गांव और प्रकृति की संवेदनशील कवयित्री गरिमा सक्सेना

– मुकेश कुमार सिन्हा

आलोचकों की हमेशा शिकायत रहती है कि नई पीढ़ी साहित्य का बँटाधार कर रही है। नई पीढ़ी जो रचती है, उसमें न भाव है, न शिल्प, न सौंदर्य है और न शुद्धता। वैसे आलोचकों के लिए नई पीढ़ी की हस्ताक्षर गरिमा सक्सेना को उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत किया जा सकता है।
गरिमा जितनी मुस्तैदी के साथ चित्र बनाकर अपनी सामाजिक भूमिका निभा रही है, ठीक उसी तरह से साहित्य का सृजन भी कर रहीं हैं। बीटेक की पढ़ाई पूरी करने वाली गरिमा हिन्दी साहित्य में भी इतनी पारंगत है कि वो छंद को साध चुकी हैं। गीत, नवगीत, गजल और दोहे के माध्यम से अपनी जवाबदेही निभाने वाली गरिमा की दोहा संग्रह की एक पुस्तक पूर्व में प्रकाशित है-‘दिखते नहीं निशान’। इसी साल नवगीतों का संग्रह प्रकाशित हुआ है-‘है छिपा सूरज कहाँ पर’।
गीत-नवगीत का अपना इतिहास रहा है। यह काव्य का प्रचलित रूप है। गीत-नवगीत वही रच सकता है, जिसमें शिल्प, लय, गेयता और भाव की समझ हो। गरिमा जिस उम्र में है, उस हिसाब से उसकी काव्य साधना पूर्ण है! बकौल गरिमा, ‘गीत हृदय में उपजे किसी भी प्रकार के भावों की सरल, सहज, लयात्मक अभिव्यक्ति है, गीत वही है, जो किसी एक हृदय से उपजकर हर हृदय का स्वर स्वतः बन जाये।’
गरिमा में संवेदना है। वैसे संवेदनहीन पुरुष या महिला के बूते सृजन कर्म है ही नहीं। आप जितने संवेदनशील होंगे, आपकी लेखनी उतनी ही पुष्ट होगी। संवेदनशील व्यक्ति के लेखन को विस्तृत फलक हैं, बस दृष्टि चाहिए! गरिमा ने लिखा-‘सम्वेदना जिस ओर जगी है, उसी तरह के गीत स्वतः प्रस्फुटित हुए। मैंने कथ्य के पक्ष को सौंदर्य पक्ष से अधिक महत्वपूर्ण माना है।’ अतिप्रयोगों से दूर हटकर गरिमा की लेखनी से उपजे 53 नवगीतों का संग्रह है-‘है छिपा सूरज कहाँ पर’।
गरिमा गाँव की बात करती हैं, गरिमा प्रकृति की बात करती है, गरिमा समाज और देश की बात करती है। मतलब, जहाँ कहीं भी गरिमा को लगा कि कुछ कहना चाहिए, गरिमा बेबाक कहती हैं। गरिमा के कहन का जो लहजा है, वो गृह्य है।
आज वक्त बहुत तेजी से बदल रहा है। लेकिन, बदलाव की गति बता रही है कि आने वाला वक्त और कष्टकारी है। पहलेे लोगांे में देश-समाज की चिंता होती थी, लेकिन ‘हम’ से सफर ‘मैं’ तक सिमट गया। आज चिंता बस अपने पेट की, अपने घर की, अपने परिवार की। गरिमा लिखती हैं-

पर कहाँ नजरों में सम्यक भाव जागा
एक चिंता सिर्फ अपने घाव से।

वो प्रश्न भी पूछना जानती है, उसने लोगों से पूछा-
तो सुरक्षित हो सकेगा देश अपना
स्वयं पर ही हो रहे पथराव से।

