लिपस्टिक अंडर माई बुर्का

मुख्य कलाकार: कोंकणा सेन शर्मा, रत्ना पाठक, आहना कुमरा आदि

निर्देशक: अलंकृता श्रीवास्तव

निर्माता: प्रकाश झा

 

औरतों की खुशी, ख्‍वाहिशें, कल्‍पनाएं, जुनून और महत्‍वाकांक्षाओं को बिना लाग लपेट के अलंकृता श्रीवास्तव ने इस फिल्‍म में पेश किया है। जैसा सआदत हसन मंटो व इस्‍मत चुगतई की कहानियों में होता है। फिल्‍म की कथाभूमि भोपाल में है, जो पुरानी और आधुनिक संस्‍कृतियों के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहा है। अलंकृता के कायनात की बुआजी उर्फ ऊषा, शिरीन असलम, लीला, रिहाना वहां के पुराने व तकरीबन खंडहर बनने की कगार पर मौजूद इमारत हवा महल में रहती हैं। बुआजी वहां की मालकिन हैं, बाकी उनकी किराएदार। वहां के माहौल में ही घुटन है। खासकर औरतों के लिहाज से।

शिरीन पति को बिना बताए सेल्‍स गर्ल का काम करती है। लीला का ब्यूटी पार्लर है, पर वह बाहर जाकर अपने सपनों को साकार करना चाहती है। रिहाना कॉलेज में पढ़ने वाली युवती है। वह माइली साइरस जैसी लोकप्रिय सिंगर बनना चाहती है, पर परिजनों ने उसे बुर्का सिलना सीखने में लगा दिया है। बेशक उसके पिता ने उसे शहर के सबसे बेहतर कॉलेज में दाखिला करवाया है, पर असल ख्‍वाब साकार करने की छूट उसे नहीं है। लीला की मां कर्ज तले दबी है। वह चाहती है कि लीला उसकी पसंद के लड़के से शादी करे न कि सड़कछाप फोटोग्राफर अरशद से, जिसके प्यार में लीला पागल है। उक्‍त सभी उस कुंठित समाज में जीने को मजबूर हैं, जहां औरतों की इच्‍छाओं को टैबू यानी वर्जित माना जाता है। वे महत्‍वाकांक्षी बननेे की कोशिश भी करें तो उनके चरित्र पर ही ऊंगलियां उठने लगती हैं। अलंकृता ने वैसी महिलाओं की कुंठा को उनकी शारीरिक जरूरतों के जरिए जाहिर किया है। उस ढर्रे पर फिल्‍मों में कम प्रयोग हुए हैं।

यहां सार यह है कि जब घर की दीवारों से लेकर ‘सुरक्षित’ बेडरूम तक स्त्रियों की मर्जी का ख्‍याल नहीं रखा जाता तो उनके दुनिया जीतने के सपने की तो बात ही छोड़ दें। रिहाना का उस किस्म के परिवेश में रहते हुए माइली साइरस जैसा बनने की बात रखना, मंगल ग्रह पर जाने सरीखी मांग है। जिसपर उसके ‘अपने’ चकित-विस्‍मित ही होते हैं। शिरीन असलम को उसके हमसफर ने महज बच्चे पैदा करने की मशीन समझ रखा है। विधवा बुआजी ऊर्फ ऊषा 55 की हैं। उनके लिए शारीरिक जरूरत की बात करना भी ‘पाप’ है। ऐसा हवा महल जैसे माहौल के ‘मर्दों’ व वहां के समाज का मानना है। लिहाजा जब वे चारों अपने सपनों को जीने निकलती हैं तो उनके पर कतर दिए जाते हैं। कथित मर्दवादी अहम की बेडि़यां उनके पांवों में डाल दी जाती हैं। वे वहां विरोध नहीं कर पाती हैं। उनकी आवाज उस मोड़ पर दम तोड़ देती हैं।

यह पहलू फिल्‍म को एपिक बनने से रोक देता है। साथ ही रिहाना के सपनों में चकाचौंध के प्रति आकर्षण ज्यादा, पर व्‍यावहारिकता की कमी झलकती है। सेलेब्रेटी को ही आदर्श मानने-मनवाने की प्रथा से फिल्‍मकारों को दूरी बरतनी चाहिए। उसकी जगह आईएएस, आईपीएस बनने का मकसद भी हो सकता था। लीला के साथ भी यही समस्या है। खुले विचारों की लीला को नहीं मालूम कि वह जो पाना चाहती है, उसके लिए जरूरी संसाधन क्या हैं। वह बस अपने प्यार अरशद के साथ जिंदगी बिताने को ख्‍वाहिशमंद है, जिसमें खुद ठहराव और परिपक्‍व सोच की कमी झलकती है। हो सकता है यह ‘मर्दवादी समाज’ का साइड इफेक्‍ट हो। अलबत्ता किस्सा कहने के ढंग में नयापन है।

बुआजी ‘लिपिस्टिक वाले सपने’ नामक किताब की कायल हैं, जो उन्‍मुक्‍त ख्‍वाबों-ख्‍यालों के किस्‍सों से अटी पड़ी हैं। उसकी नायिका रोजी है, जो बुआजी, लीला, रिहाना, शिरीन की आदर्श स्थिति हो सकती है। हालांकि वह आदर्श स्थिति वे चारों हासिल तो नहीं कर पाती हैं। कोशिश जरूर करती हैं। तो रोजी की कहानी के जरिए चारों किरदारों की जिंदगी के उन पड़ावों की गहन पड़ताल की जाती है, जो अब ‘जवानी’ की दहलीज पर हैं। वह जवानी कांटों की तरह चुभने लगी है। यहां ‘जवानी’ से अभिप्राय इच्‍छाएं हैं। फिल्‍म की शुरूआत किताब पढ़ती बुआजी से होती है। समाप्ति उन किताबों के टुकड़े हो चुके बिखरे पन्नों पर जाकर होती है।

किरदारों को बड़ी खूबी से निखारा और स्‍थापित किया है, पर उनके जरूरत से ज्यादा वर्णन के चलते क्‍लाइमैक्‍स सतही हो गया है। घुटन भरे माहौल में जीने को मजबूर चारों महिलाएं आखिर में भी आकर घुट कर रह जाती हैं। वह अंतर्विरोध के रूप में रह गया है। शायद कथित ‘समाज’ की सोच पर तमाचा जड़ने के लिए। शिरीन का वैवाहिक बलात्‍कार, लीला के अरशद संग बार-बार संभोग जरा थोपे हुए लगते हैं। उनका दोहराव रोका जा सकता था। या प्रतीकात्‍मक तरीके से वह और प्रभावी हो सकता था।

बहरहाल कलाकारों रत्‍ना पाठक शाह, कोंकणा सेन, अहाना कुमरा और प्‍लाबिता बोरठाकुर ने दमदार अदायगी की है। बुआजी, शिरीन, लीला व रिहाना को उन्होंने जीवंत बनाया है। अरशद के रोल में विक्रांत मेस्सी व शिरीन के पति के रोल में सुशांत सिंह ने भी कथित ‘मर्दवादी अहम’ को बखूबी पेश किया है। अलंकृता श्रीवास्तव ने जो रॉ दुनिया गढ़ी है, उसे देखने को जो दर्शक आदी नहीं हैं, उनके लिए यह एक अलग अनुभव होगा। वैसे सच उस दुनिया से भी बड़ा बेरहम है।

साभार – जागरण

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