स्त्री-जीवन और समकालीन यथार्थ को
अभिव्यक्ति देती ग़ज़लें
‌‌                      -कमलेश भट्ट कमल

कवयित्री ममता किरण मूलत: और मन से ग़ज़लकार ही हैं जैसा कि 75 ग़ज़लों के इस सद्य: प्रकाशित आलोच्य ग़ज़ल संग्रह ‘ऑंगन का शजर ‘ की ग़ज़लों को पढ़कर बख़ूबी जाना जा सकता है। यह उनकी ग़ज़लों का पहला ही संग्रह है। इससे पूर्व वर्ष 2012 में उनकी कविताओं का एक संग्रह  ‘वृक्ष था हरा भरा ‘ आ चुका है जो चर्चित भी रहा है। कहना न होगा कि हिन्दी की छन्दमुक्त कविता का कोई रचनाकार जब हिन्दी ग़ज़ल में आता है तो वह अपने साथ वे सारे सरोकार भी ले आता है जो हिन्दी कविता और उसकी परम्परा से जुड़े रहे हैं। लगभग ऐसे ही अन्तरण से गुज़र कर कभी दुष्यन्त कुमार ने हिन्दी ग़ज़ल की राह पकड़ी थी। तब उन्होंने न केवल स्वयं के लिए अभिव्यक्ति का एक धारदार माध्यम खोज  लिया था बल्कि उनके माध्यम से हिन्दी में ग़ज़ल ने भी एक ऐसा मुहावरा पा लिया था जिसे उर्दू ग़ज़ल की परम्परा से अलग ‘हिन्दी ग़ज़ल’ नाम मिला और जिसकी अनुगूॅंज हिन्दी साहित्य के परिदृश्य पर लगातार पाॅंच दशकों से सुनाई दे रही है।
कविता और गीत की तुलना में ग़ज़ल शिल्प के स्तर पर एक विशिष्ट और अलग विधा है। एक ही ग़ज़ल विचारों और अभिव्यक्तियों के कई सारे पुष्पों के गुलदस्ते की तरह होती है।ऐसे में ‘ऑंगन का शजर’ की ग़ज़लों से गुज़रने पर यह पता चलता है कि ममता किरण की ग़ज़लें बहुस्तरीय और बहुआयामी हैं। उनके सरोकारों में यदि स्त्री-जीवन से जुड़े कई आयाम शामिल हैं तो समय और समाज के कड़वे यथार्थ का भी महत्वपूर्ण आयाम दिखाई देता है। इसी प्रकार पर्यावरण और कुछ वैश्विक मुद्दे भी उनकी चिन्ताओं में शामिल मिलते हैं। ईश्वर के प्रति उनके अन्दर एक ख़ास तरह की विनम्रता का भाव है तो जीवन की जटिलताओं को लेकर अद्भुत जिजीविषा और संघर्ष-शक्ति तथा आत्मविश्वास भी उनकी ग़ज़लों से छन-छनकर बाहर आता रहता है। अपने तमाम शेरों में ममता किरण ने कुछ ख़ास कहने की कोशिश की है। यह कोशिश  किसी सन्देश, किसी प्रतिबद्धता,किसी प्रतिकार,किसी प्रतिरोध या जिजीविषा के रूप में सामने आती है।
यदि सरोकारों की बात की जाय तो ममता किरण का मन सबसे ज़्यादा स्त्रियों की दुनिया में रमता दिखाई देता है, जो स्वाभाविक भी है। इन विषयों में  उनकी  अनुभूतियाॅं न केवल गहरी हैं बल्कि  उनकी अभिव्यक्तियाॅं जिस रूप में सामने आई हैं, वे मन को भीतर तक  छूती,भिगोती  और उद्वेलित करती हैं। स्त्री- जीवन की इन अभिव्यक्तियों के कई पक्ष हैं। जैसे वे बेटियों के प्रति ख़ास क़िस्म के अनुराग  और आत्मीयता से से लबरेज दिखाई देती हैं। निम्न शेरों से  इसे अच्छी तरह समझा जा सकता है-
बाग़  जैसे  गूॅंजता है पंछियों से,
घर मेरा वैसे चहकता बेटियों से। (पृष्ठ -15)

जन्मी जो एक प्यारी सी बिटिया हमारे घर,
बेनूर   था   जो  घर  उसे  पुरनूर  कर  गई।

    (पृष्ठ-19)

ऐसी बेटी को जन्म देने के लिए वे बग़ावत के स्तर तक उतरने के लिए भी तैयार दिखाई देती हैं-
बग़ावत है तो है अब जो भी होना है सो हो जाए,
जनम  देना  है  बेटी  को  न मारा जाय है मुझसे!

