मरछिया

  • जयप्रकाश मिश्र

अनाथ मरछिया कुत्ते के जूठे पत्तल चाट-चाटकर युवती हो गयी थी । आदर्श की रेशमी चादर ओढ़कर सिद्धान्त बघारने वाले उसकी प्रतीक्षा में पलक पाबड़े बिछाये बैठे रहते थे । सहानुभूति दिखाने वाले लोगों की गिद्ध-दृष्टि को वह अच्छी तरह जानती थी । समाज में ऐसे ही लोगों में एक मगरूबाबू थे। अक्सर रात के अंधेरे में मरछिया के निकट पहुँचते थे । आने -जाने से मगरूबाबू के प्रति मरछिया का लगाव कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था । वह शादी के पहले मगरू बाबू के साथ कोई अवैध शारीरिक संबंध कायम करना नहीं चाहती थी । समाज के डर से एक दिन मगरूबाबू मरछिया को लेकर शहर भाग गये । मगरूबाबू एक नामी गिरामी जमींदार थे । शहर में वह एक आलीशान मकान में रहने लगे । मगरूबाबू लोक -लाज के डर से कोई संतान नहीं चाहते थे । मरछिया को दाल में काला नजर आने लगा । वह अनिष्ट की आशंका से घबड़ा गयी । कुछ दिनों बाद मगरूबाबू मरछिया के यौवन से खिलवाड़ कर ऊब-सा गये थे । वे उससे अपना दामन छुड़ाने का उपाय सोचने लगे । वे मरछिया को फुसलाने लगे । मरछिया मगरूबाबू के नापाक इरादों को समझ नहीं सकी । मगरूबाबू ने अपनी सोची-समझी साज़िश के तहत एक झूठे रिश्तेदार के यहाँ चलने के लिए कहा । मरछिया तैयार हो गयी । रिश्तेदार के यहाँ न जाकर मगरूबाबू सीधे एक वेश्यालय पहुँचे, जहाँ चुपचाप एक वेश्यालय के हवाले छोड़ कर वापस आ गए । मरछिया हर रोज मगरूबाबू का इंतजार करने लगी । वह फूका फाड़ कर रोने लगती थी । अचानक वह पागल हो गई तथा अपने नाखूनों से सबको नोचने लगी । मरछिया को पागल समझ कर वेश्याओं ने पागलखाने में पहुँचा दिया दिया । वहाँ मरछिया मगरूबाबू-मगरूबाबू की रट लगाने लगी, परन्तु उसकी आवाज पागलखाने की दीवारों से टकरा कर पुन: उसके पास आ जाती थी ।

 

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