गाँव अब पहले जैसा गाँव नहीं रहा। गाँव में शहर की हवा प्रवेश कर गयी है। शहरी संस्कृति ने गाँव को अपने कब्जे में ले लिया। गीतकारा शहर में रहती हैं, लेकिन फिर भी गाँव को गाँव बनाने की वकालत करती हैं। वैसा गाँव, जहाँ सामाजिक सद्भाव कायम हो! जहाँ गली-गली प्रेम के गीत सुनाये, आँगन खिलखिलाये! चौपाल की चमक बरकरार रहे। किंतु, गाँव में अपसंस्कृति ने गरिमा को अंदर तक हिला कर रख दिया। जिस गाँव में रिश्तों की अहमियत थी। पाहुन पूरे गाँव का पाहुन हो जाता, वहाँ प्रेम की परिभाषा धूल फाँक रहीं हैं। ऐसे में, गीतकारा की कलम बोलती है-
गाँवों के भी मन-मन अब
उग आये हैं शूल
देख चकित हो रहा बबूल।

आगे-
कई पीढ़ियाँ जहाँ साथ में
पलतीं, बढ़तीं थीं
बूढ़े बरगद की छाया में
सपने गढ़तीं थीं
वहीं पिता से बेटा कर्जा
करने लगा वसूल।

गाँव ‘गाँव’ ही रहे, गरिमा की चाहत है। लेकिन गाँव तो शहर हो गया। अब तो पता ही नहीं चलता गाँव है कहाँ? अगली पीढ़ी कहानियों में पढ़ेगी-एक था गाँव? कवि लिखते रहे हैं कि शहर, तू ठहर! मत बढ़ मेरे गाँव की ओर। लेकिन, शहरी सोच ने गाँव को शहर बना दिया है। खेत, चौपाल, तुलसी चौरा, आँगन बिलख रहा है आज।

गाँव की पहचान थी जो
कट गया पीपल
गाँव का अब मन नहीं
बालक सदृश निश्छल
अब नहीं पगडंडियों की
धूल जमती पाँव में
जी रहा है इक शहर
जैसे हमारे गाँव में।

आगे-
छप्पर नहीं बचे हैं और न
गौरैयों का ठौर-ठिकाना
धीरे-धीरे जाल बिछाकर
शहर बुन रहा ताना-बाना।

आगे-
तुलसी का चौरा सूना है
यादों पर मकड़ी के जाले
खुशियों का चूना झड़ता है
दरकीं नेहमयी दीवालें।

समाज में शांति-सदभाव की कल्पना करने वालों की कोई कमी नहीं है। लेकिन, मन के अंदर केवल नफरत घुली हुई है। मुसीबत में कोई खिड़की खोलता कहाँ? प्रतिशोध की आग से समाज गिरफ्त में है। ऐसे में सद्भाव-शांति की खातिर आखिर लडे़ कौन? यक्ष प्रश्न है-

सिसक रहीं मन की इच्छाएँ
सपने सभी जले
हम बागों के फूल जिन्हंे खुद
माली ही मसले
नरगिद्धों के
सम्मुख हम सब
बस माँसल टुकड़े

आगे-
बाँट रही
मन के आँगन को
आँगन की संवादहीनता।

गरिमा प्रकृति प्रेमी है। उसे लगाव है प्रकृति से। जल का सबसे बड़ा साधन ‘नदी’ को ‘नाले’ में परिणत होते देख उसकी चिंता जायज है। नदी सदियों तक जन-जीवन की शक्ति रही है। तटों को सींचा है। लोगों की प्यास बुझायी है। लेकिन आज? हमने नदी के अस्तित्व पर संकट के पत्थर डाल दिये हैं। नदी का अतिक्रमण इस कदर जारी है कि नदी अपने वर्तमान पर रो रही है। ऐसे में नदी की पीड़ा को गरिमा ने अपनी कलम दी-

रेत हो रहीं नदियाँ
खोया कल-कल का उल्लास
पोखर-नाले भी करते हैं
अब उसका परिहास।

समाज से गरिमा को उम्मीद है। उसका आह्वान है कि स्वयं पर हावी होते डर को तोड़ा जाये। वो जानती हैं जुगनु की ताकत, इसलिए वो कहती हैं जुगनु ‘जुगनु’ ही है, उसे सूर्य समझकर आखिर कब तक खुद को छलते रहेंगे। सामाजिक विषमता पर वो आर-पार की लड़ाई लड़ना चाहती है। उसका शंखनाद-

