साहित्य के पक्ष की बात करता है “आलोचना का विपक्ष”

  • नीरज नीर

आलोचना मनुष्य की स्वाभाविक वृति है पर यह आलोचना जब किसी सम्यक विचारवान व्यक्ति के द्वारा की जाये जो आलोच्य  विषय वस्तु का ज्ञाता हो तो ऐसी आलोचना रचनाकर एवं पाठक दोनों  के लिए लाइट हाउस का काम करती है। आलोचना का अर्थ रचे गए साहित्य की अंतर्वृतियों एवं प्रवृतियों  का विवेचन करते हुये उसके गुण दोषों का मूल्यांकन करना एवं उसे पाठकों के समक्ष उद्भाषित करना है।

आलोचना रचनात्मक साहित्य का प्रमुख अंग है। अच्छी आलोचना किसी रचना के दृश्य एवं अदृश्य पहलुओं को पाठकों के समक्ष रखकर उनकी दृष्टि के विकास में मददगार होती है। आलोचना उस सेतु की तरह तो होती ही है जो रचना एवं पाठक को जोड़ती है, वहीं वह उस बैरियर की तरह भी होती है, जो पाठक को आगाह करती है। इसलिए आलोचक का कार्य बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसीलिए कहते हैं कि आलोचना कर्म से ज्यादा धर्म है लेकिन तब क्या हो जब यह अपने धर्म से च्युत होने लगे? जब सबल , समर्थ रचनाओं के प्रति आलोचक आँखें मूँद ले एवं अपनी सुविधा या वफादारी के अनुसार कार्य करने लगे।  जब कोई सम्पादक कविता की किताब लिखे और उसकी समीक्षा की होड़  लग जाए। ऐसे में इस तरह की आलोचना का प्रतिपक्ष खड़ा होना जरूरी होता है और यह काम करते हैं सुशील कुमार अपनी किताब “आलोचना का विपक्ष में” ।

सुशील कुमार की यह किताब मूल रूप से चार खंडों में विभक्त है  (क) कविता की बदलती प्रवृतियाँ (ख) स्मृति में टीके हुये व्यतित्व (ग) ढहते हुये प्राचीर (घ) वर्तमान कविता का ताप ।

कविता की बदलती प्रवृतियाँ में “शब्द और काव्य भाषा” , “कविता में विचार तत्व”,  “आलोचना का अर्थ” , “कविता बनाम गजल” कुछ ऐसे विषय हैं जो साहित्य का समकाल को समझने के लिए अत्यावश्यक हैं एवं हर उस विद्यार्थी या शोधार्थी को जो वर्तमान साहित्य की प्रवृतियों को गहराई से समझना चाहता है, उसे इन्हें अवश्य पढ़ना चाहिए।

सुशील कुमार का अध्ययन कितना  गहन है और हिन्दी साहित्य की समझ कितनी साफ व सुस्पष्ट है यह उन आलेखों को पढ़ते हुये स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। इनका भाषा लालित्य, शब्द प्रयोग एवं सबसे बढ़कर आलोचकीय पैनी दृष्टि एवं आलोच्य विषय वस्तु की गहरी समझ चकित कर देती है।

हर आदमी कवि नहीं हो सकता, लेकिन यह भी सच है कि हर आदमी कवि होना चाहता है । अगर भाषा, प्रविधि, शिल्प के ज्ञान या बुद्धि बल से कोई कवि बन सकता तो  विद्यालयों, विश्वविद्यालयों के सारे हिन्दी शिक्षक कवि होते पर ऐसा नहीं होता है।  कविता संवेदना के अंतस्तल पर प्रस्फुटित होती है, इसलिए कोशिश करके कविता नहीं हो सकती। अपनी किताब में सुशील कुमार लिखते हैं कि कविता श्रम की विषय वस्तु नहीं बल्कि अनुभव और आत्मप्रेरणा की विषय वस्तु है। जब कवि में अनुभव की कमी होती है तो अपेक्षित अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए किए गए श्रम से कविता में प्रामाणिकता की जगह कलावाद आ जाता है।

अपने आलोचकीय कर्तव्य के प्रति सुशील कुमार की धारणा बहुत स्पष्ट है। आलोचना के उद्देश्य को इंगित करते हुये सुशील कुमार लिखते हैं कि आलोचना का उद्देश्य रचना का प्रत्येक दृष्टि से मूल्यांकन कर पाठक के समक्ष प्रस्तुत करना होता है साथ ही पाठक की रुचि का भी परिष्कार करना इसका धर्म होता है, ताकि उसकी साहित्यिक समझ का विकास हो। वे कहते हैं कि इससे कवि की जड़ता टूटती है, उसे अपने सृजन के दौरान हो रहे चूक का पता चलता है।

आलोचना हमेशा जोखिम भरा काम होता है। आलोचक के लिए आलोचना तलवार की धार पर चलने के समान है। आज के समय में जब कविता वाचाल एवं  उलझावों की शिकार है, कविता की सार्थकता कम हो रही है एवं  यह वैचारिक वाग्जाल में फंसी नज़र आती है। जीवनानुभव से क्षीण कवि  अपनी बुद्धि एवं चातुर्य से कविताई करते नज़र आते हैं। गाली-गलौज, विवाद करने की प्रवृति बढ़ी है, कविता सौंदर्य की जगह घृणित मानसिक विकृति का बयान बन रही है,  ऐसे में एक आलोचक के रूप में सुशील कुमार की भूमिका बहुत बड़ी नज़र आती है और वे आलोचना का जोखिम उठाते हुये नज़र आते ही हैं, खेमेबाज़ आलोचकों की खोज खबर भी लेते नज़र आते हैं।

