अमिताभ कुमार अकेला की दो लघुकथाएं

रावण कौन

आज विजयदशमी है। लाखों की तादाद में श्रद्धालुओं की भीड़ रावण का पुतला दहन देखने हेतु गाँधी मैदान में जमा हुयी। मैदान के एक तरफ सत्तर फीट ऊँचा रावण का पुतला रस्सी और खूँटे के सहारे खड़ा किया गया। लाल-पीली रोशनियों के बीच एक से बढ़कर एक पटाखों द्वारा पुतले को सजाया गया। उल्लास भरे वातावरण के बीच पुतला दहन की तैयारी चल रही थी।

अभी पुतला दहन शुरू भी नहीं हुआ था। तभी मैदान के एक कोने से कुछ शोरगुल की आवाजें आयी। ऐसा लगा जैसे दूसरे धर्म के ठेकेदारों द्वारा सबकुछ पूर्वनियोजित हो। कुछ ही क्षण में शोरगुल ने भगदड़ का रूप ले लिया। किसी की कुछ समझ में आ पाता…… उससे पूर्व ही भीड़ बिखड़ने लगी। चारों तरफ चीख-पुकार मच गयी। लोग बदहवास एक-दूसरे को कुचलते हुये निरूद्देश्य  इधर-उधर भाग रहे थे।

आधे घंटे बाद भगदड़ रुक गया। रावण का पुतला बगैर दहन हुये अब भी तनकर खड़ा था। पुतले के चारों ओर जूते-चप्पल बिखड़े पड़े थे। मैदान में चारों ओर लोग घायल अवस्था में और बहुत से तो मृत अवस्था में भी पड़े थे। चारों तरफ से सगे-संबंधियों के क्रंदन की आवाजें आ रही थीं।

यह सब दृश्य देखकर पुतले का सीना गर्व से और चौड़ा हो गया। वह सोच रहा था – सही मायनों में रावण मैं हूँ……. या फिर यहाँ इकट्ठी हुयी भीड़……..

विस्मय

टूटी-फूटी सड़क पर बस हिचकोले खाते चल रही थी। छह माह के दुधमुँहे बच्चे को अपनी छाती में सटाये भीड़ के बीच एक महिला भी बस में सवार थी। जगह खाली नहीं रहने के कारण वह एक सीट पर अपने शरीर को टिकाये खड़ी थी। बच्चा बीमार था और वह भी काफी परेशान लग रही थी। थकान और भूख के कारण वह ठीक से खड़ी भी नहीं हो पा रही थी। सहारे के लिए उसने एक हाथ से बस की छत से लटक रहे लोहे के पाईप को कसकर पकड़ रखा था।

एक स्टॉप पर आकर बस रुकी। बस में से कुछ यात्री उतरे तो कुछ नये सवार भी हुये। जिस सीट से टिककर वह खड़ी थी उसपर से भी एक यात्री नीचे उतरा। जबतक वह उस सीट पर बैठने का सोचती – उससे पहले दूसरी सीट पर पहले से सवार यात्री ने अपने किसी परिचित को आवाज लगायी – ” आइये शर्मा जी। मैंने पहले से ही आपके लिए एक सीट बना रखी है। ”

शर्मा जी बड़े आराम से उस खाली सीट पर आकर बैठ गये और वह खड़ी ही रह गयी। शर्माजी और वर्माजी दोनों आपस में बातें करने लगे और बस खुल गयी। इतने में उसका बच्चा रोने लगा। उसने रोते बच्चे का मुँह अपने स्तन से सटा दिया। बच्चा चुप हो गया। शर्माजी और वर्माजी दोनों की नजर स्तनपान कराती उस महिला के उभारों पर जाकर टिक गयी। शर्मा जी खुश थे कि आज वर्मा जी ने उन्हें अच्छी जगह दिलायी और मन-ही-मन वे उन्हें धन्यवाद दे रहे थे।

थोड़ी देर बाद उनका गंतव्य-स्थल आ गया। सारे यात्री बस से नीचे उतर गये। पास में ही हॉस्पिटल था। वह महिला अपने बच्चे को सीने में सटाये अस्पताल के रास्ते पर थी। तभी उसने देखा – शर्माजी और वर्माजी दोनों हॉस्पिटल के बगल में स्थित नारी उत्थान केन्द्र के कार्यालय में घुस रहे थे जहाँ उन्हें आज समाज में नारी की दशा और उसके उत्थान पर अपना अभिभाषण देना था। वह विस्मय से उन्हें जाते देखती रही……..…..

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परिचय : अमिताभ कुमार अकेला साहित्य  की  विभिन्न विधाओं में लिख रहे हैं. इनके कई संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.

सम्प्रति : अभियंता, रेल पहिया कारखाना, भारतीय रेल, बेला, सारण, बिहार

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