हस्तीमल हस्ती की ग़ज़लें प्रगतिशील जीवन मूल्यों का दर्पण : अनिरुद्ध सिन्हा

हस्तीमल हस्ती की ग़ज़लें प्रगतिशील जीवन मूल्यों का दर्पण : अनिरुद्ध सिन्हा

सामान्य धारणा है कि हस्तीमल हस्ती ग़ज़ल-विधा पर विचार करनेवाले ग़ज़लकार हैं। इनकी ग़ज़लें सृजन और समय की सूक्ष्म,जटिल अंतःक्रियाओं के साथ चलती हैं। ग़ज़ल के आंतरिक सौंदर्य और उसकी मासूमियत से समझौता नहीं करते तथा भावों के संप्रेषण के लिए छंद की छूट नहीं लेते।इनके पास ग़ज़ल के वास्तविक स्वरूप के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। ग़ज़ल में प्रयुक्त होनेवाले शब्दों के प्रति भी सावधान रहते हैं। शब्दों का वास्तविक सामर्थ्य ग़ज़लों में स्पष्ट रूप से उजागर होता है। सादगी का निर्वाह बोलचाल की भाषा में है। भाव सबलता के प्रकटीकरण में भाषा पर असाधारण अधिकार का दर्शन होता है। भावों के अनुकूल शब्द चयन से विषय सही ढंग से प्रतिपादित होता है। भाषा के इस चयनात्मक स्वरूप के कारण ग़ज़लें उल्लेखनीय हो जाती हैं। ग़ज़लों को तत्सम शब्दों से बचाते हैं तो विदेशज शब्दों का भी इस्तेमाल नहीं करते। शुद्ध रूप से तद्भव का इस्तेमाल करते हैं। ग़ज़ल-संस्कृति विशेषतः उसके मर्म-कलात्मक सृजन की संरच ना मनुष्य की संरचना से साम्य रखती है इसलिए एक अर्थ में ग़ज़ल-चिंतन की संरचना के अध्ययन को व्यक्तित्व के संरचनागत प्रचालों के क्षेत्र में बहिर्वेशित किया जा सकता है। यह मानना तर्क संगत है कि व्यक्तित्व का निर्माण और मानव चिंतन की संरचना व्यापक अर्थ में एक प्रकार से जीवन के विकास का दर्पण है। हस्तीमल हस्ती अपनी ग़ज़लों में इन तत्वों को संयोजित करते हुए मनुष्य के व्यक्तित्व के निरंतर समृद्ध बनते जाने की प्रक्रिया को द्योतित करते हैं चिंतन के विकास विभिन्न चरणों में जीवन की समस्या के प्रति भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रकट होते हैं।
पिछले दिनों इनका एक नया ग़ज़ल-संग्रह “प्यार का पहला खत”वाणी प्रकाशन से छपकर पाठकों के समक्ष आया है। संग्रह में एक सौ ग़ज़लें हैं। संग्रह की तमाम ग़ज़लें हिन्दी ग़ज़ल की शक्ति और संवेदना को नए सिरे से आलोकित ही नहीं करतीं,बल्कि हिन्दी की अविरल ग़ज़ल-धारा को आगे बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाती हैं। संग्रह में प्रेम की परिपक्वता के साथ जीवन-बोध की भी ग़ज़लें हैं जो संग्रह को पूर्णता प्रदान करती हैं——
सच के हक़ में खड़ा हुआ जाए
जुर्म भी है तो ये किया जाए

