सामाजिक दायित्व के बोध की ग़ज़लें :: चुप्पियों के बीच

  • मुकेश कुमार सिन्हा

वो विज्ञान की विद्यार्थी रहीं हैं। रसायन शास्त्र पसंदीदा विषय है। फिर भी साहित्य में गहरी पैठ है। वो गज़ल कहती हैं, वो कविता रचती हैं। आलेख और समीक्षा में भी उनकी गहरी अभिरुचि है। जी हाँ, डॉ भावना एक ऐसी ही कलमकार हैं, जो रसायन शास्त्र की प्राध्यापिका हैं, फिर भी हिन्दी के प्रति समर्पण है। डॉ. भावना की ‘रसायनी’ का हिन्दी साहित्य से मेल-जोल वाकई काबिल-ए-तारीफ है।
अक्स कोई तुम सा (2012) और शब्दां की कीमत (2015) के बाद डॉ. भावना की गज़ल की एक किताब हालिया दिनों में प्रकाशित हुई है-‘चुप्पियों के बीच।’ वैसे कवयित्री की दो अन्य कविताओं की किताब पहले से प्रकाषित है। एक है-‘सपनों को मरने मत देना’ और दूसरी अपनी लोकभाषा बज्जिका में-‘हम्मर लेहू तोहर देह।’ मतलब, काव्य में डॉ. भावना की दमदार उपस्थिति है।
पति डॉ. अनिल कुमार एवं बिटिया आद्या को समर्पित नव प्रकाशित गज़ल संग्रह ‘चुप्पियों के बीच’ में 79 गज़ल समावेषित हैं। इन गज़लों में जीवन की सच्चाई है, सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार है, माँ की ममता है, राजनीति पर तंज है, सामाजिक दायित्व का बोध है। अनुभव की चाषनी में डुबोकर लिखी गयी गज़लें सीधे दिल को छू रहीं हैं। आखिर गज़ल दिल को छुए क्यों नहीं, अजी गज़ल के ‘कहन’ का तरीका बेहद सरल और सुंदर जो है।
कितनी अजीब बात है। गज़लगो का शौक नहीं है गज़ल लिखना-कहना, वो तो अंदर की संवेदना, अंदर का उबाल उफान मारता है और शब्द फूट पड़ते हैं। ‘अपनी बात’ में डॉ. भावना लिखती हैं-‘‘गज़ल लिखना मेरे लिए कभी शौक नहीं रहा। जब कोई बात अंदर तक कुरेदती है, तो बेचैनी अशआर में ढलकर खुद-ब-खुद कागज़ पर अपनी जगह अख्तियार कर लेती है।’’
हम लाख नारी सशक्तीकरण की बात कर लें, उन्हें आरक्षण दे दें, लेकिन क्या वास्तविक में नारी सशक्त हुईं। क्या वह आज भी निर्णय ले पाती हैं? क्या आज भी वो अपनी बात रख पाती हैं? शायद नहीं? क्योंकि अधिकार मिल जाने के बाद भी ‘वो’ आश्रित हैं! महिला जनप्रतिनिधि उदाहरण है। कोई पुरुष जीतता है, तो उसकी पत्नी ‘मुखिया पत्नी’ नहीं कहलाती, ‘विधायक पत्नी’ नहीं होती। लेकिन, महिला के जीतने पर उसका पति बड़े गर्व से मुखिया पति, विधायक पति कहलाता है। गज़लगो की पीड़ा-
मुखिया का पद जीता पत्नी ने जब से
मुखिया पति ही राज चलाता फिरता है

औरत की विवषता कुछ इस प्रकार हैः-
कभी हँसती, कभी रोती, कभी चुप्पी लगाती है
ये औरत रोज़ छल-बल की लड़ाई हार जाती है

डॉ. भावना स्त्री हैं। जानती हैं स्त्री का मर्म। एक स्त्री का पीहर के साथ क्या रिष्ता होता है, यह स्त्री ही जानती है। पीहर का जर्रा-जर्रा उसे इतना भाता है कि वह उसकी बखान करते नहीं थकती। लेकिन, एक समय ऐसा आता है कि उसे छोड़ना पड़ता है अपना प्यारा पीहर का घर। ऐसी बात नहीं है कि केवल घर छूटने पर स्त्रियाँ रोती हैं। घर भी रोता है बेहिसाब, बस उसे षिद्दत के साथ महसूस करने की जरूरत है-
खिड़की, आँगन, गलियाँ रोयीं
पीहर से जब रिष्ता छूटा

घर में भी नारी की उपेक्षा पर गज़लकार की नज़र है। आखिर क्यों बेटियाँ आँखों की तारा होती हैं और बहू नकचढ़ी, गुस्सैल और घर फोड़नी? महिलाएँ ‘महिलाओं’ से ही पीड़ित क्यों हैं? गज़गो का ‘अपनों’ से सवालः-
हमेषा घर की बहुओं में हजारों दोष होते हैं
हमेषा अपनी बेटी ही, हमें शालीन लगती हैं।