    (पृष्ठ-88)

बड़ी होती बेटियों के साथ  ग़ज़लकार मज़बूती से खड़ी दिखाई देती हैं और उनके साथ मैत्रीभाव से पेश आते हुए अपने अनुभव से उन्हें  सहेजती और सावधान भी करती चलती हैं-
नए ज़माने की लड़कियों तुम परम्परा का
भी ध्यान रखना,
सॅंभालो तहज़ीब की विरासत जो हाथ से
अब फिसल रही है। (पृष्ठ-25)

बदलेगी रीति आज तलक चल रही है जो,
तुम अपने हक़ के वास्ते बिटिया लड़ा करो!
(पृष्ठ-66)

लेकिन एक दिन यही बेटी जब अपने घर से विदा होकर ससुराल  चली जाती है तो पूरे माहौल को उदासियों से भर जाती है-
वो बेटी जिससे चहकता था घर, चली गई
है वो दूसरे घर,
हमारे घर की हर इक ख़ुशी अब, उदासियों
में बदल रही है। (पृष्ठ-25)

एक माॅं के रूप में किसी स्त्री के साथ उसके बेटे के भी अटूट सम्बन्ध होते हैं। लेकिन जब ये सम्बन्ध बेटों की निष्ठुरता की वजह से कमज़ोर होते हैं तो माॅं के दिल की घुटन तरह- तरह से अभिव्यक्त होती है और हर  अभिव्यक्ति के साथ ही वह बिखरती चली जाती है। कुछ ऐसा ही एहसास हमें ममता किरण के निम्न शेरों से मिलता है-
आख़िरी  लम्हे  में  माॅं बेटे को चाहे देखना,
ऑंख दरवाज़े पे है और साॅंस अटकी जाय है।
(पृष्ठ-41)

मेरा बेटा करता है जब गिला क्या किया है
तुमने मेरे लिए,
उस वक्त लगता है बस यही जैसे ख़ुद ही
अपनी सज़ा हूॅं मैं। (पृष्ठ-79)

बेटे  मैं  तेरी माॅं हूॅं  ज़रा बोल अदब से,
अच्छा नहीं है ये तेरा लहजा मेरे आगे।(पृष्ठ-21)

ये क्या  तुम  पूछती  रहती हो ख़त बेटे का आया है,
यकीं है तुमको अम्मा पत्र वो अब भी लिखेगा क्या?

    (पृष्ठ-81)

घर था बेटे का चुप ही रहना था,
उम्र   ढलती   हुई   बितानी  थी। (पृष्ठ-94)

ये है फ़लसफ़ा नई नस्ल का कि हैं  सर पे
बोझ ये माॅं-पिता,
‌‌    पड़े मस्तियों में ख़लल कोई यही बात
उनको जॅंची नहीं।(पृष्ठ-96)
एक  माॅं का  अपने बच्चों के साथ वात्सल्य का जो रिश्ता होता है,वह बहुत ख़ास होता है। ममता किरण के यहाॅं इस वात्सल्य के भी सुन्दर नमूने उपलब्ध हैं:
अदा से अपनी वो सब को रिझाए,
खिलौना एक  घर  आया  हुआ  है। (पृष्ठ-28)

घर के सब लोग भी चहकने लगे,
नन्हीं  मुस्कान   के  बिखरते  ही।(पृष्ठ 46)‌    वो रख देगी चन्दा को हाथों में उसके,
कि माॅं अपने बच्चे को फुसला रही है।(पृष्ठ-56)
           माता-पिता को लेकर भी ममता किरण का स्त्री-मन ख़ासा संवेदनशील है। वे इस संवेदना को अलग-अलग कोनों से  स्पर्श करते हुए उसे  शेरों में ढाल देती हैं-
यूॅं लगा जब ख़्वाब में देखा पिता को,
हों   सदाऍं   मंदिरों   की  घंटियों  से! (पृष्ठ-15)
दरख़्त पर जिस तरह से कोई पके है फल
बस उसी तरह से,
पिता के अनुभव की हर कहानी इक एक
झुर्री में ढल रही है।(पृष्ठ- ‌25)फिर लगा  हाथ है माॅं का सर पर,
फिर मुझे ‘दीद-ए-तर’ याद आया।
‌   जिसकी छाया में सभी ख़ुश थे ‘किरण’
घर  के  ऑंगन  का  शजर  याद आया। (पृष्ठ -26)
‌   दिल का कठोर था वो मगर बाप भी तो था,
डोली  चढ़ी  जो  बेटी  तो ऑंखें हुईं सजल।
(पृष्ठ-39)कभी तो होता ही होगा पिता को दुख कोई,
न  जाने  कौन  से  जादू  से  थे  छिपा  देते।
(पृष्ठ-47)तेरी सेवा से बढ़कर अब इबादत और क्या होगी,
तेरी गोदी में माॅं मिलती है चारों धाम की  ख़ुश्बू।