नीर का ठहराव जैसे
नीर को करता प्रदूषित
चुप्पियों से हो रहे हैं
ठीक वैसे स्वप्न शोषित
चीखते हैं
आइए संयम भुलाकर।

नवगीत में अंग्रेजी का प्रयोग कर गरिमा ने एक नायाब प्रयोग करने की कोशिश की है। ऐसा इसलिए भी कि शायद ‘हिंग्लिश’ का जमाना हो और वर्तमान पीढ़ी ऐसी ही बोली पसंद करती है। खैर, यह हकीकत है कि आज बाजारवाद में सच छिपा पड़ा है। दीवारों में दरारें हैं, लेकिन उसे विज्ञापनों से इस कदर पाट दिया गया है कि आम लोग वास्तविकता से परिचित हो ही नहीं पायेंगे। देखते नहीं आभासी दुनिया में कैसे अपने चेहरे को प्रोफाइल पिक्चर में छिपाया जाता है?

बाजारों में जब भी बेचा
केवल झूठ बिका
सच विज्ञापन के पीछे ही
हर पल रहा छिपा
चटक-मटक कवरों के नीचे
बिकी पुरानी चीज।

गीतकारा को शिकायत है दिल्ली से। ऐसा इसलिए भी कि दिल्ली खुद अपनी पीठ थपथपाना चाहती है, जबकि हकीकत कुछ और है। क्या भारत आज समस्याओं से मुक्त हो गया? रोटी के लिए लड़ाई नहीं होती? क्या हाथ रोजगार की तलाश में इधर-उधर नहीं पसरता? क्या माँ अपने बेटे को नहीं बहलाती कि बेटा पतीली चढ़ी है, भात सींझ रहा है? गरिमा आशावादी गीतकारा हैं। निश्चित, हम यदि ठान लें, तो क्या नहीं कर सकते हैं। गरिमा का एक बार फिर समाज से आह्वान-

हमें हमारी चिंता खुद ही
करनी होगी
कब तक मन का क्रोध रहेगा
सुविधा भोगी
बिना ताप के कब कोई पर्वत
पिघला है।
हवा आज आई है
लालकिले से होकर
बोल रही है नवविकास का
द्वार खुला है।

गरिमा ने आम जन को उलाहना भी दी और कहा-

कंचन मृग के पीछे दौड़ो
करो खूब जयकार
घड़ियाली आँसू में आकर
बनते रहो शिकार।

संबंधों का क्षरण बहुत तेजी से हुआ है। निश्चित, भारतीय संस्कृति पर पश्चिमी सभ्यता के बादल से ऐसा दिन देखने को मिल रहा है। हम मंगल तक पहुँच गये, लेकिन बाजू में हरिया-दुखनी के घर में झाँकने की फुर्सत नहीं है। ‘हम’ शब्द लुप्त हो गया। अब सब ‘मैं’ में सिमट गया। घर का आंँगन बँट गया। दीवारें बँट गयीं? फुर्सत किसे अब स्वयं से ऊपर उठने की। घर में बरगद की बेबसी पर गीतकारा लिखती हैं-

बूढ़ी आँखें अपनी हालत
किसे दिखायें, किसे बतायें
व्यस्त सभी बच्चे अपने में
कथा-कहानी किसे सुनाये।
आगे-
धन की कमी कहीं अच्छी थी
मन को मिले अभावों में
क्षरित हुये सम्बन्ध नेह के
जीवन के बदलावों से।

गरिमा भाग्यवादी नहीं है। उन्हें अपने हाथों पर भरोसा है। लेकिन, कई बार ऐसा होता है कि हम लाख मेहनत कर ले, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगती। लगता है कि भाग्य कहीं सो रहा है। तब मन बोझिल हो जाता है, पलकें भींग जाती हैं। युवा मन को टटोलती है गरिमा की यह पंक्ति-

असफलता के जाले ऐसे
रोज हटाऊँ, फिर बिछ जाते
माथा रगड़ा पत्थर पर भी
देव नहीं पर सम्मुख आते
कोशिश के पुल बहे बाढ़ में
काम न आया कोई टोना।

वो युवा मन से अपने मन की बात कहती है। कहती है कर्म करते रहना है बस। जीत तो होगी ही।