एक माँ है, जो करुणामयी होती हैं, ममतामयी होती हैं। दुष्मनों के वार पर ढाल बनकर खड़ी हो जाती हैं। माँ तलवार बनकर मुस्तैद रहती हैं। लेकिन, थोड़ा सा पंख क्या निकले, हम माँ को ही भला-बुरा कहने लगते हैं। क्या कभी इंसान ने यह सोचा कि माँ ने कितना त्याग किया, कितना लहू पी। गज़लगो ने माँ के त्याग को चंद शब्दों में परिभाषित करने की कोशिश कीः-
पल में सो जाता है आँचल में बिलखता बच्चा
माँ को क्या खूब सुलाने का हुनर आता है।

माँ का दर्द क्या है, भला एक माँ से बेहतर कौन जान सकता है? पुरानी पंक्ति है पुत्र ‘कुपुत्र’ हो सकता है, लेकिन माता ‘कुमाता’ नहीं हो सकती। आज भौतिकतावादी प्रवृति ने माँ के अरमान को घोंट डाला है। बचपन में बच्चों को प्यार से खिलाने वाली माँ आज उपेक्षित हैं। गज़लगो ने लिखा-
बेटे कैसी मिसाल देते हैं
माँ को घर से निकाल देते हैं
आगे-
बच्चे पंछी बन के उड़े
घर में परिजन हैं बेबस
आगे-
चार चूल्हे थे मगर अम्मी रही भूखी
घर के भीतर घर को कैसे ढो रहे थे हम

ये किस्मत भी, अजीब है न? एक माँ की तीन संतान और तीनों की किस्मत अलग-अलग? कोई कैसे भाग्य पर विश्वास न करे? आखिर इसी दुनिया में किसी के पास चार मंजिला मकान है, तो कोई मड़ई में रहने को मजबूर। किसी को ‘वो’ भी मयस्सर नहीं। कोई पानी से मरता है और कोई पानी-पानी रटते-रटते। विषमताओं को गज़लगो ने अपनी आवाज़ दीः-
कुछ की किस्मत में सिर्फ है सत्तू
कुछ की किस्मत में घी-सनी रोटी

हम बच्चों की बचपना को छिनने पर आमादा हैं। हम बच्चों को वक्त कहाँ दे पा रहे हैं। माँ अब लोरियाँ कहाँ सुनाती? बच्चा जरा सा रोया क्या, माँ बच्चों को मोबाइल थमाकर निश्चिंत हो जाती हैं। आया के भरोसे बच्चों की जिंदगी छोड़कर माँ अपनी उड़ान भर रहीं हैं। हम बच्चों को स्वतंत्र रहने कहाँ देते? उस पर अपना ख्वाब पूरी करने की जवाबदेही दे देते हैं।
नन्हें हाथ-थमा बस्ता
खुश हैं परिजन सपने लाद

आज बच्चे मैदान में खेलने नहीं जाते, तितलियों के पीछे नहीं भागते, पतंग की डोर नहीं थामते। उछल-कूद, रस्सी फाँद, क्रिकेट, फुटबॉल, कबड्डी आदि खेलों से बच्चों को कोई वास्ता नहीं रह गया है। बचपन गुम है! अब बचपना रहा कहाँ? बस्ते की बोझ और आधुनिक उपकरणों ने ‘बचपना’ छिन लिया है। घर-आँगन की स्थिति पर गज़लगो ने लिखा-
ये टीवी और मोबाइल की दुनिया
बनी है आज हर आँगन की आदत

आज दुनिया बहुत सयानी हो गयी है। किन आँखों में पानी है और किन आँखों में आँसू, पता लगाना मुष्किल है। जालिम दुनिया में हर कोई बाज बना हुआ है, जो कबूतर की जान लेने की फिराक में जुटा रहता है। कलमकार का क्या है? वह तो रास्तों से काँटें हटाने की मुहिम में जुटा रहता है। वह चाहता है कोई चोटिल न हो, पथरीली राहों में यह जानते हुए भी कि
मैंने तो बस फूल दिये उसको हरदम
हाथ में उसके कोई खंज़र हो, तो हो।

अब देखिए न, चेहरे के बीच इतने चेहरे होते हैं कि पता ही नहीं चलता कि कौन चेहरा हमदर्द है और कौन जख्म देने वाला। इंसान हर दिन छला जा रहा है, लेकिन जब जख्म गहरा होता है, तो इंसान की समझ बढ़ जाती है। आखिर ठोकरों के बाद ही तो इंसान संभल पाता है। युवा गज़लगो को भी दुनिया की समझ है, तभी तो उन्होंने कहा-
उन्हें कदमों की गहरी चोट ने इतनी परख दे दी
मुखौटों के शहर में वह सही चेहरा समझता है

सामाजिक बुराइयों पर भी गजलकारा ने व्यंग्य किया है। सभी जानते हैं कि घूस लेना अपराध है, सामाजिक बुराई है यह। फिर भी, घूस लेने और देने की आदत छूट नहीं रही है। अखबारों में खबरें आती हैं, लेकिन हम चेतते कहाँ हैं? यह समस्या अंगद के पाँव की तरह जमी बैठी है। ऐसे में, गजलकार लिखती हैं-
अफसरषाही, सत्ताधारी सब डूबे
घूस बनी है ऐसी दलदल क्या बोलूँ।