      (पृष्ठ- 92)
स्त्री-जीवन की विडम्बनाओं ने भी काफी स्थान पाया है ममता किरण की  ग़ज़लों में। कदाचित ऐसी स्थितियाॅं प्रत्येक स्त्री-जीवन की कड़वी सच्चाई हैं। इन्हें नीचे दिये गये कुछ उदाहरणों से समझने में मदद मिलेगी-
‌‌   ऊॅंची  उड़ान  भरने  की  सौ  हसरतें लिये,
पिंजरे में क्या फॅंसी कि वहीं वो ठहर गई।(पृष्ठ-19)
एक  निर्णय  भी  नहीं हाथ में मेरे बेटी,
कोख मेरी है मगर कैसे बचा लूॅं तुमको ।(पृष्ठ-20)बेटियाॅं  गर  ज़ियादा  पढ़ जाऍं,
उनके अनुकूल वर नहीं मिलता। (पृष्ठ-37)‌‌    लाख चाहा था छुपा लूॅं अपनी पीड़ा को मगर,
वो फफोलों की तरह लेकिन उभरती जाय है।              (पृष्ठ-41)

इक जनम ही ख़ुशी से निभा ले,
सात  जन्मों   की  बातें  करे  है।(पृष्ठ 49)

‌   टि्वटर व्हाटसैप को तो अपना रही है,
हक़ीक़त के  रिश्तों को बिसरा रही है।(पृष्ठ-56)

ज़रा-सा हॅंस के कभी बोल क्या दिया उससे,
कि शक के घेरे  में रख  दी वफ़ा मेरी  तुमने।
(पृष्ठ-65)

कोख में कत्ल किया क्या थी ख़ता माॅं मेरी,
मुझसे  पूछे  मेरी  बेटी  तो  बताए  न  बने।
‌‌   चाहती है कि वो उड़   जाए गगन को छू ले,
बेड़ियाॅं   पाॅंवों   में  ऐसी  कि  हटाए  न बने।
(पृष्ठ-73)

‌ एक  स्त्री को ऐसी विडम्बनाऍं प्राय: ही झेलनी पड़ती हैं। बावजूद इसके वह परिवार के लिए सदैव क़ुर्बान होने के लिए भी तैयार रहती है,जिसमें स्त्री-जीवन का सौन्दर्य- बोध और प्रेमभाव कहीं दब-सा जाता है,छुप जाता है। कदाचित यही कारण है कि ममता किरण की ग़ज़लों में ऐसे भाव थोड़ा कम  दिखाई देते हैं-
घर में आया चाॅंद उसका जानकर वो,
छुपके  देखे  चूड़ियों  की  झिर्रियों से।(पृष्ठ-15)

‌  मेरी दुनिया में है कुछ इस तरह से उसका आना भी,
घटा सावन की या ख़ुश्बू का झोंका  जैसे आता है।      (पृष्ठ-16)

‌‌    अजब मेरी ख़्वाहिश मैं क्या चाहती हूॅं,
मैं   तुझमें   ही   होना  फ़ना  चाहती हूॅं।
हटे  मेरे   मन  से  ये  कोहरे  की  चादर,
मैं    बरसात    में    भीगना   चाहती हूॅं।(पृष्ठ-51)

‌‌    गली के मोड़ पर देखा था पहली बार जब तुमको,
बसी है आज भी मन में मेरे उस शाम की ख़ुश्बू।          (पृष्ठ-93)

तमाम सारे झंझावातों के बीच से गुज़रते हुए एक स्त्री-मन कैसे अपने आप को धैर्य बॅंधाये रखकर गहरे जीवट का परिचय देता है,इसके लिए ममता किरण के कुछ शेर अवश्य देखे जान चाहिए-
है  दूर  तलक  यूॅं  तो  ॲंधेरा  मेरे आगे,
है मुझको यकीं होगा उजाला मेरे आगे।
(पृष्ठ-21)

‌‌  मंज़िलों को चूमने की ठान ली क़दमों ने जब,
राह की  दुश्वारियों  का सर उठाना कब  हुआ?