बात करने से बात बनती है
कुछ कहा जाए कुछ सुना जाए
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ऐसा मौसम आया अबके बड़े दिनों के बाद
सहरा-सहरा बादल बरसे बड़े दिनों के बाद
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ख़ुशबुओं से चमन भरा जाए
काम फूलों सा कुछ किया जाए
हस्तीमल हस्ती हिन्दी ग़ज़ल का अनुशासन और नए कथ्य का सौंदर्य तो रचते हैं साथ ही पूरे आधुनिक युग में प्रगतिशील परंपरा के ग़ज़ल साहित्य का सौंदर्य शास्त्र भी उपस्थित करते हैं।
सामाजिक सरोकारों के प्रति सचेत करते हुए वर्णित प्रथम मतला और शेर अपने समय के प्रगतिशील जीवन-मूल्यों के प्रकाशन से संबन्धित हैं। जनसमूह की बूर्जुआ चेतना और उसके द्वारा आज के समय को न समझ पाने का हवाला देते हुए जो विकल्प सुझाते हैं वह व्यक्तिगत समस्याओं के निजी हलों के लिए बातचीत के माध्यम से आगे बढ़ाने पर बल देते हुए विरोध और प्रतिकार के लिए शब्दों की भूमिका तैयार करने के लिए पाठकों को प्रेरित करते हैं। व्यापक हित में जीवित और प्रासंगिक बने रहने के लिए झूठ और सच को समझना होगा। सच की खातिर झूठ का विरोध होना चाहिए। मुखर होना अगर जुर्म है तो यह जुर्म करना चाहिए। चुप्पी की अवधारणा ने ही हमारे यहाँ अनेक प्रकार के संकटों को जन्म दिया है। हम तर्क के स्तर पर ही विसंगतियों को मात दे सकते हैं। तर्क के सहारे ही अराजक तत्व संघर्ष का निशाना बनेंगे,जो शोषण और वर्चस्व से रिश्ते बनाए रखना चाहते हैं।
हम जानते हैं हिन्दी ग़ज़ल के विकास के चार –पाँच दशकों में कथ्य-व्यवहार की प्रवृतियों में जिस प्रवृति का प्राधान्य रहा है वह है सामाजिक समन्वय और संश्लेषण। कह सकते हैं आज की हिन्दी ग़ज़ल मानव चिंतन की अखंडता का,वास्तविकता का विश्लेषणपरक बोध कराने में समर्थ तो है लेकिन इसका यह आरंभिक रूप है। दूसरे शब्दों में यह संश्लेषण कलात्मक सृजन के विभिन्न रूपों के परस्पर संवर्धन के आधार पर विकसित कला-चिंतन का एक उच्चतर चरण है।
हस्तीमल हस्ती अपनी ग़ज़लों में शब्द और अर्थ का समन्वय,अर्थों की परस्पर संगति,संतुलन,सापेक्षता,शब्द और चयन में ओज,माधुर्य आदि अनुभूतियों को जगाने वाली ध्वनि तथा गति में संगति और लय सौंदर्य को जन्म देते हैं। यही कारण है कि बड़े-बड़े ग़ज़ल गायकों ने इनकी ग़ज़लों को अपना स्वर दिया है—-
प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है
नये परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है
गाँठ अगर लग जाए तो फिर रिश्ते हों या डोरी
लाख करें कोशिश खुलने में वक़्त तो लगता है
इस प्रकार हस्तीमल हस्ती अपनी छंद-शक्ति के सहारे अपनी ग़ज़लों में प्रेम और जीवन का काफी सर्जनात्मक प्रयोग करते हैं।राग-बोध या रूमानियत का संबंध मूलतः शृंगारिकता या प्रेम से नहीं,आवेग से है। इनकी इस ज़िंदादिली के भीतर कहीं न कहीं प्रेम की वह बौद्धिक संवेदना भी है जो रिश्तों की ज़रूरत को पूरा करती है।
लिपि से हटकर बात करें तो संग्रह की तमाम ग़ज़लों का संबंध हिन्दी साहित्यिकी से ही नहीं अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य-विचार के लिए भी सामान्य रूप से प्रासंगिक और सार्थक हैं।

समीक्षित कृति
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प्यार का पहला ख़त (ग़ज़ल-संग्रह)
ग़ज़लकार-हस्तीमल हस्ती
प्रकाशक-वाणी प्रकाशन
4695,21-ए,दरियागंज। नयी दिल्ली-110002
मूल्य-295/-
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गुलज़ार पोखर,मुंगेर(बिहार)811201 mobile-7488542351
Email-anirudhsinhamunger@gmail.com

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