नई समीक्षा : ईदगाह (मुंशी प्रेमचंद) – मधुकर वनमाली

सत्यम‌ शिवम‌ सुंदरम

ईदगाह, हिन्दुस्तान की कहानी है।वह हिन्दुस्तान जिसकी तहजीब आज खो गई है।वही तहजीब जो बड़ों को इज्जत और छोटों को प्यार देने को ,इबादत मानता था।ग़रीबी जहां खुशियों के आड़े न आ सकती थी। मुंशी प्रेमचंद के उस हिन्दुस्तान में, दो भारत नही बसते थे।

आज हिन्दुस्तान में मजहब के आधार पर त्योहार बँट गए हैं। लोगों की सोच में परिवर्तन आ चुका है।पर अगर हम ईदगाह कहानी को किसी दशहरे के मेले के साथ बदल कर देखें,तो लगेगा तब के हिन्दू- मुस्लिम समाज में कोई विशेष अंतर न था। प्रेमचंद हिन्दुस्तानी तहजीब को जिस प्रकार उकेर जाते हैं,वह अन्यत्र दुर्लभ है।

कहानी की नजर में पांच साल का छोटा बच्चा हामिद है। बच्चों के लिए त्योहार एक नेमत की तरह होता है।वो‌ सालों भर इसका इंतजार करते हैं। अमीरी – गरीबी का द्वन्द्ध यहां भी है,पर तब का संतोषी समाज भूखे पेट रह कर भी त्योहार मना सकता था। सब बरकतें तो दिल के अंदर हीं होती हैं। छोटा बच्चा हामिद ईदगाह में यही बता गया है।

हामिद पांच साल का होते हुए भी,जहीन सोच रखता है। तमाम प्रलोभन की चीजें छोड़ वह अपनी दादी के लिए चिमटा खरीदता है, ताकि रोटी पकाते वक्त उस के हाथ ‌न‌ जलें। वहीं वो‌ दुकानदार भी दयालु ‌निकला, जिसने आधे‌ दाम पर उसे चिमटा दे दिया। प्रेमचंद उस समय गांधीजी के प्रभाव में थे। आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद उन का प्रेरणा स्त्रोत था।कई पात्रों में विलक्षण चरित्रोत्कर्ष ‌देखने को मिला। एक सहृदय समाज की परिकल्पना की गई । प्रेमचंद की इस प्रकार की रचनाएं प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के पूर्व की हैं।

अब आते हैं “ईदगाह” कहानी के सत्य पर। कहानी में सत्य को हू-ब-हू उकेरा गया है।यथार्थ के साथ कहीं कोई समझौता नही है। महामारी की भेंट चढ़े गरीब परिवारों का सत्य आज भी प्रासंगिक है। समाज में किस प्रकार की आर्थिक विषमता है, इसे बखूबी दिखाया गया है।अभागिन अमीना अपने पोते हामिद को ईद की नेमतें फराहम न करा पाने के कारण रोती है।इस का बड़ा हीं मार्मिक वर्णन है।शहर की चमक धमक, गांव की सादगी सब दिखे हैं। खिलौने एवं मिठाईयों के लिए ललचाता हामिद क्रूर यथार्थ का सजीव चित्र है।हामिद अपने हीं दोस्तों की बिरादरी से पृथक है।उपर से उन दोस्तों का क्रूर विनोद। कल्पना कीजिए ऐसे बाल मन पर क्या बीती होगी।इस प्रकार कहानी तत्कालीन सत्य को उभारने में सफल रही है।

“ईदगाह” का सत्य‌ शिवम हेतु है,लोककल्याणकारी।इस का सत्य विवेक देने वाला है, उकसाने वाला नही।इस में नग्नता नही है। खुद हामिद को भी यह इल्म नही है कि उस के अब्बू पैसा कमाने नही गए हैं, उन का इंतकाल हो चुका है।यह क्रूर सत्य उस बालक के लिए कल्याणकारी नही हो सकता था, तभी अमीना ने उसे नहीं बताया।उस की अम्मीजान भी अल्ला मियां के घर उस के लिए अच्छी-अच्छी चीजें लाने गई है। जरा सोचिए अगर ये सत्य हामिद के सामने रुखाई से ज्यों का त्यों रख दिए जाते,तो क्या कभी हम हामिद के उस सौम्य और जहीन चरित्र से मिल पाते? हामिद अभावों में प्रसन्न, आशावादी और आस्थावान है। यह आस्था बड़ी चीज है।कोरे यथार्थ से मनुष्यता के प्रति आस्था को मिटाने का बर्बर प्रयास प्रेमचंद ने नही किया है।

