ग़ज़ल के वजूद का दस्तावेजः चुप्पियों के बीच

  • डॉ पंकज कर्ण 

डॉ भावना संवेदनशील और विवेक संपन्न ग़ज़लकार हैं। अपनी रचनात्मक मान्यताओं और सिद्धांतों पर वे पूरी मजबूती के साथ अडिग रहती हैं। उनकी ग़ज़लें जीवन के अनुभवों, संबंधों, प्रकृति एवं दुनिया को खास नज़र से देखने के अनूठे अनुभवों से बनी है। सद्य प्रकाशित ‘चुप्पियों के बीच’ डॉ भावना का तीसरा ग़ज़ल -संग्रह है जो किताबगंज प्रकाशन से आया है जिसमें 79 ग़ज़लें समाहित हैं। हर ग़ज़ल अपने वातावरण से उठाई गई है। उनके पास उनके अनुभव का यथार्थ है जो भले ही हमें पूरी तरह झकझोरने में सक्षम न हो, परंतु एक कसक तो अवश्य पैदा करता है और यही कसक पाठकों को भी अपने गिरेबां में झांकने को मजबूर करता है। संग्रह में डाॅ भावना की साधना की स्पष्ट छाप झलकती है ।जब वो कहती हैं-
अपनी पलकों पर उम्र भर रखना
कोई कुछ भी कहे मगर रखना। (पृ.95)

ग़ज़ल के अन्य शेर में वो वैसे लोगों का हौसला बढ़ाते दिखती हैं जिन्होंने सामाजिक सरोकारों के लिए समर्पित होकर अपना बहुत कुछ वार दिया हैं। शेर है:-

लोग तेरी मिसाल देंगे ही
दीन -दुखियों की कुछ ख़बर रखना (पृ.95)

इसी ग़ज़ल के एक दूसरे शेर में असफलताओं से हताश हो रहे युवा पीढ़ी को प्रेरणा और संबल देते हुए कहती हैं:-
बात आए तो चाक पर ढलकर
अपने हाथों में वो हुनर रखना (पृ.95)

समय अबाध गति से बढ़ रहा है ।सामाजिक चिंताएं बढ़ रही हैं ।स्त्री सबल होते हुए भी इस सत्य को स्वीकार करने से कतरा रही है। परिवार बिखर रहा है, संबंध टूट रहे हैं। मानवीय मूल्य ताक पर हैं ।ऐसे में डॉ भावना का यह संग्रह ‘चुप्पियों के बीच’ भी ऐसा हल निकालता है कि शिक्षा, सुविधा से संपन्न एवं नये समाज को गढ़ने वाली स्त्री अब असहाय नहीं है। अपने अधिकार की खातिर किसी भी बला का सामना वो सख्ती से कर सकती है ।ग़ज़ल के शेर देखें –
कोमल जुबान जो थी वो सख़्ती पर आ गई
जुल्मों सितम की आँच जो लड़की पर आ गई (पृ.18)

जब डॉ भावना भारतीय नारी की स्मिता और संस्कृति को प्रतीकात्मक लहज़े में उतारती हैं तब ग़ज़ल का यह शेर बरबस पाठकों को अपनी ओर खींचता है:-
सूरज ने हर जगह पे यूं हैं रंग भर दिए
पर्दा-नशीन आँख भी खिड़की पर आ गई। (पृ.18)

‘चुप्पियों के बीच’ की ग़ज़लों को पढ़कर ऐसा महसूस होता है कि डाॅ भावना ने इस संग्रह में मानवीय जीवन की विकट एवं कोमल परिस्थितियों का सजीव चित्रण किया है ।उन्होंने आम जन -जीवन के विभिन्न पक्षों को ग़ज़लों में पिरो कर बदलते सामाजिक परिवेश का अद्भुत चित्रण किया है ।गांव से शहर की ओर पलायन करते लोग , परिवारिक जिम्मेवारी को दरकिनार करना,बूढ़े बाप की विवशता एवं रिश्तों का टूटना अनायास मन को आहत कर जाता है।डाॅ भावना ने इसे इस प्रकार व्यक्त किया है कि-
मुझे टुकड़ों में जब भी बाँटता है
नहीं बतलाता मेरी क्या खता है (पृ 22)

ग़ज़ल के इस शेर ने बदलते समय में गांव और शहर के दरम्यान आये वैचारिक फासलों का बख़ूबी बयान किया है:-
है रौनक़ शहर की तो खूब यारो
मगर गलियों का मौसम काँपता है  (पृ.22)

परंपरा, विरासत, एवं परिवार सें दरकिनार हो रहे आज के पिताओं का दुःख इससे अधिक क्या हो सकता है कि:-
न जाने कितने ग़म आते हैं बाहर
पिता जब खाट पर से खाँसता है (पृ.22)

