठाने में थोड़ा सा भी संकोच नहीं किया है। अपने आस-पास की चीजों से या किसी भी विसंगत मुद्दे पर खामोश रहने अथवा बचकर निकलने की कोशिश करते दिखाई नहीं पड़ते। इनकी तमाम ग़ज़लें इस बात की साक्षी हैं। चाहे वह ग़ज़ल-संग्रह”तश्नगी का रास्ता” की ग़ज़लें या “सुबह की उम्मीद” की ग़ज़लें हों। करीब दस वर्षों के बाद इनका तीसरा ग़ज़ल-संग्रह “प्यास ही प्यास”हाल ही में विप्लवी प्रकाशन,गाज़ियावाद से छपकर पाठकों के समक्ष आया है। संग्रह में कुल 101 ग़ज़लें हैं। संग्रह की अधिकांश ग़ज़लों में सहज संवादों और प्रसंगों के बहाने उनका प्रतिरोधी स्वर उभरकर सामने आया है। प्रख्यात शायर वसीम वरेलवी ने भी पुस्तक की भूमिका में लिखा है”इंसाफ़ के पक्षधर,जुल्म के घोर विरोधी,आशा के हामी,निराशा के आलोचक,हक़ के पैरोकार,नाहक़ और तिरस्कार से बेज़ार विप्लवी जीवन के हरेपन की खुरदरी वास्तविकताओं को अपनी शायरी में ढालने का अपना एक अंदाज़ रखते हैं”
संग्रह की ग़ज़लों को पढ़ने के बाद ऐसा लगता है विप्लवी साहब का पूरा जीवन दलितों और वंचितों के बीच बीता है। गरीबी मजबूरी,शोषण के प्रभाव को बहुत नजदीक देखा है। उन चेहरों को भी पढ़ा है जिन पर दलित और शोषित होने का ठप्पा लगा है। देखें इस शेर को—
पूछकर, जात-घराने मेरे
सब लगे ऐब गिनाने मेरे
अन्य ग़ज़लकारों की ग़ज़लों और समीक्षित संग्रह की ग़ज़लों के बीच जो फर्क दिखाई पड़ता है वह इस बिन्दु को लेकर है कि विप्लवी ग़ज़ल लिखते हुए कौन सी चिंता को ज़्यादा प्रकाश में लाने की कोशिश कर रहे हैं—समाज और सरोकारों की चिंता या लोकप्रियता और पहचान की । मुझे तो ऐसा नहीं लगता कि इनकी ग़ज़लें लोकप्रियता की चौखट पर पहुँचने के लिए समय की पगडंडियों की धूल अपने माथे पर मल रही हैं। ग़ज़लों का जो प्रबल स्वर है वह है प्रतिवाद के सहारे प्राप्त अनुभवों के आधार पर वृहत्तर परिदृश्य और परिप्रेक्ष्य तक पहुंचा जाए। हद तक इन्हें सफलता भी मिलती है। इनकी ग़ज़लों का प्रतिवाद ही इनके लेखन का सम्पूर्ण चेहरा प्रभावित करता है जिसमें सांस्कृतिक,सामाजिक परिवेश और राजनीति की बारीक पड़ताल के बीच इनके हर स्पंदन में शोषण और आत्याचार इनकी ग़ज़लों के शेरों को जीवंत और सामाजिक बना देते हैं।
संग्रह की ग़ज़लें वैचारिक तथा भावात्मक दोनों ही स्तरों पर प्रगतिशील ग़ज़लकार के रूप विप्लवी के लेखकीय विकास को अंकित करती हैं। इस मामले में भी ग़ज़लें समय सापेक्ष हो जाती हैं कि वह गुदगुदाकर पीड़ा से विमुख नहीं करतीं बल्कि बड़ी क्रांति या बड़े परिवर्तन के लिए उपयुक्त भूमि तैयार करती हैं। पीड़ा के उन्मूलन के लिए हमें संघर्ष करने के लिए तैयार करती हैं।
इन शेरों को देखने के बाद तो ऐसा ही लगता है ये सारे आम जीवन की झाँकियाँ हैं जो आज के सामाजिक परिवेश को पूरी तरह दिलो-दिमाग में उतार रही हैं—
कहीं शिवाले, कहीं मस्जिदें गिराते हैं
ये लोग,मलबों से,झगड़े का घर उठाते हैं
सूद तेरा है,सब ज़ियां मेरा
खेल तेरा है इम्तहां मेरा
आँखों में  धूल  झोंक,बहुजन विकास में
क़ातिल ने कहा,जान वो डालेगा लाश में
विप्लवी का ग़ज़ल-संसार कोई जीवन से अलग-थलग नहीं होता, जीवन में प्रवेश करने,उसके भीतर हलचल और समझ पैदा करने का उनका अपना तरीका है।कुछ ऐसे भी शेर हैं जो निम्न वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग को न केवल राहत देते हैं बल्कि तर्कसंगत दृष्टि के साथ विद्रोह के लिए उकसाते भी हैं….
मुश्किलों से खौफ़ खाना छोड़ दें
या वो,मेरे साथ आना, छोड़ दें
चरन की धूलि लो,पूजा करो,सौ बार,दलितों की
मगर,बनने न पाये, देखना,सरकार,दलितों की
जिस्म से,जब भी जान छुड़ानी पड़ती है
ख़ुद से कितनी रार मचानी पड़ती है
ये जिंदगी सज़ा है,रिहाई गुमान है
छोटी सी उम्र और बड़ा इम्तिहान है
संग्रह की ग़ज़लों में जो सहज खुलापन,गहरी संवेदना और सृजनात्मकता है उन्हें समझने के लिए पाठ के क्रम में कुछ पलों के लिए कभी-कभी ठहरना भी पड़ता है। शिल्प और बुनावट ,आत्मीय संवाद तथा आम बोलचाल की भाषा पाठकों को सहज ही अपनी ओर आकर्षित कर लेती है।
समीक्षित कृति
प्यास ही प्यास (ग़ज़ल-संग्रह)
ग़ज़लकार-बी.आर.विप्लवी
प्रकाशक-विप्लवी प्रकाशन
R-24 राजकुंज,राजनगर
गाज़ियावाद-201002
मूल्य-300/-(सजिल्द)
समीक्षक
अनिरुद्ध सिन्हा
गुलज़ार पोखर,मुंगेर(बिहार)811201 mobile-7488542351

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