खबरी अम्मा 
           – नज़्म सुभाष 

अहले सुबह उठकर सारी नित्यक्रिया निपटाकर अंततः अम्मा छः बजे तक एकदम फ्री हो जाती फिर शुरू होती उनकी घरवादारी…. इस घर से उस घर जब तक दो चार घर छुछुवा न लें उनकी दिनचर्या शुरू न हो पाती ।
सामने तो सब उन्हें अम्मा कहते हैं लेकिन पीठ पीछे डाकगाड़ी…. अस्सी साल की उम्र होने को आयी किंतु लगाई बुझाई करने की उनकी आदत में कोई फर्क नहीं आया था।यही वजह है कि गांव मे किसी को भी गोपनीय जानकारी का पता लगाना हो तो वह अम्मा को ही खोजता। एक पान मसाला की पुड़िया उनको पकड़ा कर सारे राज उगलवा लो। उनकी इस आदत से सभी चिढ़ते भी थे और मजा भी लेते थे ।लेकिन हर आदमी भरसक यही कोशिश करता था कि कमसेकम उसके घर की कोई बात अम्मा तक न पहुंचे मगर लाख कोशिशों के बाद अम्मा तक खबरें पहुंच ही जाती। वह खबरें इतनी चटकारे ले लेकर सुनाती कि कई बार सामने वाला झूठी खबर को भी सच मानकर चटखारे लेकर सुनता और उन्हे उकसा उकसाकर आनंदित भी होता।

अम्मा एक छोटी सी कोठरी में अकेले रहती हैं। दो बेटे थे जो शहर को गये तो शहर के ही होकर रह गये। इधर कभी झांकने तक नहीं आये।कभी कोई बेटों के बारे मे कुछ पूछ लेता तो आंखे पसीज जातीं ।सूती धोती के अंचरे में आंखे पोछकर कहतीं-“होइ… जहाँ रहैं सुखित रहैं…बाल बच्चा मजेम रहैं…हमार का है..कहूं याक रोटी मिलेन जइ।”

इस उम्र में भी अम्मा में गजब की जीवटता है किसी के सुख दुख में वह जरूर शामिल होतीं अपनी लाख कमियों के बावजूद अपनी सामर्थ्य भर जो बन पड़ता करती ।गांव के किसी भी छोटे बड़े काम मे उनकी उपस्थिति अनिवार्य थी।गाँव की कोई बिटिया विदा होती तो छाती से चिपकाकर फूट फूटकर रोतीं…जैसे अपने ही कलेजे का टुकड़ा किसी को सौंप रही हों।

अम्मा के मुंह में दांत नहीं है। पोपला मुंह …ऊपर से ढेर सारी झुर्रियों का मकड़ी जाला…. खाने-पीने का कोई निश्चित समय नहीं…कभी खुद बना लिया या किसी ने खिला दिया ।इस उम्र में शरीर वैसे भी रोटी दो रोटी से ज्यादा हजम नहीं कर पाता। अभी कुछ दिन पहले रात में पेट खराब हुआ तो लोटा लेकर भागती रहीं ।अंधेरी रात थी पैर फिसला तो वहीं पर ढेर हो गईं। तब से चलने फिरने में असमर्थ …..दिन भर बिस्तर पर पड़ी रहती कोई खाने को दे गया तो ठीक है अन्यथा भूखी ही…..अपनी कोठरी मे पड़े पड़े जाने किससे बातें करती…..।

“रमुआ बहुत दिन भये अम्मा दिखाई न पड़ीं”

“तुमका डाकगाड़ी केरि बड़ी चिंता है…चैन न परति होइ।”

” अरे बुजरुख हैं… गिरि गयी रहैं… अब पता नाय ठीक भईं है कि नै”

” सीधे-सीधे कहव परपंचु करे’क है।”

” तुमका सब परपंचुय लागत है ।”

“अउर नाय तौ का…. खाली हौ खुदै चली जाव उनके घरै ….बहुत दिन भये लगाई बुझाई किये।”

” अबहें थप्पर परी तौ दिमाग ठंडाय जइ।”

अपनी अम्मा से जलीकटी सुनकर रमुआ ने खीसें निपोरीं..और अम्मा भिन्नाते हुए जगत अम्मा के घर की ओर चल दीं।
दरवाजे पर पहुंच कर उन्होंने दरवाजे की कुंडी खटखटाई।

“अम्मा”

“sss”

” अम्माsssss….”

“ssssss”

कोई आवाज नहीं ऐसा तो कभी न हुआ। अगर उठने लायक नहीं तो कम से कम बोल ही देतीं। काफी देर आवाज देने के बाद जब दरवाजा नहीं खुला तो दो चार लोगों को बुलाकर दरवाजा तोड़ा गया ।

सामने झिंगली खटिया पर अम्मा पड़ी थी। मुंह एकदम खुला ….आंखें जैसे किसी का इंतजार में पथरा गयी हों … मुंह पर ढेर सारी मक्खियां भिनभिना रही थीं। सभी अवाक्!!!
पूरे गांव जवार की छोटी से छोटी खबर रखने वाली अम्मा कब इस दुनिया से कूच कर गयीं किसी को खबर न थी।

नज़्मसुभाष
लखनऊ

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