लघुकथा : मुकुन्द प्रकाश मिश्र

राजधानी एक्सप्रेस
– मुकुन्द प्रकाश मिश्र

मैं रेलवे स्टेशन पर बैठ कर ट्रेन का इंतजार कर रहा था ।किसी ने कहा ट्रेन हमेशा की तरह है 2 घंटे लेट ! यह सूचना सुनकर मैं वही एक कुर्सी पर बैठ गया कुछ ही समय बाद मैने देखा । एक बुजुर्ग जो शायद प्राकृतिक तथा माननीय यातनाओं का शिकार था वह कूड़े के ढेर पर बैठ अपनी असहनीय भूख को शांत करने के लिए रोटी का टुकड़ा ढूंढ रहा था उनका प्रयास बेकार नहीं गया और करीब आधा घंटा मेहनत के बाद उनको रोटी का आधा टुकड़ा मिल ही गया पर अफसोस यहां भी भाग्य दगा दे गया जैसे ही उन्होंने ईश्वर को धन्यवाद देकर उस रोटी के टुकड़े को खाने के लिए मुंह खोला वैसे ही मुल्क के तथाकथित रहनुमाओं को ढोने वाला राजधानी एक्सप्रेस के आने पर चलने वाले तेज हवा के झोंके के कारण उनके हाथ से रोटी का टुकड़ा हवा में उछल गया,टुकड़ा उड़ता हुआ जा कर समाज के एक तथाकथित सभ्य और प्रतिष्ठित व्यक्ति के शरीर पर गिरा । जिससे गुस्से में आकर उस व्यक्ति ने उस बुजुर्ग को एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया तथा अंग्रेजी भाषा में कुछ गाली भी बोला । इसके बाद उस आदमी ने पानी का बोतल खरीद कर अपना कपड़ा साफ किया,वही बगल में बैठा एक भाग्यशाली कुत्ता मौके का फायदा उठाकर उस रोटी के टुकड़े को चुरा लिया इस दर्दनाक घटना ने उस बुजुर्ग को हमेशा की तरह आज भी भूखा ही सुला दिया
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परिचय : लेखक की कई लघुकथाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं.

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