समकालीन महिला गजलकार : एक महत्वपूर्ण कृति : जयप्रकाश मिश्र

समकालीन महिला गजलकार : एक महत्वपूर्ण कृति

जयप्रकाश मिश्र

ख्यातिप्राप्त लेखक एवं चर्चित दोहाकार हरेराम “समीप” के संपादकत्व में छपी पुस्तक “समकालीन महिला गजलकार” साहित्य जगत में एक महत्त्वपूर्ण कृति है। इसमें कुल बाइस महिला गजलकारों की गजलें छपी है। कुछ नामों को छोड़कर सभी महिला गजलकारों की एक विशिष्ट पहचान है। यह पुस्तक प्रासंगिक और पठनीय है। इसमें प्रकाशित गजलों के विभिन्न रंग हैं तथा विविधता का खास ख्याल रखा गया है। लगभग सभी ख्याति प्राप्त महिला गजलकार यहाँ मौजूद हैं मसलन-  डॉ भावना, डॉ मालिनी गौतम, उर्मिल सत्य, डॉ रमा सिंह,  सरोज ब्याज,  डॉ मुक्ता,  डॉ राजकुमारी शर्मा”राज”, सविता चड्ढा,  डॉ नलिनी विभा “नाजली” डॉ वर्षा सिंह, दीप्ति मिश्र, डॉ प्रभा दीक्षित , डॉ विनीता गुप्ता,  जया नरगिस,  ममता किरण, श्री मती कृष्णाकुमारी “कमसीन” , डॉ शरद सिंह,  इंदु श्रीवास्तव,  अनु जसरोटिया,  मीनाक्षी जिजीविषा,  डॉ सोनरूपा विशाल तथा निधि सिन्हा “निदा”।
इन महिला गजलकारों की गजलों की भाषा में बनावटीपन से दूर एक ऐसी सहजता है जो पाठक के दिमाग पर बगैर जोर लगाये उसे अपने प्रवाह में शामिल कर लेती हैं। इन गजलों में संघर्षों और विसंगतियों का जीवंत चित्रण दिखायी देता है। इन महिला गजलकारों की गजलें जिन्दगी की व्यथाओं के अनेक रंगों को हमारे सामने रखती हैं। इनकी गजलों का फलक इतना ऊँचा हो गया है कि वह रूह की चौखट तक आकर दस्तक देने लगता है। ये गजलें हकीकत से मुठभेड़ करती दिखती हैं तथा हकीकत को समझने के लिए आधारभूमि जरूर तैयार करती हैं। गजल का सफर आसान नहीं लेकिन इन महिला गजलकारों ने अनुभव तथा चिंतन के बल पर सफर को आसान बना दिया है। साहित्य की दुनिया  केवल भावनाओं के प्लावन की दुनिया  नहीं है वरन् चित्तवृत्तियों के परिशोधन की भी दुनिया है। इन गजलों में जीवन की जटिलताओं,  संघर्षों, दुरभिसंधियो का यथा तथ्य वर्णन और समाज, धर्म, राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ वाणी मुखड़ है। प्रेम की भावनाएं भी इन गजलों में समाहित है। इन गजलों में हमारे समाज में प्रचलित कुछ परम्परा,  लोक विश्वास,  नीति नियमों के खिलाफ भी पुरजोर आवाज उठाई गयी है तथा मानवीय मूल्यों को स्थापित करने की झलक मिलती है।मतला, मक्का,  काफिया, बहर सभी इन गजलों में देखते ही बनते हैं तथा इन गजलों में समर्थ रचनाकार का आभास मिलता है। कुल मिलाकर इस संकलन को गजल की प्रयोगशाला कह सकते है। गजल लिखना शब्दों की कलाबाजी नहीं है। गजल को लिखना नहीं बल्कि जीना पड़ता है। इन महिला गजलकारों की गजलें पढकर ऐसा लगता है कि अच्छी गजलों की सम्भावनाएं एवं परम्परायें अभी समाप्त नहीं हुई है। इस संकलन के कुछ निम्नलिखित शेर ध्यातव्य है-
पसीने से जो रोटी बो रहा है
वो खेतिहर भला क्यों रो रहा है
लपट ऐसी उठी है वासना की
बडा़ शर्मिंदा रिश्ता हो रहा है
समय के साथ चलना चाहिए था
मुझे खुद को बदलना चाहिए था
यही अपराध है उनका कि  दोनों प्रेम  करते हैं
सजा जिनके लिए लेकर यहाँ पर “खाप” बैठे है
– डॉ भावना

हर दिल में मक्कारी देखी
बस मतलब की यारी देखी
– मालिनी गौतम

आँख में भरकर समंदर रख लिया
याद का खामोश मंजर रख लिया
– डॉ रमा सिंह

आज फिर रात अकेली क्यूँ है
जिंदगी गम की पहेली क्यूँ ह
– डॉ मुक्ता

टूटा चश्मा , घिसी कमानी
चाह की खुरचन बूढ़ी आँखें
– डॉ वर्षा सिंह

दुखती रग पर उँगली रखकर पूछ रहे हो कैसी हो
तुमसे ये उम्मीद न थी, दुनिया चाहे जैसी हो
– दीप्ति मिश्र

नाव माँझी की भूल से डूबी
सर पर इल्जाम है समुंदर के
– जया नरगिस

अक्स भी बिकने लगेंगे एक दिन तुम देखना
आइने बिकने लगे,  अँगराइयाँ बिकने लगीं
– डॉ राजकुमारी शर्मा राज

तदबीरों से किस्मत बदला करती है
पगली है जो ऐसा सोचा करती है
– सोनरूपा विशाल

उसकी मुट्ठी भरी हुई है, मेरी मुट्ठी खाली खाली
उसने पहले छतरी माँगी, फिर चुपके से धूप चुरा ली
– डॉ शरद सिंह

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पुस्तक का नाम – समकालीन महिला गजलकार
प्रकाशक- गीतिका प्रकाशन
16 साहित्य विहार
बिजनौर ( उत्तर प्रदेश) 246701

समीक्षक : जयप्रकाश मिश्र
मिश्रा टोला, शिवहर

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