बिना  परिश्रम बिना कर्म के
किसे सुफल जग में मिल पाया
बिना उठाये भोज्य थाल का
कहाँ स्वयं है मुख तक आया।

आगे-
कौन लड़ा है किसकी खातिर
खुद ही लड़ना है
हमको मरुस्थल के सीने पर
जल-सा बहना है।

‘बाबूजी’ के बहाने नवगीतकारा ने सरकारी विभागों में कायम घूसखोरी और भ्रष्टाचार पर प्रहार किया है। सरकारी विभागों का हाल भले फिलहाल दुरुस्त हो गया हो, लेकिन कोई दावे के साथ नहीं कह सकता कि विभाग भ्रष्टाचार मुक्त हो गया है? कागज पर भले हो गया हो, लेकिन जमीं पर! फाइलें अटकायी जाती हैं। लाभार्थी को दुत्कारा जाता है।

नख से शिख तक है भ्रष्ट तंत्र
रो-रो कर कहते बाबू जी।

सीमा पार से चल रही गोलियों से छलनी होते भारतीय सैनिक के सपनों से गरिमा द्रवित हैं। सियासत समझौता चाहती है, लेकिन गीतकारा की लालसा कुछ और है। खून का खौलना लाजिमी भी है। आखिर कब तक हमारे सैनिक के शव तिरंगें से लिपटते रहेंगे? कब तक हम शांति की दुहाई देते रहेंगे? कब तक केवल हम शोक गीत गाते रहेंगे? सच में देश के प्रति वफादारों को परेशानियाँ झेलनी पड़ती हैं। उन परेशानियांे को रेखांकित करती गरिमा की पंक्ति-

रिश्ते-नातों से बढ़कर जो
राष्ट्र प्रेम को सदा मानता
रहे सुरक्षित देश हमेशा
सदा रहा है रार ठानता
उसके ही परिवार जनों की
सदा डूबती आयी नैया।

आदमी स्वप्न देखता है। लेकिन, जब स्वप्न टूटता है, तो उसकी सारी उम्मीदें टूट जाती हैं। किसान आसमान की ओर टकटकी लगाये रहता है, लेकिन जब भगवान इन्द्र छलते हैं, तो किसान दिल थाम कर बैठ जाता है। एकाएक किसान के सामने कई दृश्य घूमने लगते हैं। मसलन, टूटी मड़ई, रसोई में खाली बर्तन और महँगाई सी बढ़ती बेटी। थका-हारा इंसान मरना नहीं चाहता, लेकिन परिस्थिति उसे मौत के मुँह में धकेल देती है। बड़ी मर्मस्पर्शी पंक्ति है-

पिछली बार मरा था रामू
हल्कू भी झूला फंदे पर
क्या करता इक तो भूखा था
दूजा कर्ज भी था ऊपर
घायल कंधे, मन हैं व्याकुल
स्वप्न पराजित समय क्र्रद्ध है

आगे-
सुख की चिड़िया
जाने किस नगरी में ठहरी है।

गरिमा भावुक गीतकारा हैं। उसे पसंद नहीं कि कोई जूठन छोड़ दे थाली में। वो जानती है कि किसान अन्न बड़ी मेहनत से उगाता है। लोग भी समझते हैं, लेकिन ‘समझते’ कहाँ? इतना समझदार इंसान हो जाये, तो कहना क्या? किसान अन्न नहीं बोता, बल्कि एक उम्मीद बोता है, ताकि उसकी जीवन की डगमगाती नैया को स्थिरता मिले! किसान की बेबसी पर गरिमा की कलम-

पर भूखा परिवार
उसी का है मरता
जो कि अन्न धरती पर बोता।

सोचता हूँ कि माँ का कितना त्याग है। माँ हमेशा बच्चो पर स्नेह बरसाती है। डाँटती भी है, फटकारती भी है, लेकिन स्नेह छिपा रहता है इसके भीतर भी। वह ताउम्र अपने बेटे से प्यार करती है, लेकिन बदले में उसे मिलता क्या है? जवान होती आँखें माँ को तरेरती हैं। तोतली जुबान जवानी की जोश में आकर चिल्लाती है। माँ फिर भी बेटे को आशीष देती है।