जब कविता के नाम पर “दूदू पिएगी बूबू / ना/ बिकिट खाएगी/ निन्नी निन्नी करेगी ….” जैसी कवितायें लिखी व सराही जा रही है। जब कविता लिखने को बोगस काम, बेधन्धा का धंधा मान कर ऐसी कविताओं को प्रतिष्ठित किया जा रहा है।  जब कविता को हिन्दी मठाधीश अपनी रखैल बनाने पर आमदा है, जब नकारात्मकता को साहित्य का आवश्यक तत्व समझा जा रहा है तब सुशील कुमार की भूमिका निश्चय ही आवश्यक हो जाती है। सुशील कुमार अपनी आलोचनाओं में यद्यपि कभी -कभी अत्यंत कठोर दिखते है लेकिन बिना तथ्य के हवा हवाई बात करते कहीं नज़र नहीं आते और जो बातें वे कहते हैं उसे बिना कठोर हुये कहा भी नहीं जा सकता है। साहित्य के सत्य को अभिजनवादियों ने इतने तहों में ढाँक दिया है कि बिना कठोर आघात के इसका टूटना और इसका प्रकट होना संभव भी नहीं है।

कुछ कवितायें दुर्बोध, अबूझ, अनसुलझे रहस्यों की तरह अभिजात्यों के लिए लिखी जा रही हैं, जिनके  केंद्र में कहीं भी सामान्य लोक नहीं है,  और अगर कहीं है भी तो सामान्य जन का उनसे जुड़ पाना सामान्य नहीं है।  वैसे में कविता का जन विमुख होना स्वाभाविक ही है। इस परिस्थिति रचनाकार तो सफल होता हुआ दिखता है पर रचना विफल हो जाती है। लेकिन इतना तय है कि ऐसे रचनाकार थोड़े दिनों के लिए  चर्चित हो सकते हैं। पानी के बुलबुले की तरह सतह पर ये चमकीले रूप में दिख सकते हैं पर इनकी साहित्यिक आयु लंबी नहीं हो सकती।

सुशील कुमार मानते हैं एवं वे बार-बार अपने आलेखों में इस बात पर ज़ोर देते हैं कि जनपक्षधरता ही कविताओं का सर्वाधिक लोकप्रिय अभिलक्षण है। एक आलोचक के  कार्य और काव्य में लोकमंगल की चेतना की अवश्यकता को  बेहतर तरीके से उन्होने इस तरह समझाया है कि राम चरित मानस के राम के लोक मंगलकारी रूप की छवि जब रामचंद्र शुक्ल ने आलोचना के माध्यम से जनोन्मुख किया, तभी तुलसी दास संत से साहित्य में महाकवि बन पाये।

स्वातंत्र्योत्तर काल के दो महत्वपूर्ण कवियों मुक्ति बोध और  त्रिलोचन पर इस किताब में अलग से दो महत्वपूर्ण आलेख हैं जो दोनों के काव्य को समझने की एक नई अंतर्दृष्टि देते हैं  एवं किताब के महत्व को और अधिक बढ़ा देते हैं। मुक्ति बोध पर आलेख में सुशील कुमार एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कहते हैं कि मुक्ति बोध की कविताओं का “मैं” स्वयं मुक्ति बोध नहीं हैं एवं ऐसा समझने के कारण पूर्व में कई गलतियाँ की गयी हैं। आज इस दृष्टिकोण से भी मुक्ति बोध को पढे-समझे जाने की अवश्यकता है। मुक्ति बोध और त्रिलोचन को समझने के लिए ये दोनों आलेख बहुत ही सहायक हैं।

किताब का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वो है, जिसमें हिन्दी  साहित्यगगन के नए नक्षत्रों से वे हमारा परिचय कराते हैं। हालांकि जिन कवियों के बारे में किताब में लिखा गया है, वे सभी भी जाने-पहचाने, सुपरिचित व सुपठित कवि वृंद है लेकिन आलोचक सुशील कुमार मानते हैं कि इन कवियों की भूमिका व योगदान को हिन्दी साहित्य में जितना उद्धृत किया जाना चाहिए था उतना नहीं किया गया। इन कवियों में जो महत्वपूर्ण नाम है वे हैं सुधीर सक्सेना, तेजिंदर, योगेंद्र कृष्ण , बुद्धिलाल पाल , राजकिशोर राजन, शहंशाह आलम  आदि ।

अक्सर ऐसा होता है कि दिल्ली या दिल्ली दरबार से दूर रहने वाले साहित्यकार अपनी सतत साधना व महत्वपूर्ण अवदान के बावजूद उपेक्षित रह जाते हैं। ऐसा हमेशा नहीं होता लेकिन बहुधा ऐसा होता आया है।  झारखंड के एक ऐसे ही महत्वपूर्ण कवि शंभू बादल की कविताओं को रेखांकित करते हुये वे यह सफलता पूर्वक स्थापित भी करते हैं कि झारखंड की मिट्टी से जुड़े इस कवि को जो उपयुक्त स्थान हिन्दी साहित्य में मिलना चाहिए था वह नहीं मिला। इसके विपरीत कई कवियों को उनके योगदान से ज्यादा चर्चा व प्रतिष्ठा मिली।

ढहते हुये प्राचीर के तहत कुछ पुराने कवियों की कविता का विश्लेषण आलोचक अपने दृष्टिकोण से करते हैं, जिन्हें भी पढ़ा जाना चाहिए।

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समीक्षित कृति : आलोचना का विपक्ष

लेखक : श्री सुशील कुमार

प्रकाशक : लोकोदय प्रकाशन,

पृष्ठ संख्या 244, मूल्य : 270 /-

 

समीक्षक : नीरज नीर

आशीर्वाद, बुद्ध विहार

PO – अशोक नगर, राँची

झारखंड – 834002

email – neerajcex@gmail.com

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