शिक्षा का असर

जंगल में प्रजातंत्र की बात हो रही थी। सारे पशुओ के प्रतिनिधियों की बनी कमेटी ने तय किया कि इसके लिए शिक्षा का प्रचार-प्रसार आवश्यक है। जन- जन तक इसका प्रचार होना चाहिए।

शिक्षा का प्रचार-प्रसार शुरू हुआ। ऊँचे विचार वाले साहित्य रचे गए। बहुत से अनुदित हुए। तकनीकी ज्ञान का विकास हुआ। ऊँची डिग्रियों की व्यवस्था हुई। प्रचार-प्रसार का खूब नाटक चलता रहा।

सियार पंडित जी पहले धोती-कुर्ता ही पहनते थे। लेकिन जब से गोल्ड मेडल मिला, थोड़े चर्चित हुए तब से धोती छूट गयी। सर्ट-पैंट पर आ गए। विचार में बदलाव का असर था। झिझक मिट-सी गयी थी।

एक दिन उनका एक मित्र बड़ा चिंतित दिखा। उसने  सियार पंडित से पूछा –

‘शिक्षा कहाँ तक असरदार रही है?’   उन्होंने झट से जवाब दिया-“शिक्षा वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करती है। मन में एक प्रकार के खुलेपन को जन्म देती है। दूसरी संस्कृति, विचार, भाव के प्रति श्रद्धा उपजाती है। यही तो लोकतांत्रिक भाव है। और यह हो रहा है। शिक्षा सफल रही है। ”

मित्र महोदय इस जवाब से और अधिक चिंतित हुए क्योंकि सियार पंडित की जुबान  बदली हुई थी, पोशाक भी बदली थी पर विचार तो जम हुआ ही था।उनकी कथनी-करनी में बड़ा फर्क था। शिक्षित का टैग तो लग गया था वही दूसरी ओर अपना सरनेम चतुर्वेदी हटवाकर कुमार करवाने के जुगाड़ में लगे हुए थे।

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परिचय : गौतम कोइरी की लघुकथाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है.

संप्रत्ति :  रानी बागान, पाटा कपड़ा, कोच बिहार , पश्चिम बंगाल

 

 

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