अंगुल-अंगुल सींचा जिसने
दूध पिलाकर
उसे कहाँ माँ कहते हैं बेटे
अब आकर
कंपते हाथांे भोज्य पकाती
बर्तन मंजती।

इंसान ने लाख तरक्की कर ली हो, लेकिन पाँवों पर भी कुल्हाड़ी मारी है। विज्ञान वरदान है, लेकिन अभिशाप भी कम नहीं। प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हो रहा है। हम खिलवाड़ के अंतिम चरण पर पहुँच गये हैं। परिणाम सामने है! फिर भी सुधार नहीं। बरसात के मौसम में कड़ाके की गरमी पड़ती है और जाड़े में मूसलाधार बारिश! यह है क्या, लेकिन हम कहाँ चेत पायें?

कोयल की थी तान जहाँ पर
गौरैयों का वास
पशु-खग नर सब की खातिर ही
था समुचित आवास
वहीं नीड़ को टॉवर, चीमनी
नित हैं रहे उजाड़।

गरिमा केवल समस्या पर कविता नहीं गढ़तीं। बल्कि उपाय भी बताती हैं। वैसे साहित्यकारों का तो काम ही है समाज को नई दिशा देना। गीतकारा भी अपनी जवाबदेही निभा रहीं हैं। वो कहती हैं अँधियारे पर कलम चलाकर नया सूरज उगाया जाये। उम्मीदों के पँखों को विस्तृत आकाश थमायी जाये। हाय-तौबा और डर की दीवारों को तोड़ डाली जाये। बँटे हुए आँगन में प्रीत बोने का शंखनाद करने वाली गरिमा की पंक्ति-

बाजारों की धड़कन में हम
फिर से गाँव भरें
पूँजीवादी जड़ें काटकर
फिर समभाव भरें
हरे-भरे जीवन के पŸो
हुये जा रहे पीत
आओ हम सब मिलकर गायें
समाधान के गीत।

गरिमा की बेबसी नवगीत में झलकती है। समाज में गिरते मानवीय मूल्यों से परेशान होना लाजिमी भी है। घनघोर अँधेरा हो, तो चलना मुश्किल हो जाता है। नदी के विपरीत में बहना भी बहुत कठिन हो जाता है। जब समाज में सामाजिक सदभाव का लोप हो गया हो, सच का कहना मुश्किल हो गया हो, तो ऐसे में सूर्य को गढ़ना मुश्किल है।

झूठ है सम्राट
सच कहना कठिन है।
आगे-
बहकावे हावी हैं
जख्मी है हूक
सच की रणभेरी है
वर्षों से मूक।

आकाश में सूर्य है, लेकिन मंडराते बादल ने उसे छिपा रखा है। उसकी रोशनी धरा पर नहीं पहुँच पा रही है। फलतः धरा में अँधेरा है। रोशनी की तलाश में इंसान भटक रहा है। फल्गु की तरह सूरज भी बेबस है! धरा पर उजाला आये, इसके लिए नवगीतकारा को भी सूरज की तलाश है। वह जानती है कि अँधेरा मिटाने के लिए जुगनु की रोशनी काफी नहीं है, सूर्य की आवश्यकता है। सूर्य की ताकत मालूम है, इसलिए नवगीतकारा व्याकुल मन से पूछती है-‘है छिपा सूरज कहाँ पर’। गरमी की व्याकुलता, संसद में हंगामा, नया वर्ष, पावस की बेबसी सहित 53 नवगीतों से सुसज्जित नवगीत संग्रह ‘है छिपा सूरज कहाँ पर’ का मुद्रण साफ-सुथरा है। आवरण प्रभावकारी है। गरिमा से साहित्यिक उपवन को उम्मीद है!

………………………………………………………………………….

कृतिकार : गरिमा सक्सेना

है सूरज छिपा कहाँ पर (नवगीत संग्रह)
प्रकाशकः बेस्ट बुक बड्डीज टेक्नोलॉजिस प्रा. लि.
एफ-34/एस, ओखला इंडस्ट्रीयल एरिया, फेज-2,
नई दिल्ली-110020
पृष्ठः 136 मूल्यः 200/-
समीक्षकः मुकेश कुमार सिन्हा
मो. 9304632536

 

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *