डॉ कुँवर दिनेश सिंह की दो लघुकथाएं

 

आत्मा का घर

“सादा जीवन, उच्च विचार”― बहुत-से महापुरुषों का यही उपदेश रहा है। लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि व्यक्ति अच्छे वस्त्र न पहने, वर्तमान समय के अनुसार परिधान को न बदले। लोग अक्सर कहते हैं कि भोजन अपनी पसन्द का खाना चाहिए और परिधान दूसरों की पसन्द का पहनना चाहिए। परन्तु परिधान में मैंने हमेशा अपनी ही पसन्द को ऊपर रखा। पूर्व का हो या पश्चिम का, परिधान वही ठीक होता है जो आपके तन को सही ढंग से अलंकृत करे।

मेरे एक पड़ोसी थे ― पंडित ज्योतिधर शास्त्री। संस्कृत के अध्यापक थे। सेवानिवृत्ति के निकट पहुँच चुके थे। कॉलेज में अँग्रेज़ी के प्राध्यापक के रूप में मैंने अभी अपना व्यावसायिक जीवन आरम्भ ही किया था। मैं अपने परिधान के प्रति विशेष ध्यान देता और इसमें मैं किसी का हस्तक्षेप भी स्वीकार नहीं करता।

पंडित जी हमेशा कुर्त्ता-पायजामा या फिर धोती-कुर्ता पहने रहते। एक थैला काँधे पर लटकाए रहते, जिसमें कोई पुस्तक, जन्त्री और कुछ फल-तरकारी भरी होती थी। सिर पर किश्ती टोपी और पैरों में कपड़े के जूते पहने रहते। उन्हें उनकी यह वेशभूषा काफ़ी फ़बती थी, परन्तु वे शहरी लोगों के पहनावे पर हमेशा फ़ब्तियाँ कसते रहते थे। जब भी मेरा उनसे सामना होता तो वे एक ही राग अलापने लगते थे ― पाश्चात्य परिधान धारण करने से मनोविकार होता है। यह हमारी भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है . . .।

एक दिन मैंने उनसे पूछ ही लिया, “पंडित जी, आप हमेशा हमारे परिधान पर आक्षेप करते रहते हैं . . . आप ही बताइए इसमें बुराई क्या है?”

“ऐसे तड़क-भड़क वाले वस्त्र धारण करने से एक तो व्यक्ति की एकाग्रता भंग होती है और दूसरे का आध्यात्मिक विकास नहीं हो पाता . . .,” पंडित जी बोले।

“इसमें आध्यात्मिक विकास के अवरुद्ध होने वाली क्या बात है भला?” मेरी उत्सुकता बढ़ गई थी।

“मेरे कहने का आशय है सादा पहनने से विचार श्रेष्ठ होते हैं . . . भारत की सनातन संस्कृति के संरक्षण के लिए भी यह आवश्यक है . . .,” पंडित जी ने एक और तर्क जोड़ दिया।

“पंडित जी, सादा शब्द का अर्थ क्या है? यह भी एक तर्क का विषय है . . . मैं समझता हूँ वस्त्र अच्छे हों, स्वच्छ हों . . . बस फूहड़ न लगें . . . इसमें पूर्वी या पश्चिमी का भेद कोई मानी नहीं रखता . . . केवल कुर्त्ता-पायजामा या धोती-कुर्त्ता को ही तो सादा नहीं कहा जा सकता . . .”

“लेकिन ये हमारी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं . . .” पंडित जी अभी हार मानने वाले नहीं थे।

“पंडित जी, कुर्त्ता-पायजामा भी भारत का परिधान नहीं है, यह तो अरब से अपनाया गया है . . .,” मैंने एक तीर छोड़ दिया।

“लेकिन एक बात तो अवश्य है, पहनावा भड़कीला नहीं होना चाहिए . . .,” पंडित जी थोड़ा नर्म पड़ गए थे।

“मैं यह समझता हूँ, हमारे वस्त्र ऐसे होने चाहिए, जिनको धारण करने से स्वयं भी आनन्दित रहें और दूसरों को भी देख कर अच्छा लगे . . .,” मैं अपना तर्क जोड़ने लगा, “आपने तो शास्त्र पढ़े हैं; पुराणों में एक दृष्टान्त मिलता है, जिसमें कहा गया है कि जब समुद्र-मन्थन से लक्ष्मी प्रकट हुईं तो उनके सामने ब्रह्मा, विष्णु और शिव खड़े थे, जिनमें से किसी एक का वरण उन्हें करना था . . . विष्णु के पीताम्बर से वे सहसा आकृष्ट हो गईं और उन्होंने उनका ही वरण कर लिया . . .”