वर्तमान हिंदी ग़ज़ल लेखन को सभी ग़ज़लकार अपने अनुभव से विस्तार दे रहे हैं।डाॅ भावना ने भी यही किया है। इनकी ग़ज़लों के शिल्प और सौंदर्य की व्यापक विविधता है जो अंतर (मन) की गहरी बेचैनी को स्पष्ट अभिव्यक्ति देता है। तभी, तो वे कहती हैं-
मुश्किलों का पड़ाव बाकी है
जिंदगी में घुमाव बाकी है (पृ23)

सक्रिय एवं गतिशील जीवन रचनात्मकता को ऊर्जा प्रदान करता है। एक रचनाकार की लेखन की सक्रियता ही उन्हें गतिशील एवं प्रभावी बनाती है ऐसे में ग़ज़लकारा ने खुद को जिस बुलंदी के साथ स्थापित किया है वह उनके इस आत्मकथात्मक शेर में परिलक्षित होता है :-
बूझ न पाएगा हौसला मेरा
मेरे भीतर अलाव बाकी है (पृ.23)

व्यवस्था पर चोट करना रचनाकारों की आदत में शुमार होता है भला डाॅ भावना इससे अछूता क्यों रहती ? वे बड़ी बेबाकी से कहती हैं :-
अफसरशाही ,सत्ताधारी सब डूबे
घूस बनी है ऐसी दलदल क्या बोलूं (पृ.44)

प्रकृति के लिहाज से 21 वीं सदी का यह दशक बेचैन करता है। इस विपरीत समय में हवा, पानी,मिट्टी ,धूप, पेड़- पौधे जैसी चीजें संरक्षण का बाट जोह रहे हैं ।दुर्लभ हो रहे इस अमूल्य तत्वों को बचाने के प्रयास में हर कोई जुटा है। इनके अभाव में जीवन के अस्तित्व की कल्पना बेमानी है। डॉ भावना ने भी अपनी चिंता को यूँ व्यक्त किया है:-
नदियां सूखी, पर्वत समतल क्या बोलूं
मैं हूं या फिर सब हैं पागल क्या बोलूं  (पृ.44)

प्रकृति को संरक्षित एवं पोषित करने की बेचैनी एवं असंभाव्य से संभाव्य का आह्वान करते ये शेर सार्थक है:-
धरती प्यासी, पनघट सूना-सूना है
दूर बहुत जा बैठा बादल क्या बोलूं  (पृ.44)

डॉ भावना यथार्थ की पहचान रखने वाली सहज, सजग और समर्थ ग़ज़लकार हैं ।अपने समय के दर्द ,भूख ,गरीबी, झूठ-सच, अमानवीयता, संप्रदायिकता और अपराधीकरण सरीखे तमाम विद्रूपताओं को उन्होंने ग़ज़ल की दुनिया में बड़े साहस के साथ स्थापित किया है। बानगी देखें-
उसने जब भी ये सिर झुकाया है
मेरे घावों को चैन आया है  (पृ.26)

मूल्य एवं मनुष्यता में आये बदलाव को इस शेर में महसूसा जा सकता है:-
गैर को था हमेशा मुझपे यकीं
मुझको अपनों ने आजमाया है (पृ.26)

अमीरी-ग़रीबी के साथ साथ सामाजिक विसंगतियों को उकेरती ग़ज़ल का ये शेर न सिर्फ मन में गहरी पीड़ा उत्पन्न करता है बल्कि सामाजिक विडंबना को धत्ता बताया है जहाँ आज भी लोग भूख को ही भाग्य समझने को मजबूर हैं। शेर देखें:-
भूख का रूप आप क्या जाने
आपने पेट भर के खाया है (पृ.26)

ग़ज़ल के एक अहम शेर के माध्यम से जीवन-मूल्य को बचाने की अपेक्षा की गई है जो कहीं खो गया सा लगता है। डॉ भावना ने एक चेतावनी देने का प्रयास किया है कि किसी भी परिस्थिति में सत्य का अनादर समाज को पतन की ओर धकेल देता है:-
सच की नैया में झूठ बैठा तो
लफ्ज़ सच का भी लड़खड़ाया है (पृ.26)

आज भी सांप्रदायिकता भारतीय जनमानस का बड़ा हृदय विदारक पहलू है। विभाजन के बाद तो और इसकी आग में देश की चेतना दिन-ब-दिन धधक रही है। हिंदू- मुसलमान को आज भी ऐसी अदृश्य शक्तियां खूब लड़ा ती हैं ।इन फसादों को झेलना मानो आदत- सी हो गयी है । ऐसी स्थिति में डॉ भावना ने इस तरह नफरतों के बीच मोहब्बत के बीज बोये हैं:-
मस्जिद के स्वर से मिलती
है मंदिर की घंटी देख (पृ.68)

प्रेम, सौंदर्य एवं आकर्षण शायरी के गहने हैं परंतु प्रेम जब वक़्त का लिबास ओढ़ता है तब वह बदलाव के रंग में रंगकर पवित्र हो जाता है। प्रेम में आये इस बदलाव को ग़ज़ल के इस शेर में देखें:-
जो ख्वाबों में बसा है वह जमाना ढूंढ लाना तुम
कहीं बेखौफ मिलने का ठिकाना ढूंढ लाना तुम (पृ.71)

नफ़रतों के बीच शास्वत प्रेम को सहेजने की ऐसी संजीदा अभिव्यक्ति संग्रह को मूल्यवान बनाती हैं:-
न कोई गम, कोई रंजिश न तन्हाई रहे दिल में
कहीं से आज उल्फत का खजाना ढूंढ लाना तुम (पृ.71)

सद्भाव किसी प्रदेश की अमूल्य निधि है। आज धर्म, जाति के नाम पर लोग बेवजह मरने-मारने को आतुर रहते हैं।साम्प्रदायिक-सद्भाव आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है, इसे बचाना मानवीयता को बचाना है। डॉ भावना ने जातीय हिंसा के विद्रूप चेहरे को उजागर करते हुए कहा है :-
नफ़रतों की तेज़ होती आग ने
मुल्क का चेहरा घिनौना कर दिया (पृ.82)

बाजारवाद की चकाचौंध ने आपसी सौहार्द, मानवीय मूल्य, सभ्यता ,नैतिकता आदि में बड़ी तेजी से गिरावट आया है। ऐसे में, डॉ भावना की समय से निराशा,खीझ और आक्रोश की यह चिंता लाजमी है ,जो मानवीय संवेदना की उस चिंता का प्रतिनिधित्व करती है जो मनुष्य को मनुष्यता की शर्त पर पहचान सके ।वो कहती हैं –
अब हवाओं में दहशतें हैं बहुत
चुप-सी बैठी हैं तितलियां घर में (पृ.77)

सूचना, तकनीकी एवं सोशल मीडिया की प्रासंगिकता को भी डॉ भावना ने तवज्जो दिया है एवं कहा है:-
आज गूगल का है जमाना हुजूर
कौन लाता है पोथियाँ घर में (पृ.77)

सहनशीलता, भावुकता एवं व्यवहार कुशलता के परे आज जीवन के हर मोड़ पर लोग झूठ, छल एवं फरेब से दो-चार हो रहे हैं ऐसे में कौन किसपर भरोसा करें और कौन किसपर संदेह, यह समझना सबसे ज़्यादा मुश्किल है। इस तरह की स्थिति में ग़ैर से ज़्यादा अक्सर अपने ही कठघरे में आते हैं। डॉ भावना ने इसका सजीव चित्रण इस शेर में किया है:-
ठगे जाते हैं अक्सर दिल के हाथों
मगर इससे कहाँ वो भागते हैं (पृ.79)

ग़ज़ल का ये शेर भी देखें :-
भरोसा ईंट से उठने लगा है
चलो तिनकों से छप्पर तानते हैं (पृ.79)

डाॅ भावना की ग़ज़लों में भावनाएं सांगितिक लय बनकर अंतर(मन) में ऐसे उतरती हैं कि विचार हतप्रभ होकर भावनाओं को सराबोर कर देती हैं ।संभवतः यही वजह रही है कि डॉ भावना अपने तेवर और अंदाज के लिए मशहूर हुईं ।वे प्रेम, समाज और सच्चाई को अपना संबल मानते हुए बड़ी सूझ-बूझ के साथ आशावादी ग़ज़लें कही हैं। खूबियों से लबरेज़ इनकी ग़ज़लें समाज, साहित्य , परंपरा और प्रगति को प्रमुखता से व्यक्त करती हैं । कुल मिलाकर “चुप्पियों के बीच” न सिर्फ़ ग़ज़ल -संग्रह है बल्कि ग़ज़ल के वजूद का दस्तावेज भी है, जिसे बड़ी ईमानदारी के साथ कलम की नोक से समेटने की कोशिश की गई है, जो पाठकों के भीतर पूरी शिद्दत के साथ प्रवेश करेंगी।

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चुप्पियों के बीच (ग़ज़ल- संग्रह )
लेखिका : डॉ भावना
समीक्षक – डॉ पंकज कर्ण
(डॉ जगन्नाथ मिश्र महाविद्यालय में अंग्रेजी के सहायक प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष)

 

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