गज़लकार का मानना है कि देष-दुनिया और समाज को नापाक आँखों की नजर लग गयी है। भाई-भाई का प्यार खत्म हो गया। अपनों के बीच की मिठास ‘गायब’ हो गयी। आँगन अब काटने दौड़ता है। बेटियों को भी घर की दीवारों से डर लगने लगा है। अजीब हालत हो गयी है। गज़लगो की आवाजः-
बहुत ही सुन्दर थी इनकी गलियाँ, बहुत ही खुषदिल थे लोग इसके
हुआ है क्या ऐसा इस शहर में हवा गली की डरी हुई है।
आगे-
हमारी हरकतों पर इस सदी का हाल है ऐसा
कभी आँसू बहाती है कभी वह तमतमाती है

गज़लगो ने न केवल सामाजिक आवरण पर तंज कसा, बल्कि वो नसीहत भी देती हैं। उनकी नसीहत के भी क्या कहने? उनके ‘कहन’ का लहजा इतना प्यारा है कि हर कोई उनकी नसीहत को मान ले।
हर घड़ी अपनी चादर रहे ध्यान में
पाँवों को इस कदर मोड़ना चाहिए।

किसान को हम अन्नदाता कहते हैं। यदि किसान अन्न नहीं उपजाये, तो सृष्टि की परिकल्पना ही बेमानी होगी। हाड़-तोड़ मेहनत कर किसान अन्न उपजाते हैं, तमाम परेशानियों और झंझावतों को झेलते हुए। बदले में किसान पाता क्या है? बेकारी, गरीबी, उलाहना से उसे जूझना पड़ता है। गज़लगो कहती हैं-
उसी को कह रहे हैं अन्नदाता
उसी को ही सताये जा रहे हैं।

आगे-
फसल उग पायेगी कितनी ये उसको भी नहीं मालूम
वो पगला रेत को गेहूँ की खातिर जोतने बैठा।

स्त्री केवल घर नहीं सजाती, बल्कि दुनिया भी सजाती है। वो ‘किचेन क्विन’ कहलाती हैं, तो उसे नेचर से भी वास्ता है। आज तुलसी चौरा की बुनियाद मजबूत है, तो माँ-दादी, भाभी-पत्नी की ही अहम् भूमिका है। लेकिन, प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने के शुरू खेल ने गड़बड़ कर दिया है। भौतिकतावादी इंसान अपनी जरूरतों के लिए जल, जमीन और जंगल का दोहन शुरू कर दिया, भयावह स्थिति सामने है। गज़लगो का कहन-
काटे गये हैं पेड़ यूँ इतने कि आजकल
जंगल के सारे जीव भी बस्ती में आ गए।

साहित्य समाज का आईना है। साहित्यकार एक माध्यम हैं, जो सच को आम लोगों के सामने परोसते हैं। यह डॉ. भावना की हिम्मत है कि वो जनता के बीच गज़ल के माध्यम से सचबयानी करती हैं। कलम पर पहरा लगा है, कौन कहता है? जब आप निडर हैं, तो कोई कुछ भी क्या बिगाड़ लेगा? डॉ. भावना की साहसपूर्ण पंक्तिः-
पतली जीभ की मोटी चमड़ी, हद है यार
चोर-सिपाही हैं अब समधी, हद है यार
आगे-
जंगल से महलों की दूरी खत्म हुई
जोगी-भोगी की है चलती, हद है यार

एक बात है-गज़ल में अब केवल प्रेमी-प्रेमिका की गुफ्तगू ही नहीं है, बल्कि इसमें है-समाज का दर्द, समाज का सच। गज़ल में मुकम्मल तौर पर क्रांति लाने की ताकत है, गज़ल में समाज को सोचने पर विवष करने का जज्बा है। प्रेमी-प्रेमिका की गुफ्तगू से हटकर भी गज़ल बहुत कुछ कहना चाहती है, बहुत कुछ सुनाना चाहती है। डॉ. भावना की गज़ले पढ़ी जा सकतीं हैं, सराही जा सकतीं हैं। निष्चित, पाठकों की अदालत में डॉ. भावना के भाव अपनी पैठ जमाने में कामयाब होंगी। चुप्पियों के बीच उनकी गज़लें चीखेंगी! उनकी गज़ल चीखती रहे? उनकी कलम चुप्पियों के बीच अपनी खनक छोड़ती रहे, यही मंगलकामना है!
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कृति : चुप्पियों के बीच (गज़ल संग्रह)
कृतिकार : डॉ. भावना
प्रकाषक : किताबगंज प्रकाशन
गंगापुर सिटी-322201
जिलाः सवाई माधोपुर (राजस्थान)
पृष्ठः 96 मूल्यः 195 रुपये
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समीक्षक : मुकेश कुमार सिन्हा
द्वारा सिन्हा शशि भवन
कोयली पोखर, गया-823001
चलितवार्ता- 9304632536

 

 

 

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