अरविंद भट्ट की दो लघुकथाएं

 

रोटी

एक तो दिल्ली की जून की तपती, दहकती दोपहरी और शरीर को तंदूर की तरह सेंके जा रही लू और दूसरा  भट्टी बनी यह लोकल ट्रेन. गनीमत थी कि दोपहर की वजह से ऑफिस आने-जाने वालों की भीड़ उतनी नहीं थी जितनी सुबह-शाम के समय होती है. गर्मी इतनी थी की हलक सूखा जा रहा था. गर्मी की ही सोचकर उसने ट्रेन में चढ़ने से पहले कोल्ड ड्रिंक की बोतल ले ली थी और कुछ चिप्स के पैकेट ताकि इसी बहाने गर्मी को थोड़ी मात दी जा सके. खिड़की के बंद होने पर भी गर्म लू के थपेड़े कहीं न कहीं से रास्ता बना करके शरीर तक पहुँच ही जा रही थी.

उसने कोल्ड ड्रिंक की बोतल निकालकर गटागट एक ही साँस में आधी खाली कर दी थी. अब कुछ तसल्ली मिली थी उसे. अब उसने ध्यान दिया था की सामने की सीट पर खिड़की के पास गठरी बनी बैठी उस सूखी सी काया पर जो मैले-कुचैले कपड़े में अपने आप को पूरी तरह ढँके हुए थी जिससे मात्र आँखे ही रह-रह कर बाहर झाँक रही थी. वह उन्हीं कपड़ों में लिपटे-लिपटे कुछ कसमसाती  और फिर अपना मुँह ढककर दूसरी ओर करके न जाने क्या करने लगती. पर उसने और अधिक ध्यान नहीं दिया उस पर. वहाँ ऐसा कुछ भी था भी नहीं. तभी ट्रेन अचानक झटके से कर्कश आवाज़ में शोर मचाती हुई रुक गई, ट्रेन को आगे का सिग्नल नहीं मिला था. इसी झटके में उस गठरी बनी औरत का चेहरा और हाँथ अपने उस ढके-तुपे आवरण से बाहर आ गए थे. और कुछ तो नहीं बस उस औरत के हाँथों पर नज़र चली गई थी उसकी. एक सूखी, मुड़ी-तुड़ी रोटी को वह कसकर भींचे हुए थी. जैसे ही उसे एहसास हुआ कि उसका हाँथ कपड़े से बाहर आ गया है वह सहमकर फिर से पूर्ववत स्थिति में आ गई. अब गाड़ी चल पड़ी थी, शायद सिग्नल हो गया था. वो औरत इधर-उधर देखकर फिर से अपने को खिड़की के कोने में समेटकर कुछ करने लगी थी पहले जैसे. पर इधर उसके हाँथ से कोल्ड ड्रिंक की बोतल अब भी वैसे ही थमी पड़ी थी. पता नहीं बोतल में इतना भार कहाँ से आ गया था. उसके हांथों की पकड़ उसे रोटी भींचे हाथों की तुलना में ढीली लगने लगी थी.

लक्ष्मी

“बधाई हो शशांक! घर में लक्ष्मी आई है”. शशांक को आश्चर्य हो रहा था कि कैसे आखिर रिश्तेदारों को किसी भी ऐसी खबर की भनक लग जाती है जबकि डिलीवरी हुए अभी बमुश्किल से आधे घंटे भी नहीं हुए होंगे. वो भी जानता है कि अगर लक्ष्मी नहीं आई होती तो शायद यह फ़ोन भी इतनी त्वरित गति और तत्परता से नहीं आता. पर उसकी भी कौन सी बाँछें खिल पडीं थी  जब नर्स ने लड़की होने की सूचना दी थी. बस उसे इस बात का संतोष था कि डिलीवरी नार्मल हो गई थी अन्यथा पहले बच्चे के सिजेरियन के बाद उसे इसकी उम्मीद न के बराबर थी. उसे पता था कि सिजेरियन के बाद औरतों की दुश्वारियां कितनी बढ़ जाती हैं. ऊपर से सिजेरियन के बाद नार्मल डिलीवरी की आशंकित करने वाली ख़बरें उसे वैसे भी पिछले कुछ दिनों से भयाक्रांत कर रहीं थी. वह खुद को जानता है, पढ़ा लिखा है, इतना समझदार है कि इन सब दकियानूसी बातों पर यकीन नहीं करता पर फिर भी वह स्वयं को किसी बोझ तले दबा महसूस कर रहा था. वह दुखी तो नहीं था पर उतना खुश भी नहीं.

रिसेप्शन से महिला वार्ड में जाते समय न जाने कितने ख़यालात उसके दिमाग को मथ रहे थे. टी.वी. चैनल, अखबारों के कितने ही दहेज़, बलात्कार, छेड़छाड़, महिलाओं के प्रति पाशविक व्यवहार की ख़बरें उसे लगातार याद आ रहीं थी. वह चाहते हुए भी उन विचारों को स्वयं में आने से रोक नहीं पा रहा था. न जाने क्यूँ अचानक से इन सभी ख़बरों नें उस पर आक्रमण कर दिया था. वह अपने आप को घिरा हुआ महसूस कर रहा था जब तक कि उसके सामने उस नन्हीं परी का चेहरा सामने नहीं आ गया था. देख कर लग ही नहीं रहा था कि वह नवजात अभी-अभी दुनिया में आई है. बड़ी-बड़ी खुली आँखों से वह आस-पास देखने की कोशिश कर रही थी. शशांक अब खुद को एकदम से मुक्त महसूस करने लगा था. विचारों का प्रवाह थम सा गया था. एक कसक भरी नज़र से पत्नी और बेटी को देखने के बाद वह अपने बेटे के साथ बाहर आकर  कुर्सी पर शांत मुद्रा में बैठ गया था. पर पता नहीं थोड़ी ही देर में एक बार फिर से अखबारों की वो सारे कतरनें , ख़बरें उसके दिमाग में फणफणानें लगी थीं.

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परिचय : साहित्य की विभिन्न विधाओं में अरविंद भट्ट की सात पुस्तें प्रकाशित हो चुकी हैं

सम्प्रति : बहुराष्ट्रीय कंपनी में सीनियर टेक्निकल आर्किटेक्ट मैनेजर (सॉफ्टवेयर)

वर्तमान पता : F2-763, गौर होम्स, गोविन्दपुरम, गाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश, 201013

Email: arvindkrbhatt@gmail.com, Mob : 9811523657

 

 

 

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