“तुम कहना क्या चाहते हो?” पंडित जी का स्वर मद्धम पड़ चुका था।

“मैं यही कहना चाहता हूँ, पंडित जी, वस्त्रों का हमारे व्यक्तित्व को निखारने में बहुत महत्त्व होता है . . . और रही बात आध्यात्मिक विकास की, तो मेरा मानना है हमारा शरीर हमारे “सेल्फ़” का निवास है, यानि हमारी आत्मा का घर है, इसलिए इसे सुसज्जित रखना चाहिए ताकि आत्मा प्रसन्न रहे . . . इसी से अध्यात्म पुष्ट होता है . . .”

मेरे तर्क से पंडित जी संतुष्ट हुए या नहीं, मगर थोड़ा सोचने के लिए विवश तो हो गए थे . . .। ¡

 

पढ़ाई

“यार, सुदीप! तू घण्टों बैठा इन किताबों को चाटता रहता है . . . ऐसा क्या पढ़ता है, भाई?” राजेश बोले जा रहा था, “मुझे देख, मैं तो परीक्षा से हफ़्ता- दस दिन पहले ही किताबें देखता हूँ और अच्छे नम्बरों से पास हो जाता हूँ। तू इतना गहराई में क्या पढ़ता रहता है?”

“बस यार, पढ़ने दे मुझे . . . मुझे समझने में बहुत समय लगता है। तेरी तरह तेज़ दिमाग़ नहीं है मेरे पास,” सुदीप ने राजेश को टालते हुए कहा।

डिग्री पूरी होने को आई तो कॉलेज में कैम्पस प्लेसमेंट के लिए साक्षात्कार लिए गए, जिनमें सुदीप का चयन एक बहुत बढ़िया कम्पनी के लिए हो गया। राजेश रह गया। डिग्री प्राप्त करने के बाद सुदीप अच्छी आय लेने लगा था, लेकिन राजेश धक्के खा रहा था। उसने कौशल बढ़ाने के लिए एक सर्टिफ़िकेट कोर्स किया, जिसके बाद भी उसे नौकरी के लिए भटकना पड़ा। बहुत संघर्ष के बाद राजेश को एक नौकरी मिली, मगर उसकी आय बहुत कम थी।

एक दिन दोनों मित्र मिले। दोनों ने एक-दूसरे का हाल जाना। राजेश ने सुदीप से पूछा, “यार, मुझे एक बात समझ नहीं आती – हम दोनों ने एक ही डिग्री की है और मेरे नम्बर भी अच्छे हैं, लेकिन मुझे इन बड़ी कम्पनी वालों ने सिलेक्ट क्यों नहीं किया?”

सुदीप ने मुस्कुराते हुए कहा, “देख राजेश, तू जो मुझे कहता था कि इतना गहराई में मैं क्यों पढ़ता है, उसी का अन्तर है। सिलेक्ट करने वाले विषय की गहराई को भाँप लेते हैं। रट्टे से भी अच्छे अंक तो लिए जा सकते हैं, मगर नौकरी देने वाले तो व्यक्ति की कुशलता को परखते हैं।”

राजेश को ख़ामोश देखकर सुदीप ने कहा, “अब तू मेहनत कर और अपनी वर्तमान नौकरी में दक्षता दिखाकर उन्नति लेने का प्रयास कर।”

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परिचय : कथाकार साहित्य की कई विधाओं पर काम कर रहे हैँ. इनके संपादन में हाइफन पत्रिका प्रकाशित हो रही है

संपर्क : 3, सिसिल क्वार्टर्ज़, चौड़ा मैदान, शिमला: 171 004 हिमाचल प्रदेश।

ईमेल: kanwardineshsingh@gmail.com

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