लघुकथा : कैलाश झा ‘किंकर’

बाबूजी ठीक कह रहे हैं

– कैलाश झा किंकर

 

‘कोरोनटाईन सेंटर के प्रभारी के रूप में तुमने ग़लत कमाई का जो अम्बार खड़ा कर लिया है,उसे देखकर मुझे तुम्हारे पिता होने का बहुत अफसोस है।मेरे आदर्श और मेरी

नैतिकता पर तुमने जो दाग़ लगाया है,उससे मैं बहुत आहत हूँ।संतोष से बड़ा कोई धन नहीं है।अपने वेतन पर गुज़ारा करना सीखो ‘ वृद्ध पिता सुखेश बाबू ने अपने पुत्र समरेश को डाँटते हुए कहा ।

समरेश खुशामद भरी आवाज में कहा-पिताजी, आप अपने ज़माने की बात छोड़ दीजिए।आज सब कुछ मैनेज किया जाता है।अपनी नौकरी बचाने के लिए आला अधिकारियों की बात माननी पड़ती है।और फिर ,मेरे जैसे अनेक लोग हैं जो बहती गंगा में अपनी-अपनी प्यास बुझा रहे हैं।जिन्हें इस तरह की कमाई का कोई अवसर नहीं मिला वही महात्मा गाँधी बने हुए हैं।

सुखेश बाबू ने क्रोध पीकर भी समझाते हुए कहा-बस करो समरेश,ज़माने की हवा में इस तरह मत उड़ो।ऊपर वाले सब देख रहे हैं।कोरोना जैसी संकट की घड़ी में लोगों के काम आओ।दान-पुण्य करो।जाओ,अपनी ग़लत कमाई की राशि जरूरत मंदों पर खर्च करो।जन -कल्याण करो।ईश्वर तुम्हें क्षमा करेंगे।

समरेश ने आश्चर्य मिश्रित स्वर में कहा -पिताजी! ये क्या कह रहे हैं?दुनिया —

पिता-पुत्र की नोक-झोंक सुनकर समरेश की पत्नी ने अपने दोनों पुत्रों के माथे पर हाथ फेरते हुए दृढ़ स्वर में समरेश की बात काटते हुए कहा-दुनिया कुछ भी करे ,मैं अपने बच्चों की परवरिश ऐसी ग़लत कमाई से नहीं होने दूँगी।बाबूजी ठीक कह रहे हैं।

 

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