ईदगाह में बड़े छोटे का भेद ‌नही है।यह इस्लाम की बुनियादी अच्छाई है।भातृत्व‌ की भावना सामूहिक उत्सवों में खूब दिखती है। पर कहानी का अंत शिवम की विराट चेष्टा से ओत-प्रोत है। हामिद द्वारा चिमटा खरीदना कहानी में शिवम का उत्कर्ष है।एक छोटा बच्चा , मिठाईयों एवं खिलौनों को दरकिनार कर, अपनी दादी के हाथों को जलने से बचाने के लिए चिमटा खरीदता है। कितनी बड़ी सीख,कितने हल्के ढंग से दी गई है।समाज के निचले तबके को सादगी एवं मितव्ययिता की सीख ,जो इस नन्हे बच्चे ने दी है वो बड़े कालजयी पात्रों से भी दुर्लभ है।इस प्रकार ईदगाह हिन्दी कहानी का प्रतिमान बन गया, और शिवम की दृष्टि से उसे कहानी के क्षेत्र में वही स्थान मिला है, जो महाकाव्य में “श्रीरामचरितमानस” को।

कहानी केवल आदर्श या यथार्थ से नही चल सकती। किस्सागोई एक कला है।इसे सुंदरम भी होना चाहिए। पाठकों के लिए रोचकता जरुरी तत्व है। ईदगाह में भी इन तत्त्वों के समुचित समावेश से कहानी कसी हुई प्रतीत होती है।ईद की सुबह का मनोहारी वर्णन शुरू में ही सुधी पाठकों को बांधता है।मेले जा रहे बच्चों में शहरी जीवन के प्रति कोतूहल का सुंदर चित्रण है। बच्चों की कल्पना में जिन्न का वर्णन परीकथाओं सरीखा है।बालमन की जिन्न संबंधी भ्रांतियों से बरबस हीं चेहरे पर मुस्कान आ जाती है,क्यों कि कभी न कभी ये भ्रांतियां हम सब ने पाली है। आजकल के भी बच्चे जिन्नों के बारे में कुछ ऐसा हीं सोचते हैं। पुलिसिया भ्रष्टाचार और चोरों से मिले होने की बात में व्यंग का पुट है। खिलौनों पर चली हामिद और अन्य बच्चों की बहस में शिष्ट हास्य है, जो विवेकशील बनाने के साथ-साथ थोड़ा गुदगुदाने का काम भी करते हैं। आखिर में चिमटा सिकंदर की तरह विश्वविजयी होता है।हामिद का रुस्तमे हिंद पाठकों के मनोरंजन में कोई कसर नही छोड़ता।खाने को केले तो दिलवाए हीं,उपर से बूढ़ी दादी का प्यार-दुलार और आशीष।

कहानी के शब्द सरल एवं सहज देशी भाषा के हैं, जिन्हें निरक्षर भी सुनकर आनंदित हो सकतें हैं।यह इस कहानी की विशेषता है।लेखक ने अपना पांडित्य पाठकों पर न थोपा है। यह लेखन की महानता का पैमाना है। मुंशी प्रेमचंद इसी लिए महान हैं।ग्राम्य जीवन का सुंदर चित्र है,जो कहीं से भी किसी समुदाय विशेष का नही लगता। पात्रों के नाम और त्योहार के नाम परिवर्तन कर देने से किसी भी समुदाय से कहानी सहज संबंधित हो जाएगी। कोई रुढता नही है। इस प्रकार हम पाते हैं कि कथन –

” सत्य को कहना हीं है।पर सत्य शिवम के लिए होना चाहिए। और उसे एक रुचिकर ढंग से कहा जा सकता है, जो सुंदरम है।”

मुंशी प्रेमचंद की कालजयी कहानी “ईदगाह” पे पूर्णतः सटीक है।

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परिचय : लेखक मुजफ्फरपुर में सहायक विद्युत अभियंता हैं

 

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