      (पृष्ठ-36)

मेरा उड़ना ही  था नहीं मुमकिन,
‌हौसलों का जो पर नहीं मिलता। (पृष्ठ-37)

ये  रख  अहसास  है तन्हा नहीं तू
कि  तेरे  साथ   कोई  चल रहा है।(पृष्ठ-41)

राह में  काॅंटों  का पहरा अच्छा लगता है मुझे,
और फिर उनसे निपटना अच्छा लगता है मुझे।

      (पृष्ठ-53)

भले दुश्मन हमें आघात देंगे,
भरोसा है उन्हें हम मात देंगे।(पृष्ठ-55)

‌ ‌‌    सारी दुनिया चाहे जो कहती रहे,
मैं  जिसे  पूजूॅं  वही  भगवान है।(पृष्ठ-17)

‌‌     इक  शजर  ख़ुद्दार  टकराने को था तब,
थी  चुनौती  सामने  जब   ऑंधियों  की।
(पृष्ठ-15)

ममता किरण की ग़ज़लों से उनके अन्दर मौजूद संघर्ष की जद्दोजहद और आत्म विश्वास जिस तरह फूट कर बाहर आता है, वह न केवल कवयित्री के प्रति आश्वस्ति का भाव पैदा करता है बल्कि उससे पाठक व श्रोता  भी अपने आप को ऊर्जा से भरा हुआ महसूस करेंगे-

‌‌   यूॅं  न  ख़ामोश  बैठेंगे  हम,
तुम  जो ढाते रहोगे सितम।(पृष्ठ-61)

ज़िन्दगी  में  वो  रस्ता  नहीं चाहिए,
जिसमें डर के हो जीना,नहीं चाहिए।
ज़िन्दगी का सफ़र ख़ुद से पूरा करूॅं,
मुझको   कोई  सहारा  नहीं  चाहिए।
(पृष्ठ-67)

‌   तेज़ हवाऍं  जब  भी  आऍं  जलते दीप बुझाने को,
उनकी साज़िश बेपर्दा कर हर कोशिश बेकार करूॅं।     (पृष्ठ-69)

ठान  ली  है जवाब अब  दूॅंगी,
चुप कहाॅं तक रहूॅं शराफ़त में।(पृष्ठ-74)

‌‌  ‌भले कुछ भी कहते रहो मुझे ये पता मुझे है
कि क्या हूॅं मैं,
मेरे बाजुओं में है दम बहुत नहीं कम किसी
से ज़रा हूॅं मैं। (पृष्ठ-79)

‌   उधर हैं फूल  सुविधा के इधर काॅंटे उसूलों के,
मगर रस्ता उसूलों का न छोड़ा जाय है मुझसे।

     (पृष्ठ-88)
‌‌
ममता किरण का संवेदनशील स्त्री-मन  घर-गृहस्थी और परिवार व रिश्ते जीते हुए भी समय और समाज के कड़वे व नंगे यथार्थ को जिस सजगता से देखता-पकड़ता और अभिव्यक्त करता है,वह उनके ग़ज़लकार और कवि के सामाजिक सरोकारों को स्पष्ट करता है। इसलिए भी कि यह स्वर उनकी ग़ज़लों में भरपूर मात्रा में मौजूद दिखाई देता है। कुछ शेरों का उदाहरण अप्रासंगिक न होगा-
हालात  ज्यों  के  त्यों  ही  रहे  मेरे गाॅंव के,
काग़ज़ पे ही विकास की दिल्ली ख़बर गई।
भूमंडलीकरण   ने   बनाए   बहुत   अमीर,
लेकिन ग़रीब लोगों  की दुनिया बिखर गई।
पूरी तरह से खिल भी न पाई थी जो कली,
हाथों में वहशियों के कुचलकर वो मर गई।
(पृष्ठ-18)जैसे  भारत  का  शहीदों  ने था सपना देखा,
ये जो भारत है ये उस ख़्वाब की ताबीर नहीं।
एक  रोटी  को  चुराने   की  मुकर्रर  है सज़ा,
मुल्क  जो  लूट  ले उसकी कोई ताज़ीर नहीं।
(पृष्ठ-27)ईंट-पत्थर के इन जंगलों में किरण,
‌  मेरे हिस्से था जो आसमां खो गया। (पृष्ठ-29)

टिक नहीं पाएगा कोई सच यहाॅं,
झूठ  ने  जारी  किया फ़रमान है।(पृष्ठ-17)

ममता किरण के यहाॅं तमाम सारे सुख- दुख और यथार्थ के साथ पर्यावरण की संवेदनशील चिन्ताऍं भी मौजूद हैं, जो आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है। संतोष की बात है कि  हिन्दी ग़ज़ल में इस तरह की चिन्ताऍं कई   दूसरे ग़ज़लकारों में भी देखने को मिल रही हैं। लेकिन यहाॅं ममता किरण के ही शेर प्रासंगिक हैं-
‌ कच्चा  मकां  तो  ऊॅंची  इमारत  में ढल गया,
ऑंगन में वो जो रहती थी चिड़िया किधर गई।
(पृष्ठ-18)

‌   देखता  है  परिन्दा  कटे  पेड़  हैं,
ढूॅंढता है कहाॅं आशियां खो गया।(पृष्ठ-29)

‌चांद  तारे     नदी   पेड़   पौधे,
ख़ूब कुदरत के भी का़फ़िये हैं।(पृष्ठ-49)

‌   आने वाली नस्ल इसको देख पाए,
लोग  कुछ धरती बचाने में लगे हैं।(पृष्ठ-58)

पर्यावरण के साथ-साथ ममता किरण की  संवेदना में दुनिया की दूसरी भी कई चिन्ताऍं शामिल हैं। ऐसे शेर संग्रह की ग़ज़लों में  एक निश्चित ऊॅंचाई पर खड़े दिखाई देते हैं-
सदियाॅं लगी हैं पहुॅंचे हैं जो इस विकास तक,
बारूद  से  न   खेल‌  कि  दुनिया  तबाह  हो।
(पृष्ठ-22)

दिन-ब-दिन बढ़ते ही जाते हैं जहाॅं में रावण,
राम  के  हाथ  में  लगता  है  कोई तीर नहीं।
(पृष्ठ-27)

ये चमकता हुआ जाल बाज़ार का,
इस चकाचौंध में नौजवां खो गया।(पृष्ठ-29)

ये माहौल हिंसा व नफ़रत का हर सू,
ख़ुदा  जाने दुनिया किधर जा रही है।(पृष्ठ-56)

अपनी ग़ज़लों में ममता किरण गाॅंव से शहर आए आदमी की मुश्किलें भी देख पाती हैं। तब वे कुछ इस तरह के शेर कहती हुई दिखाई देती हैं-
‌   बहुत से ख़्वाब लेकर शह्र में आया था वो इक दिन,
मगर   दो  वक्त  की  रोटी ‌ बमुश्किल ही जुटाता है।     (पृष्ठ-16)

गाॅंव  की  अमराइयों  का भूल जाना कब हुआ,
भागते  इस शहर में  इक आबोदाना कब हुआ।           (पृष्ठ-36)

वे कितनी ही बार अपने अतीत में लौटती हैं और पुरानी यादों का एक पिटारा-सा खोल कर बैठ जाती  हैं। तब उनके शेर कुछ इस अंदाज़ में उनका खुलासा करते हैं-
‌‌   फोन  वो ख़ुशबू कहाॅं से ला सकेगा,
वो जो आती थी तुम्हारी चिट्ठियों से। (पृष्ठ-15)

अपने बचपन का सफ़र याद आया,
मुझको परियों  का नगर याद आया।(पृष्ठ-26)

रफ़्ता-रफ़्ता   ज़िन्दगी  का  कारवां  बढ़ता  गया,
पर सफ़र बचपन का था जो वो पुराना कब हुआ।

      (पृष्ठ-36)

‌‌    अबकी गाॅंव गई तो मैंने,
जी भर के आंगन देखा है।(पृष्ठ-41)

ममता किरण की ग़ज़लों से एक और स्वर फूटता हुआ कई बार दिखाई दे जाता है और वह है ईश्वरीय सत्ता के प्रति विनम्रता के भाव का। वे ईश्वर  के अस्तित्व को चुनौती नहीं देती हैं बल्कि उसे  सहर्ष स्वीकार करती हैं  और उसकी उपस्थिति को सृष्टि में  सर्वत्र अनुभव भी करती चलती हैं। यहाॅं वे उन बौद्धिकों से  अलग दिखाई देती हैं जो स्वयं सहित दूसरी कई दुनियावी सत्ताओं  को तो स्वीकार करते हैं, लेकिन ईश्वर की विराट सत्ता को लेकर एक  कृत्रिम अस्वीकार उनके अंदर बना रहता है। कुछ शेर ममता किरण की इस आस्था के भी देखे ही जाने चाहिए-
‌कोई ऑंसू बहाता है कोई खुशियाॅं मनाता है,
ये सारा खेल उसका है वही सबको नचाता है।
(पृष्ठ -16)

‌ सजदे में उसी सूर्य के झुकता है मेरा सर,
रखता है  जो  हर रोज़ उजाला मेरे आगे।(पृष्ठ-21)

‌‌   जब कोई आस ही बाकी न बची,
तब मुझे तेरा ही दर याद आया।(पृष्ठ-26)

टिकी जिसके दम पे है सृष्टि ये उसे है नहीं

     अभिमान कुछ,
कभी अपने मुॅंह से कहे नहीं कि हर एक
कण में बसा हूॅं मैं। (पृष्ठ-79)
‌      इस प्रकार हम देख पाते हैं कि ममता किरण की ग़जलों में तमाम विशेषताऍं मौजूद हैं। उनके साथ सिर्फ समस्या एक ही है कि वे हिन्दी-उर्दू के द्वैत में उलझी हुई नज़र आती हैं। यह उलझाव इस तरह से है कि वे शेरों में एक ही जगह एक ही शब्द को दो तरह से लिख देती हैं( उदाहरण स्वरूप ‘मेरा’ और ‘मिरा’), एक उर्दू वालों के लिए और दूसरा हिन्दी वालों के लिए! यदि उन्हें हिन्दी का ग़ज़ल- कार बने रहना है जो कि वह हैं भी तो उन्हें इस द्वैत से बाहर आना होगा।
ममता किरण की कई ग़ज़लें उर्दू के तरही मुशायरों से निकली हैं  पर वहां भी उन्होंने सार्थक हस्तक्षेप कर अपने गहन सरोकारों के चलते अपनी ज़मीन तैयार की है।चाहे मुशायरे का मंच हो या कवि सम््मे्मेलन  का दोोनों जगह उनकी उपस्थितिि है।
अपने पहले ही ग़ज़ल संग्रह में ममता  किरण ने अभिव्यक्ति और सौंदर्यबोध के कई स्तरों को स्पर्श कर लिया है,जो अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। उनकी साफ़-सुथरी कहन मन को छूती भी है और बाॅंधती भी है। जो कुछ भी उन्हें कहना है,उसे सीधा और साफ़ कह देना है। लाग-लपेट, घुमाव और राजनीति उनकी कहन का हिस्सा नहीं है। हाॅं उनका ध्यान तग़ज़्ज़ुल पर भी बना ही रहता है। उनके यहाॅं ग़ज़ल में यह साफ़गोई एक मूल्य की तरह है, जिसे वे बख़ूबी जीती हैं। स्त्री-जीवन के अनुभव और मर्म को  उन्होंने ख़ासा जीते हुए ही अभिव्यक्त किया है , जो मन को भिगो जाता है । यह भिगो देना  और भिगो ले जाना  उनकी ताकत है,जिसे उन्हें सहेजने और सॅंभाले रखने की आवश्यकता है।
*
‘ऑंगन का शजर’ (ग़ज़ल संग्रह)
ग़ज़लकार- ममता किरण
पृष्ठ-96,डिमाई साइज़
संस्करण-2020
मूल्य-₹200
किताब घर प्रकाशन,4855/24, अंसारी रोड,
दरिया गंज,नई दिल्ली-110002
‌*
1512, कारनेशन-2,
गौड़ सौन्दर्यम् अपार्टमेंट,
ग्रेटर नोएडा वेस्ट,
गौतमबुद्ध नगर,उ.प्र.201318.
*मो. 9968296694
*ईमेल.kamlesh59@gmail.com

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